About Me
- अनिल पांडेय
- दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. फिलहाल 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
Saturday 25 April 2009
चेक का भी बनाया क्लोन
हर रोज की तरह 26 मार्च को भी अनूप कपूर दुकान खोलने के बाद इंटरनेट के जरिए अपने बैंक का हिसाब किताब देखने में जुट गए. दिल्ली के दिल कहे जाने वाले चांदनी चौक के पेंट व्यवसायी अनूप के कारोबार का लेन-देन चेक से ही होता है. वह हर दिन तीन-चार चेक जारी करते हैं. इसलिए इंटरनेट के जरिए अपने बैंक खाते की नित्य पड़ताल करना उनकी दिनचर्या में शुमार है. कप्यूटर बंद करने के बाद वे खुशनुमा मूड में चाय की चुसक्कियां ले रहे थे, तभी एक फोन ने उनके माथे पर बल डाल दिया. अनूप कपूर द्वारा शालीमार पेंट्स को जारी 40 हजार रूपये के चेक का भुगतान उनके खाते से हो चुका था, लेकिन यह चेक जिस कंपनी के नाम जारी किया गया था, उसके खाते में नहीं पहुंचा था. पहले तो अनूप इसे बैंक की लापरवाही मान रहे थे. लेकिन बैंक जाकर उन्होंने जो कुछ देखा, उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.
आखिर पैसा गया कहां? जो एकांउंटपेयी चेक शालीमार पेट्स लिमिटेड के नाम जारी किया था, वह कैसे करन के नाम से बियरर चेक में तब्दील हो गया? अनूप कपूर से लेकर शालीमार पेंट्स के सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा हैरान! लेकिन थोड़ी देर माथा पच्ची के बाद अनूप को मामला समझ में आ गया. किसी शातिर ने शालीमार पेंट्स को जारी उनके चेक का “क्लोन” तैयार कर खाते से से रकम गायब कर दी. अनूप कपूर द संडे इंडियन से कहते हैं, “जब बैंक मैनेजर ने मुझे चेक दिखाया, तो पहली नजर में तो मैं भी हैरान रह गया. चेक पर मेरे दस्तखत तो असली थे, लेकिन बाकी डिटेल नकली. जब गौर से देखा तो समझ में आ गया कि यह चेक तो नकली है. असली चेक से इसकी तुलना की तो पाया कि इसका रंग हल्का और कागज की मोटाई कहीं ज्यादा थी. फिर मैने नीले पेन से अपना हस्ताक्षर किया था, लेकिन इसमें यह काली स्याही से था.” अनूप अकेले नहीं हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया है, दिल्ली में कई और लोग भी हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर उनके बैंक खाते से रकम छू मंतर कर दी गई है. चेक के क्लोनिंग करने वाले गिरोह के कितने लोग शिकार हो चुके हैं, इसका कुछ पता नहीं, लेकिन इसका भंडाफोड़ तब हुआ जब शालीमार पेट्स लिमिटेड के छह चेक गायब हुए. इनमें से तीन चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया. ये तीनों चेक शालीमार पेंट्स के डीलरों, चांदनी चौक के कपूर पेंट्स एंड केमिकल्स, वजीरपुर के प्रीमियर पेंट्स और मंगोलपुरी के श्रीराम पेंट्स एंड हार्डवेयर के थे. इन लोगों ने ये चेक शालीमेर पेंट्स के नाम जारी किए थे. चौथा मामला रोहणी के सेक्टर-24 के पाकेट 20 के प्लाट नंबर 3-4 में रहने वाले सुशील गर्ग का है. सभी चेक स्टेट बैंक आफ इंडिया के पंजाबी बांग स्थित शाखा से 20 से 23 मार्च, 2009 के बीच ड्राप्स बाक्स से गायब हुए थे. चारो चेक क्लोनिंग के जरिए बियरर बनाकर जारीकर्ता के संबधित बैंक यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा, केनरा बैंक की वजीरपुर शाखा, इलाहाबाद बैंक की मंगोलपुरी शाखा और केनरा बैंक की त्री नगर शाखा से कैश करा लिए गए. ड्राफ्स बाक्स में से शालीमार पेंट्स के तीन और चेक गायब हुए हैं. लेकिन ये उन बैंकों के थे, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. लिहाजा, गिरोह ने इस चेक का इस्तेमाल नहीं किया.
आशंका है कि गिरोह और भी लोगों के चेक का क्लोन तैयार उनके एकाउंट से पैसा गायब कर चुका है. धीरे-धीरे और भी मामले सामने आएंगे. व्यापारियों को लाखों का चूना लगा चुके इस गिरोह के भंडाभोड़ के प्रति पुलिस उदासीन है. शालीमार पेंट्स लिमिटेड के एरिया सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा कहते हैं, “पुलिस और बैंक वाले इस मामले को गंभीरता से लेने की बजाए लीपापोती पर लगे हैं. जो चेक देखने में साफ नकली नजर आ रहा है, बैंक उसे असली साबित करने पर लगा है. नकली चेक पर वाटर मार्क बिलकुल नहीं है. जिससे साफ जाहिर होता है की बैंक ने जिस के जरिए भुगतान किया है वह नकली है. पुलिस और बैंक के लोग तो उल्टे हमें गलत बताकर मामले को वापस लेने का दबाव डाल रहे हैं.”
चारो मामलों में अलग-अलग थानों में शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन पुलिस ने एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की है. सुशील गर्ग ने पत्र भेजकर इसकी शिकायत दिल्ली पुलिस कमिश्नर और इलाके के डीसीपी से भी की है. लेकिन उनके पास यहां से कोई जवाब नहीं आया है. जिस भारतीय स्टेट बैंक की पंजाबीबाग शाखा से चारों चेक गायब हुए हैं, उस इलाके के सब इंसपेक्टर और इस मामले के जांच अधिकारी मनोहर लाल द संडे इंडियन से कहते हैं, “जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज की जाएगी. मैं जांच के लिए स्टेट बैंक गया था लेकिन तब वहां के मैनेजर ने यह कह कर की क्लोजिंग चल रही है इसलिए वे व्यस्त हैं, मिलने से इनकार कर दिया था. मै उन्हें जांच के सिलसिले में मिलने के लिए लिखित नोटिस भी दे कर आया हूं.” इस बारे में जब द संडे इंडियन ने स्टेट बैंक आफ इंडिया की पंजाबीबाग शाखा के प्रबंधक एसबी चोपड़ा से बात की तो उनका कहना था, “मैने अपने स्तर पर जांच करा ली है. हमारे ड्राप बाक्स से चेक गायब नहीं हुआ है. ड्राप बाक्स से चेक निकलने और बैंक में जमा कराने के बीच पूरी पारदर्शिता रखी जाती है. रही बात पुलिस को जांच में सहयोग देने की तो जब पुलिसवाले आए थे तो मैं मिटिंग में था और उनके जाने के बाद मैने खुद इस बारे में एसएचओ से फोन पर बात की है और जांच में पूरा सहयोग देने का वादा किया है.”
चेक का क्लोन तैयार कर रकम हड़पने का यह देश का संभवत: पहला मामला है. द संडे इंडियन ने अपनी पड़ताल में पाया कि इसे देश की राजधानी में बड़े ही शातिर तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. अपराध को अंजाम देने के तरीके से लगता है कि यह गिरोह पूरी तरह से संगठित है और इसमें पढ़े लिखे और कंप्यूटर तकनीक में दक्ष लोग शामिल हैं. गिरोह के लोग बैंक के चेक ड्राप बाक्स से चेक गायब कर देते हैं. उस चेक का कलर स्कैन कर लिया जाता है. इसके बाद कप्यूटर तकनीक का इस्तेमाल कर स्कैन किए हुए चेक से हस्ताक्षर के अलावा बाकी लिखे हुए शब्द इरेज कर दिए जाते हैं. इसके बाद असली चेक में इस्तेमाल होने वाले कागज पर इसका प्रिट आउट निकाल लिया जाता है. फिर इस पर हाथ से नाम और रकम लिख कर बियरर चेक के रूप में उसे बैंक से कैस करा लिया जाता है. यह काम इतनी सफाई से किया जाता है कि इन नकली चेकों को पहचान पाना काफी मुश्किल होता है. द संडे इंडियन के इस संवाददाता ने संबंधित बैंकों में जाकर नकली चेक की पड़ताल की तो महसूस किया कि वाकई इनको पहचानना काफी मुश्किल है. यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा से अनूप कपूर का चेक कैश कराया गया था. इस बैंक के मुख्य शाखा प्रबंधक भी हैरान हैं. 30 साल के करियर में कभी उन्होंने चेक के इस तरह के फर्जीवाड़े के बारे में नहीं सुना. वे नाम न छापने का आग्रह करते हुए द संडे इंडियन को चेक दिखाते हुए कहते हैं, “हमारे हिसाब से तो चेक असली है और हस्ताक्षर मिलाने के बाद ही हमने रकम दी है. लेकिन शिकायकर्ता का कहना है कि यह क्लोनिंग के जरिए तैयार किया गया है. मैं इस संभावना से भी इनकार नहीं कर रहा हूं. अगर ऐसा है तो यह किसी शातिर दिमाग का काम है, जिसने तकनीक का इस्तेमाल कर हूबहू चेक तैयार कर दिया है. पुलिस को इसकी गहराई से जांच करनी चाहिए. मैने भी अपने हेड आफिस को इस बारे में जांच करने के लिए लिखा है.” जिस ड्राप बाक्स से चेक गायब हुए हैं, वह बैंक के बाहर चाहरदीवारी पर टांगा गया था. फिलहाल बैंक ने उसे हटाकर शाखा के अंदर रख दिया है.
गिरोह के लोगों को बैंक के कामकाज की पूरी जानकारी है. आशंका यह भी है कि उन्होंने इंटरनेट के जरिए पासवर्ड आदि हैक कर या किसी कर्मचारी से मिलकर चेक जारी करने वाले लोगों के एकाउंट की डिटेल भी हासिल की है. सुशील गर्ग कहते हैं, “मेरे दो चेक चोरी हुए थे, एक एकाउंट में पांच हजार रूपये थे, कम रकम होने की वजह से उससे पैसा नहीं निकाला गया. दूसरा चेक जो मैने एसबीआई क्रेडिट कार्ड के नाम से 9101.22 रूपये का जारी किया था, उस एकाउंट से 20 हजार रूपये निकाल लिए गए. इस एकाउंट में करीब 22 हजार रूपये थे. इससे लगता है कि चेक चोरों ने पैसा निकालने से पहले मेरा एकाउंट बैलेंस चेक किया था.” इसी तरह से श्रीराम पेंट्स ने 12,012 रूपये का चेक जारी किया था, लेकिन चोरों ने उनके एकाउंट से 40 हजार रूपये निकाले. बियरर चेक द्वारा किसी भी एकाउंट से 50 हजार रूपये से ज्यादा नगद निकालने पर रकम निकालने वाले व्यक्ति को अपना पैन नंबर और परिचय पत्र देना होता है. इसलिए चोरों ने प्रीमियर पेंट्स के एकाउंट से 48 हजार रूपये निकाले. जबिक उन्होंने 90 हजार का चेक जारी किया था. यानी उनके खाते में कङीं ज्यादा पैसे थे. चारो चेक से पैसे एक ही व्यक्ति ने निकाले हैं. सभी बियरर चेक करन के नाम से ही कैस कराए गए हैं. कैशियर के कहने पर करन ने चेक पीछे जो अपना मोबाइल नंबर दिया है वह नई दिल्ली स्थित नागालैंड हाउस के एक सुरक्षाकर्मी का है.
अभी तक नकली नोटों और नकली क्रेडिट कार्ड का मामला ही सामने आया है. लिहाजा, सतर्कता बरतते हुए पुलिस और सरकार ने इसे रोकने के लिए न केवल जागरुकता अभियान चलाया है बल्कि बैंकों के लिए कई तरह की गाइडलाइन भी तैयार की है. सरकार और खासकर रिजर्व बैंक को चेक क्लोनिंग के मामले को भी गंभीरता से लेना चाहिए और इसे रोकने के लिए नकली नोट पकड़ने वाली मशीन की तरह नकली चेक पकड़ने वाली मशीन की व्यवस्था करनी चाहिए. क्रेडिट कार्ड के मुकाबले भारत में चेक प्रचलन कहीं बहुत ज्यादा है. नकली चेक को पहचानने के लिए अगर जल्दी ही कोई कदम नहीं उठाए गए तो, बहुत सारे लोग कंगाल हो जाएंगे.
बीटी कॉटन की खेती सब लील रही है
उन्नत खेती और पशुपालन के दम पर समृद्धि का प्रतीक बने हरियाणा में पिछले साल भर से यहां के पशुओं में बीमारियां बढ़ रही हैं और राज्य की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली भैसों की मौतों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है. गाय और भैसों की गर्भ धारण क्षमता और दूध की मात्रा भी लगातार कम होती जा रही है. ऐसा क्यों हो रहा है, सरकार इससे बेपरवाह है. लेकिन किसानों को अब इसकी वजह समझ में आने लगी है. वे मानने लगे हैं कि बीटी काटन की खल और बीज खिलाने से ही उनके पशुओं में बीमारियां और मौते हो रही हैं. उनकी गर्भ धारण क्षमता प्रभावित हो रही है. इतना ही नहीं, बीटी काटन की खेती से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव अब हरियाणा में साफ तौर पर दिखने लगा है. बीटी काटन की खेती में काम करने वाले किसान और मजदूर बड़े पैमाने पर खुजली जैसी बीमारी के शिकार हो रहे हैं.
हरियाणा के विभिन्न जिलों में घूम कर जो खोजबीन की उससे पता चला कि बीटी काटन के खेतों में काम करने वाले किसानों में यह बीमारी आम है. अगर सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो यह महामारी का भी रूप ले सकती है. जीन में परिवर्तन कर तैयार किए खाद्यानों व सब्जियों की खेती से पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर दुनियाभर में बहस चल रही है. बीटी काटन पारंपरिक काटन के बीज में बायो तकनीक के जरिए बैसिलस थूरीनजैनसिस (बीटी) नामक वायरस का जीन डालकर बनाया जाता है. बीटी वायरस एक खास तरह का जहर पैदा करता है, जिससे कपास को नुसकसान पहुंचाने वाले कीडे अमेरिकन शुंडी की मौत हो जाती है. बीटी काटन की खासियत यह होती है कि इससे पैदा हुए बीज का इस्तेमाल अगर किसान करता है तो इससे उसकी पैदावार प्रभावित होती है. इसलिए उसे हर बार कंपनी से नया बीज ही लेना पड़ेगा. इससे बीटी काटन बीज बनाने वाली कंपनियों को भारी मुनाफा होता है. कृषि विशेषज्ञ और किसान बचाओ आंदोलन के संयोजक डा. सुधीर कौड़ा कहते हैं, “अध्ययननों से पता चला है कि जैव तकनीक से तैयार बीटी काटन में सायनाइट जैसा जहरीला व विषाक्त पदार्थ होता है. अगर इसके पौधे या बीज को पशु खाता है तो यह जहर उसमें प्रवेश कर जाता है. इससे पशु गंभीर बीमारी व मौत का शिकार हो सकता है. हरियाणा में यह बड़े पैमाने पर दिखाई दे रहा है. दूध और घी के जरिए यह जहर मनुष्य में भी प्रवेश कर सकता है. जिसका भयानक दुष्परिणाम हो सकता है.” हरियाणा का घी और मख्खन तो दूसरे राज्यों में भी भेजा जाता है. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो इसका असर व्यापक होगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है. यहां का किसान एक भैंस के दूध से अमूनन पांच से छह हजार रूपये महीना कमा लेता है.
हिसार से करीब 20 किमी दूर धानसू गांव के लोग दो साल से बीटी काटन की खेती करते हैं. हमारी मुलाकात यहां बीटी काटन की खेती करने वाले ओम प्रकाश से होती है. ओम प्रकाश का पूरा परिवार खुजली से पीड़ित है. ओम प्रकाश कहते हैं, “इस साल गांव के बहुत सारे लोगों को खुजली हुई है. कुत्ते और भेंसे भी इस बीमारी से पीड़ित हैं.” द संडे इंडियन ने गांव में जाकर सर्वे किया तो तमाम लोग और उनके पशु खुजली के बीमारी से पीड़ित थे. वहीं हमें कई ऐसे भी लोग मिले जिनके पशुओं की मौत हो गई थी. जाबर सिंह कहते हैं, “पिछले छह महीने में गांव में पचास से ज्यादा भैसों की मौत हुई है. साथ ही अब भैसे ब्याने में भी काफी समय लेने लगी हैं.” गांव के रिटायर मेजर आरपी बाना को भी गांव में पिछले साल भर से काफी बदलाव नजर आ रहा है. वे कहते हैं, “गांव के ज्यादातर लोग खुजली की बीमारी से पीड़ित हैं. भैसों में बांझपन बढ़ रहा है, या फिर वे देर से ब्या रही हैं. पशुओं में बीमारी भी और मौतें भी बढ़ रही हैं. मैने गांव वालों से सुना है कि यह सब बीटी के खल और बिनौले खिलाने से हो रहा है. गांव की इंदों की भैस की की चार दिन पहले ही मौत हुई थी. भैस की कीमत 33 हजार रूपये थी. वे कहती हैं, “हम अपनी भैस को सुबह-शाम मिला कर चार किलो बिनौला की खल खिलाते थे. वह ठीक थी. अचानक एक दिन वह शाम को वह दम तोड़ देती है.” हिसार जिले के ही तलवंडी राना गांव के चांदी राम की चार भैसे जब एक साथ मर गई तो उन्होंने पशुओं को विनौला और उसका खल खिलाना बंद कर दिया. वे कहते हैं, “बिनौले की खल से अब डर लगने लगा है. इसकी वजह से मेरी भैसों का देर से गर्भ ठहरता था या फिर कई गर्भपात हो जाता था. लिहाजा, अब मैं अपने पशुओं को गेहूं और बाजरा खिलाना शुरु कर दिया है.”
यहां के बाद हम हिसार के दूसरे छोर पर स्थित गांव सदलपुर पहुंचते हैं. यहां हमारी मुलाकात हनुमान प्रसाद से होती है. बजुर्ग हनुमान प्रसाद ने भी अनुभव किया की बिनौला और उसका खल खिलाने से पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. वे अपनी भैंस और उसके बच्चे को दिखाते हुए कहते हैं, “उनकी भैस ने तय समय से एक महीने पहले ही बच्चे जन्म दिया. इससे बच्चा छोटा और कमजोर पैदा हुआ है.” वे आगे कहते हैं, “हाल ही में मेरी जानकारी में कई लोगों की भैंसों ने समय से पहले बच्चा जन्मा है. दरअसल, लोग इस बात को छिपाते हैं क्योंकि इससे भैस की कीमत घट जाती है.” हनुमान प्रसाद हमें बनवारी के पास लेकर जाते हैं जिसकी हफ्ते भर पहले ही बीमारी से भैस मरी है. बनवारी कहते हैं, “एक और बीमारी यहां देखने को मिल रही है कई भैसों का शरीर (बच्चेदानी) बाहर निकल आता है. इससे भी कई बार पशु की मौत हो जाती है.”
बीटी काटन के अपने खेतों में चुगाई कर रही फतेहाबाद जिले के बड़ोपड़ गांव की कृष्णा भी खुजली की शिकार हैं और हमें बताती हैं कि उनके गांवों में भी बीमारी की वजह से हाल ही में कई लोगों की भैंसे मरी हैं. हम जिन गांवों में जाते हैं तकरीबन हर जगह हमें खुजली और भैसों के बीमारी की बात पता चलती. बड़ोया गांव की सतपाल, निर्मला और सुनीता खुजली के धब्बों को हमें दिखाती हैं. तो सुनीता हाल ही में मरी अपनी भैंस को याद कर गमगीन हैं. सुनीता बताती हैं कि भैंस की बीमारी पर उन्होंने हजारों रूपये खर्च कर दिए. वे कहती हैं, “पहले सरकारी डाक्टर से इलाज कराते थे, वह 70 रूपये फीस लेता था. जब आराम नहीं हुआ तो प्राइवेट डाक्टर को बुलाया वह 150 रूपये फीस लेता था. दवा का खर्च अलग था.” जाहिर है भैस की बीमारी का फायदा उठा कर सरकारी व निजी पशु चिकित्सक भी अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं. सतपाल कहते हैं, “इस बार भैसें बहुत बीमार हो रही हैं.” धानियां गांव के रणबीर की भी यही शिकायत है कि उनकी भैस भी अचानक मर गई. उसे उन्होंने 32 हजार में खरीदी थी. वे कहते हैं, “मेरी जानकारी में गांव में 10 दिन में पांच लोगों की भैंसे मरी हैं.”
सिरसा जिले के थेड़ी बाबा सावंतसिंह गांव के रहने वाले एनआरआई हरपाल सिंह ग्रेवाल बड़े किसान और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल कहते हैं, “मै एक चैरिटेबल अस्पताल से जुड़ा हुआ हूं, इस अस्पताल के रिकार्ड बताते हैं कि यहां इस साल खुजली के मरीजों की संख्या भयानक रूप से बढ़ी है. ये वे लोग हैं जो बीटी काटन के खेतों में काम करते हैं.” वे अपने इलाके में पशुओं की बीमारी और उनकी मौतों को भी स्वीकार करते हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल हमें अपने साथ कोटली गांव ले जाते हैं. करीब सात हजार आबादी वाला यह गांव बीटी काटन के मजदूरों के गांव के रूप में जाना जाता है. गांव के मजदूर गुजरात तक काटन चुनने जाते हैं. गांव में मेड़िकल स्टोर चलाने वाले पवन तनेजा कहते हैं, “गांव के तकरीबन हर मजदूर खुजली की बीमारी से ग्रस्त है. हर रोज दो तीन मजदूर उनके पास दवाई लेने आ ही जाता है.”
बीटी काटन की खेती का जैसा दुष्परिणाम हरियाणा में दिखना शुरु हुआ है, वह आंध्र प्रदेश में पहले ही दिख चुका है. करीब साल भर पहले आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में बीटी काटन के बीज और खल कान से सैकड़ों भेड़ों की मौत हो गई थी. तब आंध्र प्रदेश सरकार के पशुपालन विभाग ने इसकी जांच कराई तो पौधे में साइनाट की मात्रा पाए जाने पर किसानों को बीटी काटन के पोंधों और बीज व खल से अपने पशुओं को दुर रखने की हिदायत दी. लेकिन बाद में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी जांच में आंध्र सरकार की रिपोर्ट को गलत करार कर बीटी काटन के बीज और खल को पशुओं के लिए हानि रहित बताया. प्रर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर कई वैज्ञानिकों ने सवाल भी उठाया है. देश के जानेमाने वैज्ञानिक और सेंटर फार सेलुलर और मोलेक्यूलर बाइलोजी के पूर्व फाउंडर डायरेक्टर प्रो. पी. एम भार्गव ने पर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर सवाल उठाते हुए बीटी काटन के दुष्परिणामों से सरकार को चेताया भी है.
हमने जब राज्य में पशुओं की तेजी से हो रही मौतों और बढ़ते खुजली की बीमारी के बारे में हरियाणा सरकार के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. हरियाणा के पशुपाल व डेरी विभाग के महानिदेशक डा. एस. के डांगी ने कहा, “हरियाणा में पशुओं में न कोई बीमारी फैली है और नहीं उनकी किसी बीमारी से मौत हो रही है.” जबकि हरियाणा स्वास्थ सेवा के महानिदेशक डा. अविनाश शर्मा का कहना था, “आप के फोन आने से पहले मैं जिले के चिकित्सा अधिकारियों से विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग कर रहा था, उन्होंने मुझे ऐसी किसी बीमारी के बारे में तो नहीं बताया.” वहीं जब हमने हिसार स्थित केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के पशु पोषाहार विभाग (एनीमल न्यूट्रीशियन डीवीजन) के अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. टी. आर चौहान से बीटी काटन की खल और बीज का पशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “पशु आहार में 35 फीसदी से ज्यादा खल नहीं होनी चाहिए. इसमें भी बिनौले की खल की मात्रा 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. जरूरत से अधिक मात्रा में अगर कोई चीज अगर खिलाई जाएगी, उसके नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं.” सरकार भले इनकार करे लेकिन स्वामी रामदेव के गुरु आचार्य बलदेव ने जिंद स्थित आर्स महाविद्यालय गुरुकुल गोशाला में बीटी काटन के बीज और खल के असर का प्रयोग किया और नतीजा काफी खतरनाक निकला. गोशाला के प्रबंधक आचार्य धर्म देव कहते हैं, “जब हमने कुछ महीने तक गायों को बीटी कायन के बीज और खल खिलाए तो उन्होंन दूध देना कम कर दिया और उनमें से कई बीमार हो गईं. लेकिन जब हमने इसे बंद कर दिया तो न केवल उनका दूध बढ़ा बल्कि वे पहले से चुस्त रहने लगीं.”
खैर, यह तो वैज्ञानिक जांच के बाद ही पता चलेगा कि आखिर पशुओं की बीमारी व मौत और खुजली की वजह बीटी काटन है या कुछ और. लेकिन यह तय है कि अगर इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो पशुपालन पर आधारित हरियाणा की अर्थ व्यवस्था चौपट हो सकती है और हरियाणा में प्रचलित यह जुमला “जिसके घर में काली (भैंस), उसके घर में सदा दिवाली” अपना अर्थ खो देगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है.
आखिर किसने बनाया आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी
उस दिन अखबार की सुर्खियां खून से लथपथ थी. तमाम अखबार चीख चीख कर कह रहे थे, “दिल्ली, अहमदाबाद और उत्तर प्रदेश की अदालतों में सीरियल ब्लास्ट कर तबाही करने वाले आतंकी आजमगढ़ के रहने वाले थे.”… टीवी पर एंकर चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था, “आजमगढ़ है आतंकवाद की नर्सरी....” शाम ढलते-ढलते समाचार चैनलों ने देश भर में हुए तमाम विस्फोटों के तार आजमगढ़ से जोड़ दिए. अचानक उत्तर प्रदेश का यह जिला अंतरऱाष्ट्रीय पटल पर छा जाता है. टीवी देखते-देखते मैं स्मृतियों में खो जाता हूं और आजमगढ़ में बिताए बचपन के दिन सिनेमा की रील तरह आंखों से गुजरने लगते हैं.
मेरा आजमगढ़.... कैफी आजमी और राहुल सांस्कृत्यायन का आजमगढ़... गंगा जमुनी संस्कृति का आजमगढ़... लेकिन मेरा आजमगढ़ तो ऐसा नहीं था, जैसा आज दिखाई दे रहा है. नब्बे के दशक में हमारे राजनेताओं ने अपने चंद स्वार्थों के लिए हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत के जो बीज बोए, 18 साल बाद आज हम उसी की फसल काट रहे हैं. मुझे अपने प्यारे दोस्त साजिद का वह मासूम चेहरा आज भी अच्छी तरह याद है. कैसे मंदिर आंदोलन ने हम दोनों की दोस्ती को अलविदा कर दिया था. दोनों के बीच नफरत के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे मासूम मन तब समझ नहीं पाया था. “राम लला हम आंएगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” के नारों की गूंज ने मेरे सहपाठियों राशिद, सलाउद्दीन, हासिम, फरदीन.... को भी मुझसे दूर कर दिया था. तब मैं दसवी में पढ़ता था. मुझे आज भी याद है साजिद की अम्मी की वे दुलार भरी आंखें... उनके कोमल हाथ, जिसे वे हमारे माथे पर फेर कर लंबी उम्र की दुआएं दिया करती थीं. शाम को स्कूल की छुट्टी हुई नहीं, मैं साजिद के घर पहुंच जाता था. या फिर साजिद मेरे घर आ जाता था. दोनों छत पर घंटों बैठते और सपने बुनते. हमारे सपनों में फौज हुआ करती थी. हम दोनों सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते थे.
लेकिन सपने बुनने का सिलसिला अचानक एक दिन रुक जाता है. तब 15 साल की उम्र में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं हिंदू हूं और साजिद मुसलमान और हिंदू और मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते. साजिद मुझसे मिलने मेरे घर आता है और मेरे घर के लोग उसके साथ न केवल दुर्व्यवहार करते हैं, बल्कि उसे दुबारा कभी घर न आने की हिदायत भी देते हैं. मुझसे कहा जाता है कि साजिद मुसलमान है, इसलिए वह कभी घर नहीं आना चाहिए. मैं चुपके से घरवालों की नजरें बचा कर साजिद से मिलने उसके घर जाता हूं. लेकिन वहा भी वही हालात थे, जो मेरे घर में थे. तब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं द्वारा हमें बताया गया कि मुसलमान इस देश के नहीं हैं. वे आक्रमणकारी हैं. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों, हिंदुओं पर सैकड़ों साल तक जुल्म ढाया है. हमारे मंदिरों को उजाड कर मसजिद बना डाला है. हमें मसजिद को तोड़ कर मंदिर बनाना है. देखते-देखते पूरी फिजा में अशोक सिंघल, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार के आग उगलते भाषण गूंजने लगते हैं. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेता लोगों को कार सेवक बनाने लगे. गांव के जिस मंदिर में कभी दिया नहीं जतला था, उसमें 24 घंटे भजन कीर्तन होने लगा. जिस मसजिद में मौलवी साहब अकेले अजान दिया करते थे, उसमें लाउड स्पीकर के जरिए सैकड़ों अजान की आवाज सुनाई देने लगी. और हां, मसजिद के बाहर शाम की अजान के वक्त मौलवी साहब से अपने बच्चों की नजरे उतरवाने के लिए हिंदू मांओं की जो लंबी कतार लगती थी, वह भी अचानक काफूर हो जाती है. जिन बाबू मियां और फकीरिन चच्ची का हमारे घर खूब आना-जाना हुआ करता था, अचानक वह बंद हो जाता है. तब पहली बार मैने साजिद के चेहरे पर खौफ देखा था...मौत का खौफ. जब मैने गौर किया तो पाया कि यह खौफ तो गांव के सभी मुसलमान बच्चों के चेहरे पर दिखाई दे रहा था. और एक दिन साजिद जब स्कूल के रास्ते में मिला तो उसने मुझसे डरते हुए कहा, “हमें हिंदू लोग मार डालेंगे.”
और इस बीच एक दिन आजमगढ़ से सटे फौजाबाद जिले में स्थित अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा दी गई. कहा गया कि हिंदुओं के माथे पर लगा कलंक मिटा दिया गया है. इस खुशी में मिठाईंयां बांटी जाती हैं. कई जगह दंगे होते हैं. दोनों संप्रदायों के ढेर सारे निर्दोष लोग दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं. गांव और शहर खामोश हो जाते हैं. खैर, कुछ दिन बाद यह खामोशी तो छंट जाती है, लेकिन नफरत का गुबार नहीं. उस समय हिंदू और मुसलमानों में नफरत की जो खाई बनी, वह फिर कभी भर न सकी. बल्कि नई पीढ़ी के बीच वह और चौड़ी होती गई. आजमगढ़ कभी अंडरवर्ल्ड का गढ़ हुआ करता था. कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान यही का रहने वाला था. दाउद के पिता ओर अबू सलेम का घर भी आजमगढ़ ही है. इनके गिरोहों में हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के लोग हुआ करते थे. दाऊद के करीबियों में तो मुसलमानों से ज्यादा संख्या हिंदुओं की थी. लेकिन बाबरी मसजिद के विध्वंस ने अंडरवर्ल्ड को भी दो खेमों में बांट दिया. इससे पहले आजमगढ़ अपराध की धरती थी, लेकिन नफरत की नहीं. 1992 के बाद देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी नफरत की फसल लहलहाने लगी. फर्क सिर्फ इतना था कि यहां अंडरवर्ल्ड के जरिए आईएसआई और दहशदगर्दों ने नफरत करने वाले लोगों के हाथों में हथियार पकड़ा दिया.
करीब 16 साल बाद एक दिन जब मैं साजिद से मिला तो वह बिल्कुल बदल चुका था. उसका बदला रूप देख कर मैं चौक गया. उसके चेहरे की मासूमियत नफरत में तब्दील हो चुकी थी. सेना में भर्ती होकर देश सेवा का सपना संजोने वाला नौजवान जेहादी बनना चाहता है. गुजरे वक्त ने साजिद को जेहाद का समर्थक और ओसामा बिन लादेन का फैन बना दिया था. घंटे भर की मुलाकात के दौरान वह लगातार मुझसे शिकायत करता रहा कि इस मुल्क में अब वह सुरक्षित नहीं है. यह असुरक्षा की भावना आजमगढ़ के नई पीढ़ी के नौजवानों में घर कर गई है. बाबरी मसजिद को गिरते देखने वाली पीढ़ी अब नौजवान हो गई है. अगर ऐसे में कोई आतंकी संगठन या फिर आइएसआई नौजवानों को गुमराह कर दे, तो उन्हें शायद बंदूक उठाते देर न लगे. हो सकता है आतिफ और साजिद के साथ भी ऐसा ही हुआ हो. आज जब आजमगढ़ के बारे में सोचता हूं तो खुद से सवाल करता हूं, “आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी किसने बनाया है?” आतिफ ने या फिर अशोक सिंघल, मुलायम सिंह, इमाम बुखारी और सैयद शहाबुद्दीन ने.
मेरा आजमगढ़.... कैफी आजमी और राहुल सांस्कृत्यायन का आजमगढ़... गंगा जमुनी संस्कृति का आजमगढ़... लेकिन मेरा आजमगढ़ तो ऐसा नहीं था, जैसा आज दिखाई दे रहा है. नब्बे के दशक में हमारे राजनेताओं ने अपने चंद स्वार्थों के लिए हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत के जो बीज बोए, 18 साल बाद आज हम उसी की फसल काट रहे हैं. मुझे अपने प्यारे दोस्त साजिद का वह मासूम चेहरा आज भी अच्छी तरह याद है. कैसे मंदिर आंदोलन ने हम दोनों की दोस्ती को अलविदा कर दिया था. दोनों के बीच नफरत के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे मासूम मन तब समझ नहीं पाया था. “राम लला हम आंएगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” के नारों की गूंज ने मेरे सहपाठियों राशिद, सलाउद्दीन, हासिम, फरदीन.... को भी मुझसे दूर कर दिया था. तब मैं दसवी में पढ़ता था. मुझे आज भी याद है साजिद की अम्मी की वे दुलार भरी आंखें... उनके कोमल हाथ, जिसे वे हमारे माथे पर फेर कर लंबी उम्र की दुआएं दिया करती थीं. शाम को स्कूल की छुट्टी हुई नहीं, मैं साजिद के घर पहुंच जाता था. या फिर साजिद मेरे घर आ जाता था. दोनों छत पर घंटों बैठते और सपने बुनते. हमारे सपनों में फौज हुआ करती थी. हम दोनों सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते थे.
लेकिन सपने बुनने का सिलसिला अचानक एक दिन रुक जाता है. तब 15 साल की उम्र में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं हिंदू हूं और साजिद मुसलमान और हिंदू और मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते. साजिद मुझसे मिलने मेरे घर आता है और मेरे घर के लोग उसके साथ न केवल दुर्व्यवहार करते हैं, बल्कि उसे दुबारा कभी घर न आने की हिदायत भी देते हैं. मुझसे कहा जाता है कि साजिद मुसलमान है, इसलिए वह कभी घर नहीं आना चाहिए. मैं चुपके से घरवालों की नजरें बचा कर साजिद से मिलने उसके घर जाता हूं. लेकिन वहा भी वही हालात थे, जो मेरे घर में थे. तब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं द्वारा हमें बताया गया कि मुसलमान इस देश के नहीं हैं. वे आक्रमणकारी हैं. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों, हिंदुओं पर सैकड़ों साल तक जुल्म ढाया है. हमारे मंदिरों को उजाड कर मसजिद बना डाला है. हमें मसजिद को तोड़ कर मंदिर बनाना है. देखते-देखते पूरी फिजा में अशोक सिंघल, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार के आग उगलते भाषण गूंजने लगते हैं. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेता लोगों को कार सेवक बनाने लगे. गांव के जिस मंदिर में कभी दिया नहीं जतला था, उसमें 24 घंटे भजन कीर्तन होने लगा. जिस मसजिद में मौलवी साहब अकेले अजान दिया करते थे, उसमें लाउड स्पीकर के जरिए सैकड़ों अजान की आवाज सुनाई देने लगी. और हां, मसजिद के बाहर शाम की अजान के वक्त मौलवी साहब से अपने बच्चों की नजरे उतरवाने के लिए हिंदू मांओं की जो लंबी कतार लगती थी, वह भी अचानक काफूर हो जाती है. जिन बाबू मियां और फकीरिन चच्ची का हमारे घर खूब आना-जाना हुआ करता था, अचानक वह बंद हो जाता है. तब पहली बार मैने साजिद के चेहरे पर खौफ देखा था...मौत का खौफ. जब मैने गौर किया तो पाया कि यह खौफ तो गांव के सभी मुसलमान बच्चों के चेहरे पर दिखाई दे रहा था. और एक दिन साजिद जब स्कूल के रास्ते में मिला तो उसने मुझसे डरते हुए कहा, “हमें हिंदू लोग मार डालेंगे.”
और इस बीच एक दिन आजमगढ़ से सटे फौजाबाद जिले में स्थित अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा दी गई. कहा गया कि हिंदुओं के माथे पर लगा कलंक मिटा दिया गया है. इस खुशी में मिठाईंयां बांटी जाती हैं. कई जगह दंगे होते हैं. दोनों संप्रदायों के ढेर सारे निर्दोष लोग दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं. गांव और शहर खामोश हो जाते हैं. खैर, कुछ दिन बाद यह खामोशी तो छंट जाती है, लेकिन नफरत का गुबार नहीं. उस समय हिंदू और मुसलमानों में नफरत की जो खाई बनी, वह फिर कभी भर न सकी. बल्कि नई पीढ़ी के बीच वह और चौड़ी होती गई. आजमगढ़ कभी अंडरवर्ल्ड का गढ़ हुआ करता था. कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान यही का रहने वाला था. दाउद के पिता ओर अबू सलेम का घर भी आजमगढ़ ही है. इनके गिरोहों में हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के लोग हुआ करते थे. दाऊद के करीबियों में तो मुसलमानों से ज्यादा संख्या हिंदुओं की थी. लेकिन बाबरी मसजिद के विध्वंस ने अंडरवर्ल्ड को भी दो खेमों में बांट दिया. इससे पहले आजमगढ़ अपराध की धरती थी, लेकिन नफरत की नहीं. 1992 के बाद देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी नफरत की फसल लहलहाने लगी. फर्क सिर्फ इतना था कि यहां अंडरवर्ल्ड के जरिए आईएसआई और दहशदगर्दों ने नफरत करने वाले लोगों के हाथों में हथियार पकड़ा दिया.
करीब 16 साल बाद एक दिन जब मैं साजिद से मिला तो वह बिल्कुल बदल चुका था. उसका बदला रूप देख कर मैं चौक गया. उसके चेहरे की मासूमियत नफरत में तब्दील हो चुकी थी. सेना में भर्ती होकर देश सेवा का सपना संजोने वाला नौजवान जेहादी बनना चाहता है. गुजरे वक्त ने साजिद को जेहाद का समर्थक और ओसामा बिन लादेन का फैन बना दिया था. घंटे भर की मुलाकात के दौरान वह लगातार मुझसे शिकायत करता रहा कि इस मुल्क में अब वह सुरक्षित नहीं है. यह असुरक्षा की भावना आजमगढ़ के नई पीढ़ी के नौजवानों में घर कर गई है. बाबरी मसजिद को गिरते देखने वाली पीढ़ी अब नौजवान हो गई है. अगर ऐसे में कोई आतंकी संगठन या फिर आइएसआई नौजवानों को गुमराह कर दे, तो उन्हें शायद बंदूक उठाते देर न लगे. हो सकता है आतिफ और साजिद के साथ भी ऐसा ही हुआ हो. आज जब आजमगढ़ के बारे में सोचता हूं तो खुद से सवाल करता हूं, “आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी किसने बनाया है?” आतिफ ने या फिर अशोक सिंघल, मुलायम सिंह, इमाम बुखारी और सैयद शहाबुद्दीन ने.
Monday 31 December 2007
कहां है दलितों की सरकार...
दलित...यह एक ऐसा शब्द है, जो सदियों से नफरत और हिकारत का पर्याय रहा है. हजारों सालों से वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से शोषित होता आ रहा है. वह अपने वोट की ताकत से लोगों को सत्ता में पहुंचाता रहा, लेकिन खुद सत्ता से बहुत दूर, सामाज के अंतिम पायदान पर खड़ा रहा. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार दलितों के राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है. यहां अब दलितों की सरकार है. बसपा सरकार के शासन में दलित खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं, क्या उनके जीवन में कोई बदलाव आ रहा है...इसी का जायजा लेने के लिए मैं एक सप्ताह तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर था. जो देखा वह आप के सामने हैं....
मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी उस पच्चीस साल की दलित विधवा सुनीता की सूरत बार-बार आखों के सामने आ जाती..वह दो बच्चों की मां थी. ऐसे बच्चे, जिनके सिर से बाप का साया उठ चुका है. दिसंबर की गुलाबी ठंड में बिना गर्म कपड़ों के वे बच्चे... "जब बाप ना बाय, तो गरम कपड़ा के दिआई???" एक मां की दुख भरी आवाज बार बार कानों में कचोट रही थी. वोट किसे देते हो? "हाथी पे..." क्यों देते हो? "इ हमार पार्टी है." मायावती को जानते हो...? "हां, स्कूल में मास्टरनी हैं.. " कांशीराम को जानते हो? "इ के है?... रहुला के चाचा हैं." सरकार से क्या चाहते हो?.. "अंतोदय कार्ड.."
सुनीता दो बार से बसपा को वोट दे रही है, अब उसकी सरकार है. क्या उसकी एक छोटी-सी ख्वाहिश भी पूरी नहीं हो सकती? उसके सपने केवल अंत्योदय कार्ड तक सिमट के रह जाते हैं. सुनीता कहती हैं, "बीडीओ साहब से कह कर हमारा कार्ड बनवा दीजिए. कम से कम दो जून की रोटी तो मिल जाएगी. नहीं तो मर जाएंगे." पति के इलाज के लिए सुनीता ने खेत गिरवी रख दिया था. फिलहाल, वह दूसरे के खेतों से बथुआ लाकर बच्चों का पेट पाल रही है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल घूम रहा था. सुनीता बथुआ का साग खिला कर कब तक अपने बच्चों को जिंदा रख पाएगी? क्या बसपा सरकार में उसके हालात बदलेंगे? यह सोच ही रहा था कि ड्राइवर की तेज आवाज से मेरा ध्यान भंग होता है. "साहब, अंबेडकर गांव का बोर्ड लगा है, गाड़ी मोड़ दूं?" मेरे सामने राज्य की राजधानी लखनऊ से महज 30 किलोमीटर दूर शिवपुरी गांव की सुनीता की बातें फ्लैशबैक की तरह घूम रही थी.
हम अंबेडकर बस्ती की तरफ मुड़ जाते हैं. मैं मायावती सरकार के छह महीने बीतने के बाद लोकतंत्र के उस उत्सव की खुशी की तपिश महसूस करने निकला था जिसे दलितों ने अपने वोट से साकार किया था. पहली बार पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार बनी है. दलितों की सरकार... समाज के हाशिए पर खड़े सबसे गरीब आदमी की सरकार... जिसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी उसकी सरकार बनेगी. लेकिन इस यात्रा से महसूस हुआ बसपा सरकार बनने से दलित खुश तो हैं लेकिन फिलहाल उनके जीवन में बहुत कुछ बदला नहीं है. न ही उन्हें कोई उम्मीद है कि उनके जीवन में कोई बदलाव होगा. सुनीता जैसे लाखों लोग एक अदद बीपीएल और अंत्योदय कार्ड के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिस पर उनका हक है. लेकिन गरीबों का हक मार कर गांव के दबंग लोगों ने बीपीएल और अंतोदय कार्ड बनवा लिया है. इस कार्ड के जरिए गरीब दलितों को हर महीने बहुत ही सस्ते में 35 किलो राशन मिल जाता है.
टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होते हुए हम अंबेडकर नगर के सीमई कारीरात गांव की अंबेडकर बस्ती में पहुंचते हैं. बस्ती तक पक्की सड़क है. अंबेडकर नगर संसदीय क्षेत्र से मायावती चुनाव लड़ती है. मायावती के राज्यसभा में जाने बाद फिलहाल इस संसदीय सीट पर सपा का कब्जा है, लेकिन इलाके के पांचों विधायक बसपा के हैं. सीमई कारीरात की दलित बस्ती की सूरत बिलकुल अलग है. यहां समृद्धि दिखाई देती है. बस्ती के ज्यादातर मकान पक्के हैं. लड़के और लड़कियां कालेज में पढ़ते हैं. कई लोग सरकारी नौकरी में हैं. जब इस बस्ती की तरफ देखता हूं तो दूर क्षितिज में फिर से सुनीता का असहाय चेहरा दिखाई देने लगता है...
सीमई कारीरात की दलित बस्ती में पहली बार पिछले साल मई में ‘डीजे’ आया था... अंबेडकर की आदमकद मूर्ति के सामने उस दिन रात भर नाच गाना हुआ... पूड़ी और खीर बांटी गई... युवाओं के साथ-साथ बुजर्गों ने भी ठुमके लगाए. यह कोई शादी का अवसर नहीं था. यह सदियों से सताए गए दलितों के सत्ता प्राप्ति का उत्सव था. प्रजा से राजा बनने की खुशी का अवसर था. पूरी बस्ती में वह खुशी आज भी दिखाई देती है. गांव के नौजवान अनिल गर्व से कहते हैं, "गांव के सवर्णों की अब पहले जैसी हिम्मत नहीं रही. कालेज में अभी हाल में झगड़ा हुआ तो हमने सवर्ण लड़कों को खूब पीटा और सीना चौड़ा करके घर आए. वे हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पाए." बगल में खड़े रिटायर शिक्षक और बस्ती के युवाओं को वैचारिक खुराक देने वाले बुधिराम कहते हैं, "बसपा की सरकार नहीं होती तो वे हमें दबा लेते. मायावती के मुख्यमंत्री बनने से अब हम सिर उंचा करके चल सकते हैं." सीमई कारीरात वही ऐतिहासिक गांव है जहां एक पल्ले वाले दरवाजे लगाए जाते हैं. लेकिन दलितों ने विद्रोह किया और यहां ब्राह्मणों के इस फऱमान की परवाह किए बिना कि "इससे शिव भगवान नाराज हो जाएंगे" अपने घरों में दो पल्ले वाले दरवाजे लगा रहे हैं. बसपा सरकार बनने के बाद यह सिलसिला और बढ़ गया है. सीमई कारीरात के लोग खुश हैं. उन्हें लगता है कि बसपा शासन में य़ुवाओं को रोजगार मिलेगा और उन्हें सम्मान. लेकिन मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश की अपनी एक सप्ताह की यात्रा के दौरान सीमई कारीरात जैसी दूसरी दलित बस्ती नहीं मिली. लेकिन हां, हर दलित बस्ती में सुनीता जैसी महिलाओं से जरूर रूबरू होना पड़ता था.
पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिजली की जबरदस्त किल्लत है. अंधेरे को चीरते हुए हम शशि के घर पहुंचते हैं. घर के बाहर पुलिस का पहरा है. फैजाबाद के मिल्कीपुर में मोमबत्ती की रोशनी में हमारी मुलाकात शशि के पिता योगेंद्र कुमार से होती है. मोमबत्ती की लौ की तरह ही योगेंद्र की आंखे भी हिलती रहती हैं... कभी वे अंधेरे को देखते हैं तो कभी रोशनी को... लंबी चुप्पी के बाद वह अपनी बेटी शशि की हत्या का आरोप बसपा के पूर्व मंत्री आनन्द सेन यादव पर लगाते हैं. योगेंद्र बामसेफ के पुराने कार्यकर्ता हैं और कांशीराम के सपने को साकार करने और बसपा की सरकार बनवाने के लिए उन्होंने अपना बहुत कुछ स्वाहा किया है. वह कहते हैं, "बसपा के शासन में मेरी बेटी के हत्यारे खूलेआम घूम रहे हैं. जो मंत्री और विधायक मेरे घर पर आ कर कभी डेरा डाले रहते थे, वे अब मुझसे मुंह चुराने लगे है. जिस बसपा के लिए मैने कभी घर परिवार की चिंता नहीं, उसके शासन में मैं असहाय और लाचार महसूस कर रहा हूं. बात सुनने की बात तो दूर मायावती ने तो मुझसे मिलने से ही इनकार कर दिया." योगेंद्र कोई अकेले दलित नहीं हैं, जिन्होंने बसपा के लिए दिन-रात एक कर दिया और जब सरकार की मदद की जरूरत पड़ी तो उन्हें उपेक्षा ही मिली. दलितों का उत्पीड़न जारी है. तब भी पुलिस दबंगों का साथ देती थी और आज भी... बसपा शासन में भी दलित अपनी सामाजिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. लखनऊ के महिपत मऊं गांव के दलितों के घर में स्थानीय दंबग मुसलमानों ने घुस कर जम कर उत्पाद मचाया, महिलाओं और लड़िकयों से बलात्कार की कोशिश की. पीड़ित चंद्रिका प्रसाद कहते हैं, "अपराधियों पर पुलिस इसलिए कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, क्योंकि एक बसपा विधायक का उन्हें संरक्षण प्राप्त है." संकट की इस घड़ी में बसपा नेताओं ने भी इनसे किनारा कर लिया है... अपने भी पराए हो गए..
प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के भदेवरा गांव के दलित युवक चक्रसेन की गांव के दबंग ब्राह्मणों ने इसलिए हत्या कर दी थी कि उसका बीटेक में दाखिला हो गया था. चक्रसेन के परिवार के लोग स्थानीय बसपा विधायक पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हैं. जब चुनाव का बिगुल बजा तो भदेवरा के दलितों ने हर बार की तरह इस बार भी खुल कर बसपा का साथ दिया. जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उनके भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें लगा कि अब पंडित जी और बाबू साहब लोग उन्हें तंग नहीं करेगे. लेकिन कुछ दिन बाद ही उनका सपना काफूर हो गया. चक्रसेन के दादा शिव मूरत सहित बस्ती के लोग एक स्वर में कहते हैं, "यह दिन देखने के लिए थोड़ी हमने बसपा को वोट दिया था. अब हम लोग बसपा को वोट नहीं देंगे."
चक्रसेन का घर गांव के आखिरी छोर पर था. वैसे दलित बस्ती गांव के आखिरी छोर पर ही होती है. सवर्णों के घरों से काफी दूर... जब मैं चक्रसेन के घर पहुंचता हूं तो एक आदमी हमसे पूछताछ करने लगता है. पता चला वह हेड कांस्टेबल बुधराम सरोज हैं. चक्रसेन का परिवार पुलिस के सुरक्षा घेरे में है. मैं जब अपनी नोट बुक में पुलिसवालों का नाम नोट कर रहा था तो बुधराम धीरे से कहते हैं, "मेरे नाम के आगे एससी लिख लीजिए." पांच पुलिस वाले घर की रखवाली कर रहे हैं, एक कमरे के उस घर की, जिसमें कुछ है ही नहीं... बुधराम सरोज चक्रसेन के बूढ़े-लाचार दादा शिवमूरत की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "इनकी बहुत ही बुरी स्थिति है. घर में खाने तक को अनाज नहीं है." चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में लगे पांच पुलिसवालों में से तीन सवर्ण हैं, दो पंडित जी और एक ठाकुर साहब. जिस मड़ई में भैंस बांधी जाती थी, उसी में पांचो पुलिसवाले रह रहे हैं. खाना वे दलित बस्ती में ही एक साथ बनाते और खाते हैं. सवर्ण पुलिसवालों को एक गरीब दलित की सुरक्षा में लगना अखर रहा है. उनके चेहरे से यह साफ झलक रहा था... बुधराम सरोज कहते हैं, "अपने अब तक के कैरियर मैं मैने शिवमूरत जैसे गरीब आदमी को कभी पुलिस सुरक्षा मिलते नहीं देखा." शिवमूरत खुद मानते हैं, "अगर बसपा की सरकार न होती तो उन्हें पुलिस सुरक्षा नहीं मिलती." लेकिन वे आगे कहते हैं, "हमें पुलिस वालों की नहीं, न्याय की जरूरत है." बस्ती के लोग कभी जिन पुलिसवालों को देख कर छुप जाते थे, चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में उनकी तैनाती को वे एक अजूबा ही मानते हैं. आसपास के इलाके में इसकी चर्चा भी है.
रायबरेली कभी इंदिरा गांधी और अब सोनिया गांधी की वजह से जाना जाता है. घूमते-घूमते हम यहां के छतईंयां गांव की दलित बस्ती में पहुंचते हैं. अस्सी साल की अनपढ़ बुजर्ग महिला बिठाना इंदिरा गांधी के मुकाबले किसी को नेता नहीं मानती. सोनिया गांधी को वोट देने वाली बिटाना मायावती को चिल्ला चिल्ला कर खरी-खोटी सुनाती हैं और हवा में यह सवाल उछाल देती हैं, "मायावती अपना पेट भरेंगी कि हमारा?" शिवकुमार कहते हैं, "मेरे घर में पांच वोट हैं. वैसे तो हम सोनिया गांधी को चाहते हैं, लेकिन हर बार कम से कम दो वोट बसपा को जरूर देते हैं." ऐसा ही कुछ रवैया लखनऊ के शिवपुर गांव के दलितों का है. वे मुलायम के प्रशंसक हैं, लेकिन वोट बसपा को देते हैं. बाबूलाल पासी कहते हैं, "मुलायम सिंह की सरकार अच्छा काम करती है. लेकिन वोट मैं बसपा को ही देता हूं." यहां आकर बसपा की सफलता का राज समझ में आया. कांशीराम ने दलित और बसपा को एक दूसरे का पर्याय बना दिया है. यही वजह है कि दलित अब अपने को बसपा से अलग नहीं कर पाता. राम नरायण कहते हैं, “वह अगर किसी दूसरी पार्टी को वोट दे भी दें, तो लोग यकीन नहीं करते. उन्हें बसपा का ही माना जाता है.”
यह लखनऊ जिले के निगोहा गांव की अंबेडकर बस्ती है. हाल ही में इसे अंबेडकर बस्ती का दर्जा मिला है. मायावती सरकार का विकास कार्य यहां दिखाई देता है. 132 दलितों को घर बनाने के लिए पैसा मिल गया है. लेकिन भूमिहीन दलितों को पट्टा देने के लिए जमीन ही नहीं है. मायावती के सोशल इंजीनियरिंग की कामयाबी यहां दिखाई देती है. मैं दलित पंच गंगा सहाय के साथ गांव के प्रधान से मिलने जाता हूं. उनके घर के सोफे पर हम तीनों साथ बैठ कर बाते करते हैं और चाय पीते हैं. इस बारे में पूछने पर बसपा समर्थक गांव के प्रधान सुरेंद्र कुमार दीक्षित कहते हैं, "अब हम दलितों से बराबरी का व्यवहार करते हैं. मैं सर्दियों में अक्सर दलित बस्ती में जाकर वहां लोगों के साथ जमीन पर बैठ कर अलाव तापता हूं." उत्तर प्रदेश में कहीं-कहीं यह बदलाव दिखता, लेकिन बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर. अगर बसपा यह बदलाव लाने में कामयाब हो जाती है तो दलितों को वह सम्मान मिल जाएगा, जिसके लिए वे सदियों से संघर्ष करते आ रहे हैं. लेकिन आम दलित के लिए तो अभी यह सपने जैसा ही है.. हकीकत से बहुत दूर.. प्रतापगढ़ के गोपालपुर गांव के शिवबरन सरोज कहते हैं, "सवर्ण कभी नहीं चाहेंगे की हम उनकी बराबरी करें."
मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी उस पच्चीस साल की दलित विधवा सुनीता की सूरत बार-बार आखों के सामने आ जाती..वह दो बच्चों की मां थी. ऐसे बच्चे, जिनके सिर से बाप का साया उठ चुका है. दिसंबर की गुलाबी ठंड में बिना गर्म कपड़ों के वे बच्चे... "जब बाप ना बाय, तो गरम कपड़ा के दिआई???" एक मां की दुख भरी आवाज बार बार कानों में कचोट रही थी. वोट किसे देते हो? "हाथी पे..." क्यों देते हो? "इ हमार पार्टी है." मायावती को जानते हो...? "हां, स्कूल में मास्टरनी हैं.. " कांशीराम को जानते हो? "इ के है?... रहुला के चाचा हैं." सरकार से क्या चाहते हो?.. "अंतोदय कार्ड.."
सुनीता दो बार से बसपा को वोट दे रही है, अब उसकी सरकार है. क्या उसकी एक छोटी-सी ख्वाहिश भी पूरी नहीं हो सकती? उसके सपने केवल अंत्योदय कार्ड तक सिमट के रह जाते हैं. सुनीता कहती हैं, "बीडीओ साहब से कह कर हमारा कार्ड बनवा दीजिए. कम से कम दो जून की रोटी तो मिल जाएगी. नहीं तो मर जाएंगे." पति के इलाज के लिए सुनीता ने खेत गिरवी रख दिया था. फिलहाल, वह दूसरे के खेतों से बथुआ लाकर बच्चों का पेट पाल रही है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल घूम रहा था. सुनीता बथुआ का साग खिला कर कब तक अपने बच्चों को जिंदा रख पाएगी? क्या बसपा सरकार में उसके हालात बदलेंगे? यह सोच ही रहा था कि ड्राइवर की तेज आवाज से मेरा ध्यान भंग होता है. "साहब, अंबेडकर गांव का बोर्ड लगा है, गाड़ी मोड़ दूं?" मेरे सामने राज्य की राजधानी लखनऊ से महज 30 किलोमीटर दूर शिवपुरी गांव की सुनीता की बातें फ्लैशबैक की तरह घूम रही थी.
हम अंबेडकर बस्ती की तरफ मुड़ जाते हैं. मैं मायावती सरकार के छह महीने बीतने के बाद लोकतंत्र के उस उत्सव की खुशी की तपिश महसूस करने निकला था जिसे दलितों ने अपने वोट से साकार किया था. पहली बार पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार बनी है. दलितों की सरकार... समाज के हाशिए पर खड़े सबसे गरीब आदमी की सरकार... जिसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी उसकी सरकार बनेगी. लेकिन इस यात्रा से महसूस हुआ बसपा सरकार बनने से दलित खुश तो हैं लेकिन फिलहाल उनके जीवन में बहुत कुछ बदला नहीं है. न ही उन्हें कोई उम्मीद है कि उनके जीवन में कोई बदलाव होगा. सुनीता जैसे लाखों लोग एक अदद बीपीएल और अंत्योदय कार्ड के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिस पर उनका हक है. लेकिन गरीबों का हक मार कर गांव के दबंग लोगों ने बीपीएल और अंतोदय कार्ड बनवा लिया है. इस कार्ड के जरिए गरीब दलितों को हर महीने बहुत ही सस्ते में 35 किलो राशन मिल जाता है.
टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होते हुए हम अंबेडकर नगर के सीमई कारीरात गांव की अंबेडकर बस्ती में पहुंचते हैं. बस्ती तक पक्की सड़क है. अंबेडकर नगर संसदीय क्षेत्र से मायावती चुनाव लड़ती है. मायावती के राज्यसभा में जाने बाद फिलहाल इस संसदीय सीट पर सपा का कब्जा है, लेकिन इलाके के पांचों विधायक बसपा के हैं. सीमई कारीरात की दलित बस्ती की सूरत बिलकुल अलग है. यहां समृद्धि दिखाई देती है. बस्ती के ज्यादातर मकान पक्के हैं. लड़के और लड़कियां कालेज में पढ़ते हैं. कई लोग सरकारी नौकरी में हैं. जब इस बस्ती की तरफ देखता हूं तो दूर क्षितिज में फिर से सुनीता का असहाय चेहरा दिखाई देने लगता है...
सीमई कारीरात की दलित बस्ती में पहली बार पिछले साल मई में ‘डीजे’ आया था... अंबेडकर की आदमकद मूर्ति के सामने उस दिन रात भर नाच गाना हुआ... पूड़ी और खीर बांटी गई... युवाओं के साथ-साथ बुजर्गों ने भी ठुमके लगाए. यह कोई शादी का अवसर नहीं था. यह सदियों से सताए गए दलितों के सत्ता प्राप्ति का उत्सव था. प्रजा से राजा बनने की खुशी का अवसर था. पूरी बस्ती में वह खुशी आज भी दिखाई देती है. गांव के नौजवान अनिल गर्व से कहते हैं, "गांव के सवर्णों की अब पहले जैसी हिम्मत नहीं रही. कालेज में अभी हाल में झगड़ा हुआ तो हमने सवर्ण लड़कों को खूब पीटा और सीना चौड़ा करके घर आए. वे हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पाए." बगल में खड़े रिटायर शिक्षक और बस्ती के युवाओं को वैचारिक खुराक देने वाले बुधिराम कहते हैं, "बसपा की सरकार नहीं होती तो वे हमें दबा लेते. मायावती के मुख्यमंत्री बनने से अब हम सिर उंचा करके चल सकते हैं." सीमई कारीरात वही ऐतिहासिक गांव है जहां एक पल्ले वाले दरवाजे लगाए जाते हैं. लेकिन दलितों ने विद्रोह किया और यहां ब्राह्मणों के इस फऱमान की परवाह किए बिना कि "इससे शिव भगवान नाराज हो जाएंगे" अपने घरों में दो पल्ले वाले दरवाजे लगा रहे हैं. बसपा सरकार बनने के बाद यह सिलसिला और बढ़ गया है. सीमई कारीरात के लोग खुश हैं. उन्हें लगता है कि बसपा शासन में य़ुवाओं को रोजगार मिलेगा और उन्हें सम्मान. लेकिन मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश की अपनी एक सप्ताह की यात्रा के दौरान सीमई कारीरात जैसी दूसरी दलित बस्ती नहीं मिली. लेकिन हां, हर दलित बस्ती में सुनीता जैसी महिलाओं से जरूर रूबरू होना पड़ता था.
पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिजली की जबरदस्त किल्लत है. अंधेरे को चीरते हुए हम शशि के घर पहुंचते हैं. घर के बाहर पुलिस का पहरा है. फैजाबाद के मिल्कीपुर में मोमबत्ती की रोशनी में हमारी मुलाकात शशि के पिता योगेंद्र कुमार से होती है. मोमबत्ती की लौ की तरह ही योगेंद्र की आंखे भी हिलती रहती हैं... कभी वे अंधेरे को देखते हैं तो कभी रोशनी को... लंबी चुप्पी के बाद वह अपनी बेटी शशि की हत्या का आरोप बसपा के पूर्व मंत्री आनन्द सेन यादव पर लगाते हैं. योगेंद्र बामसेफ के पुराने कार्यकर्ता हैं और कांशीराम के सपने को साकार करने और बसपा की सरकार बनवाने के लिए उन्होंने अपना बहुत कुछ स्वाहा किया है. वह कहते हैं, "बसपा के शासन में मेरी बेटी के हत्यारे खूलेआम घूम रहे हैं. जो मंत्री और विधायक मेरे घर पर आ कर कभी डेरा डाले रहते थे, वे अब मुझसे मुंह चुराने लगे है. जिस बसपा के लिए मैने कभी घर परिवार की चिंता नहीं, उसके शासन में मैं असहाय और लाचार महसूस कर रहा हूं. बात सुनने की बात तो दूर मायावती ने तो मुझसे मिलने से ही इनकार कर दिया." योगेंद्र कोई अकेले दलित नहीं हैं, जिन्होंने बसपा के लिए दिन-रात एक कर दिया और जब सरकार की मदद की जरूरत पड़ी तो उन्हें उपेक्षा ही मिली. दलितों का उत्पीड़न जारी है. तब भी पुलिस दबंगों का साथ देती थी और आज भी... बसपा शासन में भी दलित अपनी सामाजिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. लखनऊ के महिपत मऊं गांव के दलितों के घर में स्थानीय दंबग मुसलमानों ने घुस कर जम कर उत्पाद मचाया, महिलाओं और लड़िकयों से बलात्कार की कोशिश की. पीड़ित चंद्रिका प्रसाद कहते हैं, "अपराधियों पर पुलिस इसलिए कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, क्योंकि एक बसपा विधायक का उन्हें संरक्षण प्राप्त है." संकट की इस घड़ी में बसपा नेताओं ने भी इनसे किनारा कर लिया है... अपने भी पराए हो गए..
प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के भदेवरा गांव के दलित युवक चक्रसेन की गांव के दबंग ब्राह्मणों ने इसलिए हत्या कर दी थी कि उसका बीटेक में दाखिला हो गया था. चक्रसेन के परिवार के लोग स्थानीय बसपा विधायक पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हैं. जब चुनाव का बिगुल बजा तो भदेवरा के दलितों ने हर बार की तरह इस बार भी खुल कर बसपा का साथ दिया. जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उनके भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें लगा कि अब पंडित जी और बाबू साहब लोग उन्हें तंग नहीं करेगे. लेकिन कुछ दिन बाद ही उनका सपना काफूर हो गया. चक्रसेन के दादा शिव मूरत सहित बस्ती के लोग एक स्वर में कहते हैं, "यह दिन देखने के लिए थोड़ी हमने बसपा को वोट दिया था. अब हम लोग बसपा को वोट नहीं देंगे."
चक्रसेन का घर गांव के आखिरी छोर पर था. वैसे दलित बस्ती गांव के आखिरी छोर पर ही होती है. सवर्णों के घरों से काफी दूर... जब मैं चक्रसेन के घर पहुंचता हूं तो एक आदमी हमसे पूछताछ करने लगता है. पता चला वह हेड कांस्टेबल बुधराम सरोज हैं. चक्रसेन का परिवार पुलिस के सुरक्षा घेरे में है. मैं जब अपनी नोट बुक में पुलिसवालों का नाम नोट कर रहा था तो बुधराम धीरे से कहते हैं, "मेरे नाम के आगे एससी लिख लीजिए." पांच पुलिस वाले घर की रखवाली कर रहे हैं, एक कमरे के उस घर की, जिसमें कुछ है ही नहीं... बुधराम सरोज चक्रसेन के बूढ़े-लाचार दादा शिवमूरत की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "इनकी बहुत ही बुरी स्थिति है. घर में खाने तक को अनाज नहीं है." चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में लगे पांच पुलिसवालों में से तीन सवर्ण हैं, दो पंडित जी और एक ठाकुर साहब. जिस मड़ई में भैंस बांधी जाती थी, उसी में पांचो पुलिसवाले रह रहे हैं. खाना वे दलित बस्ती में ही एक साथ बनाते और खाते हैं. सवर्ण पुलिसवालों को एक गरीब दलित की सुरक्षा में लगना अखर रहा है. उनके चेहरे से यह साफ झलक रहा था... बुधराम सरोज कहते हैं, "अपने अब तक के कैरियर मैं मैने शिवमूरत जैसे गरीब आदमी को कभी पुलिस सुरक्षा मिलते नहीं देखा." शिवमूरत खुद मानते हैं, "अगर बसपा की सरकार न होती तो उन्हें पुलिस सुरक्षा नहीं मिलती." लेकिन वे आगे कहते हैं, "हमें पुलिस वालों की नहीं, न्याय की जरूरत है." बस्ती के लोग कभी जिन पुलिसवालों को देख कर छुप जाते थे, चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में उनकी तैनाती को वे एक अजूबा ही मानते हैं. आसपास के इलाके में इसकी चर्चा भी है.
रायबरेली कभी इंदिरा गांधी और अब सोनिया गांधी की वजह से जाना जाता है. घूमते-घूमते हम यहां के छतईंयां गांव की दलित बस्ती में पहुंचते हैं. अस्सी साल की अनपढ़ बुजर्ग महिला बिठाना इंदिरा गांधी के मुकाबले किसी को नेता नहीं मानती. सोनिया गांधी को वोट देने वाली बिटाना मायावती को चिल्ला चिल्ला कर खरी-खोटी सुनाती हैं और हवा में यह सवाल उछाल देती हैं, "मायावती अपना पेट भरेंगी कि हमारा?" शिवकुमार कहते हैं, "मेरे घर में पांच वोट हैं. वैसे तो हम सोनिया गांधी को चाहते हैं, लेकिन हर बार कम से कम दो वोट बसपा को जरूर देते हैं." ऐसा ही कुछ रवैया लखनऊ के शिवपुर गांव के दलितों का है. वे मुलायम के प्रशंसक हैं, लेकिन वोट बसपा को देते हैं. बाबूलाल पासी कहते हैं, "मुलायम सिंह की सरकार अच्छा काम करती है. लेकिन वोट मैं बसपा को ही देता हूं." यहां आकर बसपा की सफलता का राज समझ में आया. कांशीराम ने दलित और बसपा को एक दूसरे का पर्याय बना दिया है. यही वजह है कि दलित अब अपने को बसपा से अलग नहीं कर पाता. राम नरायण कहते हैं, “वह अगर किसी दूसरी पार्टी को वोट दे भी दें, तो लोग यकीन नहीं करते. उन्हें बसपा का ही माना जाता है.”
यह लखनऊ जिले के निगोहा गांव की अंबेडकर बस्ती है. हाल ही में इसे अंबेडकर बस्ती का दर्जा मिला है. मायावती सरकार का विकास कार्य यहां दिखाई देता है. 132 दलितों को घर बनाने के लिए पैसा मिल गया है. लेकिन भूमिहीन दलितों को पट्टा देने के लिए जमीन ही नहीं है. मायावती के सोशल इंजीनियरिंग की कामयाबी यहां दिखाई देती है. मैं दलित पंच गंगा सहाय के साथ गांव के प्रधान से मिलने जाता हूं. उनके घर के सोफे पर हम तीनों साथ बैठ कर बाते करते हैं और चाय पीते हैं. इस बारे में पूछने पर बसपा समर्थक गांव के प्रधान सुरेंद्र कुमार दीक्षित कहते हैं, "अब हम दलितों से बराबरी का व्यवहार करते हैं. मैं सर्दियों में अक्सर दलित बस्ती में जाकर वहां लोगों के साथ जमीन पर बैठ कर अलाव तापता हूं." उत्तर प्रदेश में कहीं-कहीं यह बदलाव दिखता, लेकिन बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर. अगर बसपा यह बदलाव लाने में कामयाब हो जाती है तो दलितों को वह सम्मान मिल जाएगा, जिसके लिए वे सदियों से संघर्ष करते आ रहे हैं. लेकिन आम दलित के लिए तो अभी यह सपने जैसा ही है.. हकीकत से बहुत दूर.. प्रतापगढ़ के गोपालपुर गांव के शिवबरन सरोज कहते हैं, "सवर्ण कभी नहीं चाहेंगे की हम उनकी बराबरी करें."
Saturday 29 December 2007
जादुई आभा अब बिखरने लगी है...
बनारस की पहचान एक आध्यात्मिक और चमात्कारिक नगरी के रूप में है. भौतिकता और चमक-दमक से दूर रहने वाला यह शहर अपनी मस्ती और बेफिक्री के लिए भी जाना जाता है. लेकिन मिथकीय संदर्भों वाले इस शहर की जादुई आभा अब बिखरने लगी है....
बनारस के दुर्गाकुंड स्थित चाय की दुकान पर हर रोज लोगों को ठहाके लगाते देखना राबर्ट को अजीब लगता था. उसकी उलझन और बढ़ गई, जब उसने देखा कि यह सिलसिला तो दिनभर जारी रहता है. पहले उसे लगा कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य हैं. लेकिन उसकी हैरानी तब और बढ़ जाती है जब उसे पता चलता है कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य नहीं, बल्कि बनारस के "सामान्य" लोग हैं. कोई वकील है तो कोई शिक्षक... कोई रिस्शा चलाता हैं को कोई फल बेचता है. आखिर एक दिन उसका धैर्य जवाब दे गया और उसने हिम्मत करके लोगों से उनकी हंसी का राज पूछ ही लिया. जवाब सुन कर अंग्रेज हैरत में पड़ गया. जिसे वह अबतक मिथक मानता था, वह एक हकीकत के रूप में उसके सामने था.
जवाब बड़ा ही सीधा था, लेकिन राबर्ट के लिए किसी पहेली से कम नहीं. लोगों ने राबर्ट को बताया कि वे लोग "वर्तमान" में जीते हैं, इसलिए उन्हें "भविष्य" की चिंता नहीं होती. यही उनकी खुशी और मस्ती का राज है. काशी के लोगों के लिए यह एक सामान्य सी बात है. भविष्य के प्रति चिंतित न होने से वह कुछ “खोने” और “पाने” के भय से मुक्त होता है. वह वर्तमान में जीता है और अतीत की जुगाली करता है. राबर्ट ने सुना था कि काशी के लोग मुफलिसी में भी बेफिक्री का जीवन जीते हैं. लेकिन वह इस पर कतई यकीन करने को तैयार नहीं था कि गरीबी और अभाव में भी भला कोई कैसे खुश रह सकता है? उसे यह सब कपोल कल्पना लगती थी, लेकिन बनारस आने के बाद उसका यह भ्रम दूर हो जाता है. उसे लोगों की मस्ती का, खुशी का राज पता चल गया था. उसे यह सब किसी जादू से कम नहीं लग रहा था.
बनारस की पहचान तो वैसे एक प्रचीन और आध्यात्मिक शहर की है, लेकिन यहां आने वाला हर कोई इसे अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है. यही वजह है कि इस शहर के साथ तमाम तरह के मिथक जुड़े हुए हैं. कोई इसे दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं के "म्यूजिमय" के रूप में देखता है तो कोई "मोक्ष की नगरी" के रूप में. कुछ लोग इसे "सुकुन का शहर" मानते है तो कुछ "भगवान शंकर का घर". बहुत सारे लोग इसे "मस्ती" और "बेफिक्री" के दुर्लभ शहर के रूप में भी देखते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इसे एक चमत्कारिक नगरी ही मानते हैं, जहां "कुछ" न होते हुए भी "बहुत कुछ" है. एक अलौकिक शांति.. अविस्मर्णीय दिव्य अनुभूति... मन को सुकुन देने वाले गंगा के प्राचीन घाट, मंदिर की घंटियां.. काशी विश्वनाथ का मंदिर, मोक्षदायिनी गंगा.. और गंदी तंग गलियों व भीड़भाड वाले इस शहर में एक अजीब सी खामोशी.. ऐसी खामोशी जो लोगों को घंटो ध्यान के बाद हासिल होती है. बनारस को जीने वाले विद्वान और हरिशचंद्र महाविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. गया सिंह कहते हैं, "ये सब बाते मिल कर बनारस को एक जादुई व्यक्तित्व प्रदान करते हैं. बनारस से कई तरह के मिथक भी जुड़े हुए हैं और यह शहर अपने मिथकीय संदर्भों पर पूरी तरह से खरा भी उतरता है." वे आगे कहते हैं, "बनारस एक ऐसा विरला शहर है जिसकी गलियों में भारत बसा है. यहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग रहते हैं."
बनारस के कई रंग हैं और कई रुप भी. पुराणों, वेदों और लोक कथाओं में बनारस के इन रूपों और रंगों का दर्शन होता है. एक मान्यता यह है कि बनारस भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिका हुआ है. इसीलिए यह दिव्य-आध्यात्मिक शहर है. "सुबहे बनारस" के रहस्य को भी लोग महादेव से जोड़ कर देखते हैं. बनारस के लोगों का कहना है कि सुबह सूर्य की किरणें बाबा विश्वनाथ के मंदिर से टकरा कर लोगों तक पहुंचती हैं, इसीलिए यहां के लोग ऊर्जावान व मस्त रहते हैं. पुराणों के मुताबिक काशी (बनारस का प्रचीन नाम) भगवान शंकर का निवास स्थान है. संस्कृति के विद्वान और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर आरसी पंड़ा कहते हैं, "काशी के बारे में यह वैदिक मान्यता है कि यहां के कण-कण में भगवान शिव का वास है. और जो लोग काशी में प्राण त्यागते हैं उन्हें शंकर और पार्वती खुद स्वर्ग से लेने आते हैं." काशी में मरने से मोक्ष प्राप्ति होती है, इसी धारणा की वजह से ही मणिकणिका घाट (गंगा किनारे स्थित श्मशान घाट) पर कभी चिता की राख ठंडी नहीं होती. काशी तुलसी, कबीर और रैदास जैसे महान संतों की जन्मभूमि भी रही है. तो अघोर कीनाराम और तैलंगास्वामी को यहां लोग महादेव का अवतार मानते हैं. इनके बारे में जितने मुंह उतनी बाते सुनने को मिलती हैं. लेकिन काशी में कोई विरला ही होगा जो इन्हें इतिहास का मिथकीय पात्र बताएगा. लोग इनके चमत्कारों से प्रभावित मिलते हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी के चमत्कारों की किवदंतियां बनारस की गलियों में बिखरी पड़ी हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी का नाम लोग बड़ी ही श्रद्दा से लेते हैं. उनकी समाधि स्थल पर देश के कोने-कोने से लोग दर्शन करने आते हैं.
बनारस अपनी जिंदादिली और मस्ती के लिए ज्यादा जाना जाता है. यही वह वजह है जिसकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां आते हैं. जो लोग बनारस के बारे में नहीं जानते, वे इसे एक मिथक ही मानते हैं. बनारस के बारे में कहा जाता है कि जो यहां कुछ दिन रह गया उसका मन फिर दुनिया में कहीं नहीं लगता. मशहूर शहनाई वादक स्वर्गीय बिसमिल्ला खान से लेकर आईआईटी बनारस में प्रोफेसर रह चुके जानेमाने प्रर्यावरणविद डा वीरभद्र मिश्र को विदेशों में बेहतर सुख-सुविधाओं के साथ बसने के तमाम मौके मिले, लेकिन उन्होंने यह कर कभी बनारस नहीं छोड़ा कि उन्हें वहां "गंगा" कहां मिलेगी. अब प्रो. आर सी पंडा को ही ले लीजिए. उड़ियाभाषी पांडा 1988 में पुरी से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लेक्चरर से रीडर बन कर इस उम्मीद से आए थे कि जल्दी ही वे अपने राज्य लौट जाएंगे. प्रो. पांडा कहते हैं, "लेकिन बनारस इतना भा गया कि अब इसे छोड़ने का दिल नहीं कहता. मुझे जेएनयू जैसे कई और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में नौकरी का मौका मिला, लेकिन मैने मना कर दिया, जबकि कैरियर के लिहाज से यह बेहतर विकल्प था."
प्रो. जे.एल शर्मा दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को रसायन विज्ञान पढ़ाते हैं. आध्यात्म और विज्ञान में हमेशा टकराव रहा है, लेकिन बनारस में यह टकराव दिखाई नहीं देता. गंगा के घाटों की अलौकिक शांति और बनारस की मस्ती प्रो. शर्मा को हर साल काशी जाने के लिए मजबूर कर देती है. 25 साल से यह सिलसिला जारी है. वे इसे एक जादू की नगरी मानते हैं. वे कहते हैं, "इस शहर की आबो-हवा में कुछ जादू तो है जो आप को यहां आने और रुकने के लिए मजबूर कर देता है." वे कहते हैं, "बनारस को सिर्फ अनुभव किया जा सकता है. और मेरे लिए उन अनुभवों का शब्दों के जरिए व्याख्या करना मुश्किल है." प्रो. शर्मा बनारस की चाय की दुकानों से बहुत प्रभावित हैं. वे इसे शहर की नब्ज बताते हुए कहते हैं, "बनारस की चाय दुकानें महज दुकान नहीं हैं. वे सूचना केंद्र हैं और चलता फिरता पुस्तकालय भी. यहां मस्ती भी मिलती और दुनिया भर का ज्ञान भी. लोग यहां आप को चाय की चुस्कियां लेते हुए दिल्ली की राजनीति से लेकर ह्वाइट हाउस तक की बाते करते मिल जाएंगे." तो डाकूमेंट्री फिल्में बनाने वाले यतीश यादव के लिए बनारस स्वयं के साक्षात्कर के लिए एक बेहतरीन जगह है. फुर्सत मिलते ही वे बनारस भाग आते हैं और घंटों मणिकणिका घाट और हरिशचंद घाट पर बैठ कर जलती चिताओं को निहारते रहते हैं. यतीश कहते हैं, "इससे एहसास होता है कि यही जीवन का अंतिम सत्य है. यह एहसास ही जीवन में कुछ नेक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है." बनारस अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए भी जाना जाता है. गांगा का आनन्द यहां के हिंदू ही नहीं मुसलमान भी उठाते हैं. गंगा के घाटों पर विचरण करते तमाम मुसलमान मिल जाएंगे. मशहूर शायर नजीर बनारसी को गंगा के घाट बहुत प्रिय थे. वे कहा करते थे कि ईश्वर उन्हें कभी बनारस से दूर न करे. तो बिसमिल्ला खान भगवान शिव के अराधक थे और विश्वनाथ मंदिर भगवान शंकर के दर्शन करने जाया करते थे. यह दुर्लभ उदाहरण केवल बनारस में ही मिल सकता है.
बनारस के बारे में कहा जाता है वह हमेशा भौतिकता से दूर रहता है, कभी पैसे के पीछे नहीं भागता. दुनिया की चमक दमक और भीड-भाड़ जहां खत्म होती है बनारस वहां से शुरु होता है. यही वजह है कि भौतिकता से ऊबे दुनियाभर के तमाम लोग शांति की तलाश में यहां आते हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. यहां की नई पीढ़ी भौतिकता और पश्चिमी चमक-दमक की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है. प्रसिद्द साहित्यकार और बनारस के जनजीवन पर आधारित चर्चित उपन्यास 'काशी का आस्सी' के लेखक काशीनाथ सिंह कहते हैं, "नई पीढ़ी बनारसीपन से दूर हो रही है. वह यहां की मस्ती और इत्मीनान को निकम्मापन और आलस्य समझने लगी है. अपनी मस्त चाल से चलने वाला यह शहर अब पैसे और भौतिकता की होड़ में शामिल हो गया है." धीरे-धीरे बनारस बदलने लगा है. लोगों के जीवन से मस्ती और बेफिक्री गायब हो रही है. काशीनाथ सिंह की माने तो बाजारवाद की आंधी से बनारस के मिथक टूटने लगे हैं और उसकी उसकी जादुई आभा बिखरने लगी है....
बनारस के दुर्गाकुंड स्थित चाय की दुकान पर हर रोज लोगों को ठहाके लगाते देखना राबर्ट को अजीब लगता था. उसकी उलझन और बढ़ गई, जब उसने देखा कि यह सिलसिला तो दिनभर जारी रहता है. पहले उसे लगा कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य हैं. लेकिन उसकी हैरानी तब और बढ़ जाती है जब उसे पता चलता है कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य नहीं, बल्कि बनारस के "सामान्य" लोग हैं. कोई वकील है तो कोई शिक्षक... कोई रिस्शा चलाता हैं को कोई फल बेचता है. आखिर एक दिन उसका धैर्य जवाब दे गया और उसने हिम्मत करके लोगों से उनकी हंसी का राज पूछ ही लिया. जवाब सुन कर अंग्रेज हैरत में पड़ गया. जिसे वह अबतक मिथक मानता था, वह एक हकीकत के रूप में उसके सामने था.
जवाब बड़ा ही सीधा था, लेकिन राबर्ट के लिए किसी पहेली से कम नहीं. लोगों ने राबर्ट को बताया कि वे लोग "वर्तमान" में जीते हैं, इसलिए उन्हें "भविष्य" की चिंता नहीं होती. यही उनकी खुशी और मस्ती का राज है. काशी के लोगों के लिए यह एक सामान्य सी बात है. भविष्य के प्रति चिंतित न होने से वह कुछ “खोने” और “पाने” के भय से मुक्त होता है. वह वर्तमान में जीता है और अतीत की जुगाली करता है. राबर्ट ने सुना था कि काशी के लोग मुफलिसी में भी बेफिक्री का जीवन जीते हैं. लेकिन वह इस पर कतई यकीन करने को तैयार नहीं था कि गरीबी और अभाव में भी भला कोई कैसे खुश रह सकता है? उसे यह सब कपोल कल्पना लगती थी, लेकिन बनारस आने के बाद उसका यह भ्रम दूर हो जाता है. उसे लोगों की मस्ती का, खुशी का राज पता चल गया था. उसे यह सब किसी जादू से कम नहीं लग रहा था.
बनारस की पहचान तो वैसे एक प्रचीन और आध्यात्मिक शहर की है, लेकिन यहां आने वाला हर कोई इसे अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है. यही वजह है कि इस शहर के साथ तमाम तरह के मिथक जुड़े हुए हैं. कोई इसे दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं के "म्यूजिमय" के रूप में देखता है तो कोई "मोक्ष की नगरी" के रूप में. कुछ लोग इसे "सुकुन का शहर" मानते है तो कुछ "भगवान शंकर का घर". बहुत सारे लोग इसे "मस्ती" और "बेफिक्री" के दुर्लभ शहर के रूप में भी देखते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इसे एक चमत्कारिक नगरी ही मानते हैं, जहां "कुछ" न होते हुए भी "बहुत कुछ" है. एक अलौकिक शांति.. अविस्मर्णीय दिव्य अनुभूति... मन को सुकुन देने वाले गंगा के प्राचीन घाट, मंदिर की घंटियां.. काशी विश्वनाथ का मंदिर, मोक्षदायिनी गंगा.. और गंदी तंग गलियों व भीड़भाड वाले इस शहर में एक अजीब सी खामोशी.. ऐसी खामोशी जो लोगों को घंटो ध्यान के बाद हासिल होती है. बनारस को जीने वाले विद्वान और हरिशचंद्र महाविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. गया सिंह कहते हैं, "ये सब बाते मिल कर बनारस को एक जादुई व्यक्तित्व प्रदान करते हैं. बनारस से कई तरह के मिथक भी जुड़े हुए हैं और यह शहर अपने मिथकीय संदर्भों पर पूरी तरह से खरा भी उतरता है." वे आगे कहते हैं, "बनारस एक ऐसा विरला शहर है जिसकी गलियों में भारत बसा है. यहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग रहते हैं."
बनारस के कई रंग हैं और कई रुप भी. पुराणों, वेदों और लोक कथाओं में बनारस के इन रूपों और रंगों का दर्शन होता है. एक मान्यता यह है कि बनारस भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिका हुआ है. इसीलिए यह दिव्य-आध्यात्मिक शहर है. "सुबहे बनारस" के रहस्य को भी लोग महादेव से जोड़ कर देखते हैं. बनारस के लोगों का कहना है कि सुबह सूर्य की किरणें बाबा विश्वनाथ के मंदिर से टकरा कर लोगों तक पहुंचती हैं, इसीलिए यहां के लोग ऊर्जावान व मस्त रहते हैं. पुराणों के मुताबिक काशी (बनारस का प्रचीन नाम) भगवान शंकर का निवास स्थान है. संस्कृति के विद्वान और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर आरसी पंड़ा कहते हैं, "काशी के बारे में यह वैदिक मान्यता है कि यहां के कण-कण में भगवान शिव का वास है. और जो लोग काशी में प्राण त्यागते हैं उन्हें शंकर और पार्वती खुद स्वर्ग से लेने आते हैं." काशी में मरने से मोक्ष प्राप्ति होती है, इसी धारणा की वजह से ही मणिकणिका घाट (गंगा किनारे स्थित श्मशान घाट) पर कभी चिता की राख ठंडी नहीं होती. काशी तुलसी, कबीर और रैदास जैसे महान संतों की जन्मभूमि भी रही है. तो अघोर कीनाराम और तैलंगास्वामी को यहां लोग महादेव का अवतार मानते हैं. इनके बारे में जितने मुंह उतनी बाते सुनने को मिलती हैं. लेकिन काशी में कोई विरला ही होगा जो इन्हें इतिहास का मिथकीय पात्र बताएगा. लोग इनके चमत्कारों से प्रभावित मिलते हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी के चमत्कारों की किवदंतियां बनारस की गलियों में बिखरी पड़ी हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी का नाम लोग बड़ी ही श्रद्दा से लेते हैं. उनकी समाधि स्थल पर देश के कोने-कोने से लोग दर्शन करने आते हैं.
बनारस अपनी जिंदादिली और मस्ती के लिए ज्यादा जाना जाता है. यही वह वजह है जिसकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां आते हैं. जो लोग बनारस के बारे में नहीं जानते, वे इसे एक मिथक ही मानते हैं. बनारस के बारे में कहा जाता है कि जो यहां कुछ दिन रह गया उसका मन फिर दुनिया में कहीं नहीं लगता. मशहूर शहनाई वादक स्वर्गीय बिसमिल्ला खान से लेकर आईआईटी बनारस में प्रोफेसर रह चुके जानेमाने प्रर्यावरणविद डा वीरभद्र मिश्र को विदेशों में बेहतर सुख-सुविधाओं के साथ बसने के तमाम मौके मिले, लेकिन उन्होंने यह कर कभी बनारस नहीं छोड़ा कि उन्हें वहां "गंगा" कहां मिलेगी. अब प्रो. आर सी पंडा को ही ले लीजिए. उड़ियाभाषी पांडा 1988 में पुरी से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लेक्चरर से रीडर बन कर इस उम्मीद से आए थे कि जल्दी ही वे अपने राज्य लौट जाएंगे. प्रो. पांडा कहते हैं, "लेकिन बनारस इतना भा गया कि अब इसे छोड़ने का दिल नहीं कहता. मुझे जेएनयू जैसे कई और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में नौकरी का मौका मिला, लेकिन मैने मना कर दिया, जबकि कैरियर के लिहाज से यह बेहतर विकल्प था."
प्रो. जे.एल शर्मा दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को रसायन विज्ञान पढ़ाते हैं. आध्यात्म और विज्ञान में हमेशा टकराव रहा है, लेकिन बनारस में यह टकराव दिखाई नहीं देता. गंगा के घाटों की अलौकिक शांति और बनारस की मस्ती प्रो. शर्मा को हर साल काशी जाने के लिए मजबूर कर देती है. 25 साल से यह सिलसिला जारी है. वे इसे एक जादू की नगरी मानते हैं. वे कहते हैं, "इस शहर की आबो-हवा में कुछ जादू तो है जो आप को यहां आने और रुकने के लिए मजबूर कर देता है." वे कहते हैं, "बनारस को सिर्फ अनुभव किया जा सकता है. और मेरे लिए उन अनुभवों का शब्दों के जरिए व्याख्या करना मुश्किल है." प्रो. शर्मा बनारस की चाय की दुकानों से बहुत प्रभावित हैं. वे इसे शहर की नब्ज बताते हुए कहते हैं, "बनारस की चाय दुकानें महज दुकान नहीं हैं. वे सूचना केंद्र हैं और चलता फिरता पुस्तकालय भी. यहां मस्ती भी मिलती और दुनिया भर का ज्ञान भी. लोग यहां आप को चाय की चुस्कियां लेते हुए दिल्ली की राजनीति से लेकर ह्वाइट हाउस तक की बाते करते मिल जाएंगे." तो डाकूमेंट्री फिल्में बनाने वाले यतीश यादव के लिए बनारस स्वयं के साक्षात्कर के लिए एक बेहतरीन जगह है. फुर्सत मिलते ही वे बनारस भाग आते हैं और घंटों मणिकणिका घाट और हरिशचंद घाट पर बैठ कर जलती चिताओं को निहारते रहते हैं. यतीश कहते हैं, "इससे एहसास होता है कि यही जीवन का अंतिम सत्य है. यह एहसास ही जीवन में कुछ नेक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है." बनारस अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए भी जाना जाता है. गांगा का आनन्द यहां के हिंदू ही नहीं मुसलमान भी उठाते हैं. गंगा के घाटों पर विचरण करते तमाम मुसलमान मिल जाएंगे. मशहूर शायर नजीर बनारसी को गंगा के घाट बहुत प्रिय थे. वे कहा करते थे कि ईश्वर उन्हें कभी बनारस से दूर न करे. तो बिसमिल्ला खान भगवान शिव के अराधक थे और विश्वनाथ मंदिर भगवान शंकर के दर्शन करने जाया करते थे. यह दुर्लभ उदाहरण केवल बनारस में ही मिल सकता है.
बनारस के बारे में कहा जाता है वह हमेशा भौतिकता से दूर रहता है, कभी पैसे के पीछे नहीं भागता. दुनिया की चमक दमक और भीड-भाड़ जहां खत्म होती है बनारस वहां से शुरु होता है. यही वजह है कि भौतिकता से ऊबे दुनियाभर के तमाम लोग शांति की तलाश में यहां आते हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. यहां की नई पीढ़ी भौतिकता और पश्चिमी चमक-दमक की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है. प्रसिद्द साहित्यकार और बनारस के जनजीवन पर आधारित चर्चित उपन्यास 'काशी का आस्सी' के लेखक काशीनाथ सिंह कहते हैं, "नई पीढ़ी बनारसीपन से दूर हो रही है. वह यहां की मस्ती और इत्मीनान को निकम्मापन और आलस्य समझने लगी है. अपनी मस्त चाल से चलने वाला यह शहर अब पैसे और भौतिकता की होड़ में शामिल हो गया है." धीरे-धीरे बनारस बदलने लगा है. लोगों के जीवन से मस्ती और बेफिक्री गायब हो रही है. काशीनाथ सिंह की माने तो बाजारवाद की आंधी से बनारस के मिथक टूटने लगे हैं और उसकी उसकी जादुई आभा बिखरने लगी है....
Wednesday 5 December 2007
कौन खरीद रहा है निठारी के गवाहों को
निठारी में सब कुछ सामान्य लग रहा था. शाम ढल चुकी थी और लोग काम से वापस लौट रहे थे. दुकानें खुली हुई थी और गलियों में चहल पहल थी. शोरगुल करते बच्चे और घर के बाहर दरवाजे पर बातों में मशगूल महिलाएं यह एहसास करी रही थीं कि "खूनी कोठी" का भय अब निठारी के लोगों के मन से निकल चुका है. लेकिन उन संकरी और कीचड़भरी बदबूदार गलियों में थोड़ा आगे चलने पर हमारा यह भ्रम काफूर हो जाता है. निठारी पीड़ितों से मिलने पर यह एहसास हुआ कि नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके मन में खूनी कोठी का खौफ और अब बढ़ गया है. पहले पुलिस और बाद में सीबीआई के मोनिंदर सिंह पंधेर को बचाने से निठारी पीड़ित पहले ही सकते में थे. लेकिन नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके जख्म फिर से हरे हो गए हैं. उनके जेहन में बार बार यह सवाल घूम रहा है, "क्या नंदलाल बिक गया?" "क्या पंधेर ने उसे खरीद लिया?" "क्या पंधेर को सजा हो पाएगी?" "क्या वाकई सीबीआई भी पंधेर को बचा रही है? "
निठारी के लोग जब इन सवालों का जवाब ढूढने की कोशिश करते हैं तो उनका मन सिहर उठता है. पहले पुलिस की लापरवाही और फिर बाद में सीबीआई द्वारा पंधेर को क्लीन चिट देने से न्याय की उम्मीद पाले निठारी पीड़ित निराश हो गए थे. इस दौरान नंदलाल एक ऐसा 'हीरो' बन कर सामने आया जिसकी गवाही पर ही पंधेर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हुआ. इससे निठारी पीड़ितों को न्याय की आस बंधी. लेकिन हाल ही में नंदलाल के अपने पूर्व के बयान से मुकर जाने से निठारी पीड़ित अवाक हैं. उन्हें संदेह है कि मोनिंदर सिंह पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. खूनी कोठी की भेट चढ़ चुकी रिम्पा हलधर के पिता और निठारी कांड के एक प्रमुख गवाह अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. वह सरासर झूठ बोल रहा है. जब पंधेर ने पुलिस को हत्या वाली आरी बरामद कराई थी तो नंदलाल के साथ मैं भी वहां मौजूद था." अनिल हलधर ने सीबीआई की विशेष अदालत में एक याचिका दायर कर नंदलाल के खिलाफ झूठा साक्ष्य पेश करने का मामला दर्ज करने की अपील भी की है.
नंदलाल दरअसल निठारी कांड का सूत्रधार और मुख्य गवाह हैं. सीबीआई ने निठारी मामले की जांच के बाद अदालत में जो चार्जसीट दायर की थी उसमें नौकर सुरेंदर कोली को तो हत्या और बलात्कार का आरोपी बनाया गया था लेकिन मोनिंदर सिंह पंधेर को नहीं. तब नंदलाल ने सीबीआई पर अपने बयान को गलत तरीके से पेश करने और पंधेर को बचाने का संगीन आरोप लगाया था. 18 जून, 2007 को उसने अदालत में प्रार्थनापत्र दाखिल कर कहा था कि उसे पंधेर की तरफ से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, लिहाजा उसका बयान फौरन दर्ज कराया जाए. इस आधार पर गाजियाबाद स्थित विशेष सीबीआई अदालत में 6 जुलाई, 2007 को नंदलाल का बयान दर्ज कराया गया. तब नंदलाल ने अदालत को बताया कि निठारी कांड के खुलासे से पहले 3 दिसंबर, 2006 को जब उसकी शिकायत पर कोली और पंधेर को पुलिस गिरफ्तार करके थाने लाई तो उसने पंधेर के मैनेजर को तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को रिश्वत देते देखा था. इसके अलावा 29 दिसबंर, 2006 को निठारी कांड के खुलासे के बाद पंधेर ने जब पुलिस को वह आरी बरामद कराई जिससे वह लड़िकयों की हत्याएं किया करता था, उस वक्त वह वहां मौजूद था.
नंदलाल के इस बयान के आधार पर ही अदालत ने तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज गैर जमानती वारंट जारी किया. साथ ही पायल मामले में सीबीआई को पंधेर के खिलाफ भी हत्या और बलत्कार का मामला दर्ज करने का आदेश दिया. लेकिन 15 नंबर, 2007 को जिरह के दौरान नंदलाल अपने इस बयान से पलट गया. अदालत में उसने कहा कि न तो उसके सामने आरी बरामद की गई थी और न ही उसने दिनेश यादव को किसी से रिश्वत लेते देखा था. इससे पहले इस लेखक से बात करते हुए नंदलाल कई बार दिनेश यादव और सीबीआई पर पंधेर को बचाने का आरोप लगा चुके हैं. लेकिन अब नंदलाल कहते हैं, "दिनेश यादव ने ही तो मामले का पर्दाफाश किया था." नंदलाल के विरोधाभाषी बयानों का विश्लेषण करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी केपी सिंह कहते हैं, "बयान पलटने से तो पहली नजर में यही साबित होता है कि नंदलाल दिनेश यादव और पंधेर को फायदा पहुंचाना चाहता है. इससे आरोपी को 'बेनिफिट आप डाउट' का लाभ मिल सकता है. लेकिन अभी इस पर सुनवाई हो रही है इसलिए यह अदालत के रुख पर निर्भर करेगा. अगर अदालत यह समझती है कि गवाह बदनीयती से जानबूझ कर अपने बयान से मुकर रहा है तो उसे सजा भी दे सकती है."
निठारी की गलियों की खाक छानने से पता चला कि गवाहों को तोड़ने और खरीदने की कोशिश की जा रही है. मुख्य गवाहों में से एक अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने सौदेबाजी के लिए मेरे पास भी एक आदमी को भेजा था. वह लगातार तीन दिन मेरे पास आकर गवाही न देने के लिए रूपये की पेशकश करता रहा. इतना ही नहीं पंधेर के खिलाफ बयान न देने के लिए सीबीआई भी मुझे कई बार धमका चुकी है." तो झब्बू लाल कहते हैं, "निठारी के ही कुछ लोग पंधेर से मिले हुए हैं. वह लोगों को बयान बदलने के लिए रूपयों की पेशकस कर रहे हैं." जबकि निठारी पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा ठाकुर कहती हैं, "पंधेर का बेटा मेरे घर का चक्कर लगा रहा है. वह मेरे पास भी बातचीत के लिए संदेश भिजवा रहा है." वे आगे कहती हैं, "इससे पहले खुद को पूर्व राजदूत बताने वाले एक सरदार जी मेरे घर आए थे. वे मुझे धमका कर गए कि मैं पंधेर का कुछ नहीं बिगाड़ सकती."
निठारी मामले में सीबीआई की भूमिका शुरु से ही विवादों में घिरी रही. निठारी पीड़ित सीबीआई पर बार बार पंधेर को बचाने का आरोप लगाते रहे हैं. सीबीआई ने अब तक 11 मामले में चार्जसीट दायर की है जिसमे सभी में पंधेर को क्लीनचिट दी गई है. पायल के बाद पिंकी सरकार मामले में भी अदालत ने सीबीआई को कटघरे में खड़ा करते हुए उसे पंधेर के खिलाफ हत्या और बलात्कार के अलावा अपहरण, षडयंत्र और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज करने का आदेश दिया है. जबकि पिंकी सरकार मामले में अपनी चार्जसीट में सीबीआई ने पंधेर को क्लीन चिट दे दी थी. इससे पहले पिंकी सरकार के पिता स्वर्गीय जतिन सरकार की अपील पर अदालत ने सीबीआई को इस मामले में दुबारा जांच का आदेश भी दिया था. बाद में जतिन की पं बंगाल के मुर्शिदाबाद में संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी.
निठारी कांड के मुख्य गवाह जतिन सरकार की पत्नी वंदना सरकार ने अपने पति की मौत के लिए सीबीआई को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रिम कोर्ट में याचिका भी दायर की है. अदालत के आदेश पर इस मामले में सीबीआई निदेशक विजय शंकर तिवारी, एसपी एसजेएम गिलानी और निठारी के तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को नामजद किया गया है. लेकिन इसके बावजूद सीबीआई लोगों को धमकाने से बाज नहीं आई. वंदना सरकार के वकील और सुप्रिम कोर्ट के अधिवक्ता भानू प्रताप सिंह धाकरे को भी सीबीआई फर्जी केस में फंसाने की धमकी दे रही है. श्री धाकरे गुस्से में कहते हैं, "सीबीआई की हिमाकत देखिए कि उसने मुझे धमकाने के लिए अपने एक इंसपेक्टर अजय सिंह और चार गुर्गों को भेजा था. मैंने अजय सिंह के खिलाफ नोएड़ा के सेक्टर- 39 के थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई है." इसके अलावा पीड़ित अरुण सरकार, झब्बूलाल और करणबीर ने भी अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई के वकील पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. याचिका में कहा गया है, "सीबीआई महत्वपूर्ण गवाहों की बजाए अनौपचारिक व असंबंधित गवाहों को ही सम्मन कर अदालत के सामने पेश कर रही है. ऐसा लगता है कि सीबीआई के वकील महत्वपूर्ण गवाहों और वादी मकदमा के बयान न कराकर इसका लाभ अभियुक्त पक्ष को देना चाहते हैं." इसके अलावा याचिका में तीनों ने दिनेश यादव और पंधेर पर आरोप लगाया है कि वे उसे बयान बदलने के लिए रूपयों का लालच दे रहे हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसा न करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा रही है.
सीबीआई की पोल धीरे धीरे खुलने लगी है. पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान पंधेर और कोली ने पायल और दूसरी गायब लड़कियों और बच्चों के यौन शोषण के बाद हत्या की बात स्वीकार की थी. यह इकबाले जुर्म पुलिस की जनरल डायरी और पायल की केस डायरी में दर्ज है. सीबीआई इसे हमेशा छुपाने की कोशिश करती रही. यह पंधेर के खिलाफ पुख्ता सबूत है. बाद में स्वर्गीय जतिन सरकार ने इसे अदालत में जमा कराया था. जबकि निठारी मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी डीएसपी दिनेश यादव ने इसे तब सीबीआई को सौंप दिया था. दिनेश यादव के वकील नाहर सिंह यादव ने सीबीआई की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "मेरे मुवक्किल दिनेश यादव के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल किया था. जिसका विवरण जनरल डायरी और केस डायरी में दर्ज है. दिनेश यादव ने इसे सीबीआई को सौंप दिया था. अदालत में हमने सीबीआई से इसकी प्राप्ति की रसीद भी जमा करा दी है." लेकिन सीबीआई के प्रवक्ता जी मोहंती इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "सीबीआई निठारी पीडितों को न्याय दिलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है."
आखिर जब पुलिस के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल लिया था तो सीबीआई ने उसे क्लीन चिट कैसे दे दी? यही वह सवाल है जो निठारी पीड़ितों को ही नहीं समूचे देशवासियों को मथ रहा है. एक और सवाल जो निठारी के लोगों के जेहन में बार बार घूम रहा है कि अगर पंधेर निर्दोष है तो वह लोगों को धमकिया क्यों दे रहा है? बयान बदलने और गवाही से मुकरने के लिए रूपयों की पेशकश क्यों कर रहा है? इस सवाल के जवाब में ही पंधेर के गुनहगार होने का सुबूत छुपा हुआ है.
निठारी के लोग जब इन सवालों का जवाब ढूढने की कोशिश करते हैं तो उनका मन सिहर उठता है. पहले पुलिस की लापरवाही और फिर बाद में सीबीआई द्वारा पंधेर को क्लीन चिट देने से न्याय की उम्मीद पाले निठारी पीड़ित निराश हो गए थे. इस दौरान नंदलाल एक ऐसा 'हीरो' बन कर सामने आया जिसकी गवाही पर ही पंधेर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हुआ. इससे निठारी पीड़ितों को न्याय की आस बंधी. लेकिन हाल ही में नंदलाल के अपने पूर्व के बयान से मुकर जाने से निठारी पीड़ित अवाक हैं. उन्हें संदेह है कि मोनिंदर सिंह पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. खूनी कोठी की भेट चढ़ चुकी रिम्पा हलधर के पिता और निठारी कांड के एक प्रमुख गवाह अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. वह सरासर झूठ बोल रहा है. जब पंधेर ने पुलिस को हत्या वाली आरी बरामद कराई थी तो नंदलाल के साथ मैं भी वहां मौजूद था." अनिल हलधर ने सीबीआई की विशेष अदालत में एक याचिका दायर कर नंदलाल के खिलाफ झूठा साक्ष्य पेश करने का मामला दर्ज करने की अपील भी की है.
नंदलाल दरअसल निठारी कांड का सूत्रधार और मुख्य गवाह हैं. सीबीआई ने निठारी मामले की जांच के बाद अदालत में जो चार्जसीट दायर की थी उसमें नौकर सुरेंदर कोली को तो हत्या और बलात्कार का आरोपी बनाया गया था लेकिन मोनिंदर सिंह पंधेर को नहीं. तब नंदलाल ने सीबीआई पर अपने बयान को गलत तरीके से पेश करने और पंधेर को बचाने का संगीन आरोप लगाया था. 18 जून, 2007 को उसने अदालत में प्रार्थनापत्र दाखिल कर कहा था कि उसे पंधेर की तरफ से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, लिहाजा उसका बयान फौरन दर्ज कराया जाए. इस आधार पर गाजियाबाद स्थित विशेष सीबीआई अदालत में 6 जुलाई, 2007 को नंदलाल का बयान दर्ज कराया गया. तब नंदलाल ने अदालत को बताया कि निठारी कांड के खुलासे से पहले 3 दिसंबर, 2006 को जब उसकी शिकायत पर कोली और पंधेर को पुलिस गिरफ्तार करके थाने लाई तो उसने पंधेर के मैनेजर को तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को रिश्वत देते देखा था. इसके अलावा 29 दिसबंर, 2006 को निठारी कांड के खुलासे के बाद पंधेर ने जब पुलिस को वह आरी बरामद कराई जिससे वह लड़िकयों की हत्याएं किया करता था, उस वक्त वह वहां मौजूद था.
नंदलाल के इस बयान के आधार पर ही अदालत ने तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज गैर जमानती वारंट जारी किया. साथ ही पायल मामले में सीबीआई को पंधेर के खिलाफ भी हत्या और बलत्कार का मामला दर्ज करने का आदेश दिया. लेकिन 15 नंबर, 2007 को जिरह के दौरान नंदलाल अपने इस बयान से पलट गया. अदालत में उसने कहा कि न तो उसके सामने आरी बरामद की गई थी और न ही उसने दिनेश यादव को किसी से रिश्वत लेते देखा था. इससे पहले इस लेखक से बात करते हुए नंदलाल कई बार दिनेश यादव और सीबीआई पर पंधेर को बचाने का आरोप लगा चुके हैं. लेकिन अब नंदलाल कहते हैं, "दिनेश यादव ने ही तो मामले का पर्दाफाश किया था." नंदलाल के विरोधाभाषी बयानों का विश्लेषण करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी केपी सिंह कहते हैं, "बयान पलटने से तो पहली नजर में यही साबित होता है कि नंदलाल दिनेश यादव और पंधेर को फायदा पहुंचाना चाहता है. इससे आरोपी को 'बेनिफिट आप डाउट' का लाभ मिल सकता है. लेकिन अभी इस पर सुनवाई हो रही है इसलिए यह अदालत के रुख पर निर्भर करेगा. अगर अदालत यह समझती है कि गवाह बदनीयती से जानबूझ कर अपने बयान से मुकर रहा है तो उसे सजा भी दे सकती है."
निठारी की गलियों की खाक छानने से पता चला कि गवाहों को तोड़ने और खरीदने की कोशिश की जा रही है. मुख्य गवाहों में से एक अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने सौदेबाजी के लिए मेरे पास भी एक आदमी को भेजा था. वह लगातार तीन दिन मेरे पास आकर गवाही न देने के लिए रूपये की पेशकश करता रहा. इतना ही नहीं पंधेर के खिलाफ बयान न देने के लिए सीबीआई भी मुझे कई बार धमका चुकी है." तो झब्बू लाल कहते हैं, "निठारी के ही कुछ लोग पंधेर से मिले हुए हैं. वह लोगों को बयान बदलने के लिए रूपयों की पेशकस कर रहे हैं." जबकि निठारी पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा ठाकुर कहती हैं, "पंधेर का बेटा मेरे घर का चक्कर लगा रहा है. वह मेरे पास भी बातचीत के लिए संदेश भिजवा रहा है." वे आगे कहती हैं, "इससे पहले खुद को पूर्व राजदूत बताने वाले एक सरदार जी मेरे घर आए थे. वे मुझे धमका कर गए कि मैं पंधेर का कुछ नहीं बिगाड़ सकती."
निठारी मामले में सीबीआई की भूमिका शुरु से ही विवादों में घिरी रही. निठारी पीड़ित सीबीआई पर बार बार पंधेर को बचाने का आरोप लगाते रहे हैं. सीबीआई ने अब तक 11 मामले में चार्जसीट दायर की है जिसमे सभी में पंधेर को क्लीनचिट दी गई है. पायल के बाद पिंकी सरकार मामले में भी अदालत ने सीबीआई को कटघरे में खड़ा करते हुए उसे पंधेर के खिलाफ हत्या और बलात्कार के अलावा अपहरण, षडयंत्र और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज करने का आदेश दिया है. जबकि पिंकी सरकार मामले में अपनी चार्जसीट में सीबीआई ने पंधेर को क्लीन चिट दे दी थी. इससे पहले पिंकी सरकार के पिता स्वर्गीय जतिन सरकार की अपील पर अदालत ने सीबीआई को इस मामले में दुबारा जांच का आदेश भी दिया था. बाद में जतिन की पं बंगाल के मुर्शिदाबाद में संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी.
निठारी कांड के मुख्य गवाह जतिन सरकार की पत्नी वंदना सरकार ने अपने पति की मौत के लिए सीबीआई को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रिम कोर्ट में याचिका भी दायर की है. अदालत के आदेश पर इस मामले में सीबीआई निदेशक विजय शंकर तिवारी, एसपी एसजेएम गिलानी और निठारी के तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को नामजद किया गया है. लेकिन इसके बावजूद सीबीआई लोगों को धमकाने से बाज नहीं आई. वंदना सरकार के वकील और सुप्रिम कोर्ट के अधिवक्ता भानू प्रताप सिंह धाकरे को भी सीबीआई फर्जी केस में फंसाने की धमकी दे रही है. श्री धाकरे गुस्से में कहते हैं, "सीबीआई की हिमाकत देखिए कि उसने मुझे धमकाने के लिए अपने एक इंसपेक्टर अजय सिंह और चार गुर्गों को भेजा था. मैंने अजय सिंह के खिलाफ नोएड़ा के सेक्टर- 39 के थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई है." इसके अलावा पीड़ित अरुण सरकार, झब्बूलाल और करणबीर ने भी अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई के वकील पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. याचिका में कहा गया है, "सीबीआई महत्वपूर्ण गवाहों की बजाए अनौपचारिक व असंबंधित गवाहों को ही सम्मन कर अदालत के सामने पेश कर रही है. ऐसा लगता है कि सीबीआई के वकील महत्वपूर्ण गवाहों और वादी मकदमा के बयान न कराकर इसका लाभ अभियुक्त पक्ष को देना चाहते हैं." इसके अलावा याचिका में तीनों ने दिनेश यादव और पंधेर पर आरोप लगाया है कि वे उसे बयान बदलने के लिए रूपयों का लालच दे रहे हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसा न करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा रही है.
सीबीआई की पोल धीरे धीरे खुलने लगी है. पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान पंधेर और कोली ने पायल और दूसरी गायब लड़कियों और बच्चों के यौन शोषण के बाद हत्या की बात स्वीकार की थी. यह इकबाले जुर्म पुलिस की जनरल डायरी और पायल की केस डायरी में दर्ज है. सीबीआई इसे हमेशा छुपाने की कोशिश करती रही. यह पंधेर के खिलाफ पुख्ता सबूत है. बाद में स्वर्गीय जतिन सरकार ने इसे अदालत में जमा कराया था. जबकि निठारी मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी डीएसपी दिनेश यादव ने इसे तब सीबीआई को सौंप दिया था. दिनेश यादव के वकील नाहर सिंह यादव ने सीबीआई की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "मेरे मुवक्किल दिनेश यादव के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल किया था. जिसका विवरण जनरल डायरी और केस डायरी में दर्ज है. दिनेश यादव ने इसे सीबीआई को सौंप दिया था. अदालत में हमने सीबीआई से इसकी प्राप्ति की रसीद भी जमा करा दी है." लेकिन सीबीआई के प्रवक्ता जी मोहंती इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "सीबीआई निठारी पीडितों को न्याय दिलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है."
आखिर जब पुलिस के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल लिया था तो सीबीआई ने उसे क्लीन चिट कैसे दे दी? यही वह सवाल है जो निठारी पीड़ितों को ही नहीं समूचे देशवासियों को मथ रहा है. एक और सवाल जो निठारी के लोगों के जेहन में बार बार घूम रहा है कि अगर पंधेर निर्दोष है तो वह लोगों को धमकिया क्यों दे रहा है? बयान बदलने और गवाही से मुकरने के लिए रूपयों की पेशकश क्यों कर रहा है? इस सवाल के जवाब में ही पंधेर के गुनहगार होने का सुबूत छुपा हुआ है.
जमीन डूबी यहां हमारी, बांध की मछली कैसे तुम्हारी
ढलता सूरज उनमें स्फूर्ति और उत्साह भर देता था. जैसे ही सूरज पश्चिम की ओर अपना रुख करता चंपालाल जैसे सैकड़ों मछुआरे नाव और जाल के साथ सूरज के पीछे हो लेते. और जब सूरज बादलों के पार चला जाता तो वे तवा नदी में जाल लगा कर सुबह के इंतजार में वापस लौट आते... और जब सुबह सूरज नदी में अठखेलियां शुरु करता तो वे जाल में फंसी मछलियों से अपने भविष्य के सुनहरे सपने बुनते. चंपालाल जैसे लोग जिनके घर बार तवा बांध की भेंट चढ़ गए हों, खेत और खलिहान विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए हों, उनके लिए तो मछली ही जीवन की डोर है, इसी में उनका भविष्य बसता है. लेकिन अब ढलता सूरज चंपालाल और उनके साथियों को उत्साह और स्फूर्ति से नहीं भरता बल्कि उन्हें अंधकारमय भविष्य की चिंता और अवसाद से भर देता है.
आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने चंपालाल और दूसरे विस्थापित मछुआरों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इस सवाल के उत्तर के लिए आप को हमारे साथ मध्य प्रदेश के होशगांबाद जिले के केसला में स्थित तवा विस्थापित आदिवासी मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ (तवा मत्स्य संघ) के कार्यालय चलना होगा. जहां सहकारिता के एक सफल प्रयोग का गला घोटा जा रहा है. इसने साबित किया कि प्राकृतिक संसाधनों पर अगर स्थानीय लोगों को अधिकार मिलता है तो सरकारी व निजी तंत्र के मुकाबले कहीं बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है. इन संसाधनों के जरिए वे अपना विकास भी कर सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण भी. इसी सिद्धांत के तहत संघ ने स्थानीय मछुआरों को ठेकेदारों के शोषण से मुक्त कर उन्हें आत्म निर्भर बना दिया. संघ के मछली डीपो के प्रबंधक रूपेश बाथरी कहते हैं, "पहले भुगतान लेने मछुआरे हमारे पास पैदल आते थे लेकिन अब वे मोटरसाइकिल से आते हैं." कभी लोगों के हूजूम से रौशन रहने वाले संघ के मछली डीपों में अब विरानगी का आलम है. जबकि मछुआरे चंपालाल कहते हैं, "संघ के बंद होने से उनकी रातों की नींद उड़ गई है. न तो इनके पास खेत है और न ही कोई रोजगार. संघ को मछली बेचकर वे अपना भरण पोषण करते थे. लेकिन अब तो मछली पकड़ने पर ही रोक लगा दी गई है."
दरअसल तवा मत्स्य संघ तवा बांध से विस्थापित स्थानीय आदिवासियों की सहकारी संस्था है. जो स्थानीय मछुआरों के सहयोग से तवा जलाशय में मछली उत्पादन और विपणन कार्य करती थी. लेकिन करीब नौ महीने से सरकार ने इससे जलाशय से मछली उत्पादन और विपणन का अधिकार वापस ले लिया है. तवा बांध बनने से करीब 44 गांव डूब गए. इससे 4000 परिवार प्रभावित हुए हैं. 1974 में बने इस बांध से उजड़े लोगों को सरकार ने न तो उचित मुआवजा दिया और न ही इन्हें ठीक से पुनर्वासित किया. मछली का शिकार ही इनकी रोजी रोटी का जरिया है. लेकिन कानूनन ये लोग बांध में मछली का शिकार नहीं कर सकते है, क्योंकि इस पर सरकार का अधिकार होता है. सरकार यह काम ठेकेदारों से ठेके पर करवाती है. पहले ठेकेदार के तहत ही ये लोग मछली का शिकार करते थे. लेकिन ठेकेदार इनका जम कर शोषण करता था. इनसे वह मामलू दामों पर मछली खरीदता था और भारी मुनाफे के साथ वह लोगों को बेचता था. मछुआरों को खाने के लिए भी मछली ठेकेदार से खरीदनी पड़ती थी. चंपालाल बताते हैं, "एक बार ठेकेदार ने मछली चोरी के शक में उनकी इतनी पिटाई की की वे महीनों बिस्तर पर रहे. ठेकेदार के गुंडे जलाशय की निगरानी रखते. वे हमारे घरों में जाकर तलाशी भी लेते. अगर कोई मछली पकाते मिल जाता तो उसकी धुनाई की जाती."
लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने दिसंबर 1996 में तवा मत्स्य संघ को सहकारिता के जरिए तवा बांध के मछली के शिकार, विपणन और प्रबंधन की जिम्मेदारी देते हुए पांच साल का अनुबंध किया. यह प्रयोग सफल रहा और इसने मछुआरों को ठेकेदोरों से दुगनी कीमत देनी शुरु की. इसके अलावा साल के आखीर में लाभांश को बोनस के रूप में मछुआरों को बांट दिया जाता था. संघ के पास 10 साल तक तवा बांध का ठेका रहा. इस दौरान उसने अपना उत्पादन कई गुना बढ़ाया. पहले जहां मछुआरों को ठेकेदारों से साल में करीब सात लाख रूपये की कमाई होती थी. वहीं संघ के आने के बाद यह कमाई 40 लाख रूपये तक होने लगी. संघ के आंकड़ें बताते हैं कि 10 साल में उसने सरकार को रायल्टी के रूप में 1.39 करोड़ रूपये अदा किए. संघ मुनाफे में था. मुनाफे को वह बोनस के रुप में मछुआरों को बांट देता था. संघ हर साल वह करीब सवा करोड़ का कारोबार करता था. जिसमें से करीब 20 लाख रायल्टी के रूप में सरकार और करीब 45 लाख मेहनाते के रूप में मछुआरों की जेब में जाते थे. संघ इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि मछली का शिकार उतना ही किया जाए जिससे जलाशय के पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरण को नुकसान न हो.
तवा मतस्य संघ की वजह से वन विभाग और सरकारी अधिकारियों को ठेकेदारों से मिलने वाली मोटी कमाई बंद हो गई. संघ के सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कहते हैं, "बड़े जलाशयों के ठेके का पैसा बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक जाता है. लेकिन तवा से उन्हें कुछ हासिल नहीं होता था. लिहाजा सरकारी अमला तवा मत्स्य संघ के खिलाफ हो गया." अधिकारियों ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी गुमराह किया. तवा और बरगी मत्स्य संघ के बारे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं, "वहां के बारे में हमें कई तरह की अनिमियताओं की शिकायतें मिली हैं." मध्य प्रदेश में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर ही करीब 30 बड़े और 135 मध्यम दर्जे के बांध प्रस्तावित हैं. जाहिर है बांधों के मछली के ठेके की आड़ में अधिकारियों की मोटी कमाई होगी. तवा में जिस तरह से सहकारिता का प्रयोग सफल हो रहा था उससे इन अधिकारियों को लगने लगा कि कहीं इसे समूचे राज्य में न लागू कर दिया जाए. लिहाजा इस बार उन्होंने तवा बांध को आरक्षित वन क्षेत्र में शामिल होने का सहारा लेकर इसमें मछली के शिकार पर रोक लगा दी है. यही वजह है कि दिसंबर, 2006 में संघ का अनुबंध फिर नहीं बढ़ाया गया. तवा बांध सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभ्यारण और पंचमढ़ी अभ्यारण से घिरा हुआ है. कुछ समय पहले सरकार ने इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल करते हुए टाईगर रिजर्व एरिया घोषित कर दिया. लिहाजा वन्य प्राणी संरक्षण कानून के तहत यहां मछली का शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया. फिलहाल यह मामला सुप्रिम कोर्ट में है.
तवा जलाशय में जब मैने नाव के जरिए घूम कर पड़ताल की तो पाया कि प्रतिबंध के बावजूद मछली का शिकार रुका नहीं है. वन अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर मछली की चोरी हो रही है. स्थानीय मछुआरों से भी वन विभाग वसूली कर रहा है. चंपालाल बताते हैं, "वन विभाग के लोगों ने उनके भाई को मछली का शिकार करते हुए पकड़ लिया और 1500 रिश्वत लेने के बाद छोड़ा." जबकि तवा के वन संरक्षक एस एस राजपूत उल्टे तवा मत्स्य संघ पर आरोप लगाते हुए कहते हैं," संघ मछली की चोरी कर रहा है. इसके खिलाफ कार्रवाई के लिए हमने शासन से सिफारिश भी की है." दरअसल तवा बांध की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जलाशय के दो छोर पर जंगल है, जिस पर वन विभाग का अधिकार है. इन इलाकों में बाहरी लोग आकर मछली का शिकार कर रहे हैं. यह भी सही है कि स्थानीय मछुआरे भी, जो तवा मत्स्य संघ से जुड़े रहे हैं, मछली का शिकार कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इसके अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है. सरकार उन्हें चोर बनने के लिए मजबूर कर रही है.
तवा मत्य संघ के कार्यों की प्रशंसा देश की गरीबी पर अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो नीलकंठ रथ ने भी की है. अहमदाबाद स्थित संस्थान सेंटर फार इनवारमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नालॉजी ने तवा मत्स्य संघ पर शोध किया और इसके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दोहन के बीच संतुलन कायम करने के इसके कार्यों की प्रशंसा की. प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायणन की अध्यक्षता में बनी टाइगर टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में तवा मत्स्य संघ के कार्यों की सराहना करते हुए इसे एक मॉडल के रूप में पेश किया है कि कैसे स्थानीय लोगों की मदद से पर्यावरण व वन्य जीवों का संरक्षण किया जा सकता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में तवा और महाराष्ट्र के पेंच बांध की तुलना भी की है. रिपोर्ट के मुताबिक वन संरक्षण कानून के तहत पेंच जलाशय में भी मछली के शिकार पर रोक लगा दी गई है. लेकिन असलियत यह है कि वहां मछली चोरों का संगठित गिरोह तैयार हो गया है जो गैरकानूनी रूप से वहां मछली का शिकार कर रहा है.
लाल फीता शाही का दूसरा उदाहरण बरगी जलाशय है. तवा से पहले ठेकेदारों ने सरकारी अधिकारियों से मिल कर बरगी बांध विस्तापित मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ के भी ठेके को रद्द करवा दिया था. बरगी मत्स्य संघ के संयोजक राजकुमार सिन्हा कहते हैं, "ठेकेदारी के बाद संघ के मुकाबले औसत मत्स्य उत्पादन घटा है. यह सालाना 430 मीट्रीक टन से घट कर अब 181 मीट्रिक टन हो गया है. सरकार का दोहरा चरित्र देखिए की वह बरगी मत्स्य संघ के लिए तो वह सालाना 700 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का काफी ऊंचा लक्ष्य रखती है, जबकि ठेकेदार को केवल 300 मीट्रिक टन का लक्ष्य दिया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि लक्ष्य न हासिल कर पाने पर संघ का अनुबंध खत्म करने का उन्हें बहाना मिल जाए." 1994 से 2001 तक मछली शिकार का ठेका तवा संघ की तर्ज पर बर्गी मत्स्य संघ के पास था.
सरकारी अधिकारी कैसे ठेकेदारों के हित में काम करते हैं, बर्गी इसकी मिसाल है. 3 सितंबर, 2007 को मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें यह फैसला हुआ कि बांधों में मछली के शिकार का ठेका ठेकेदारों को न दे कर स्थानीय मछुआरों के फेडरेशन को दिया जाए. जैसा कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ हैं. इस बैठक में प्रमुख सचिव (मछली पालन), नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) के उपाध्यक्ष और राज्य मत्स्य महासंघ की प्रबंध निदेशक मौजूद थी. राज्य मत्स्य महासंघ ही बांधों के जलाशयों में मछली के ठेके आदि देती है. इस फैसले का उलंघन करते हुए 13 सितंबर, 2007 राज्य मत्स्य महासंघ ने बर्गी जलाशय का ठेका बर्गी मत्स्य संघ को देने की बजाए पुराने ठेकेदार को दे दिया. सरकार ने इसकी जांच के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई. कमेटी ने जांच में पाया कि राज्य मत्स्य महासंघ ने ठेका देने में अनियमितता बरती है. लेकिन महासंघ के अधिकारी अब अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए इस कमेटी की रिपोर्ट को झूठा ठहराते हुए फिर से जांच के लिए अपने एक महा प्रवंधक डीके वापना को बर्गी भेजा. महासंघ की करतूतों को भांप कर बड़ी संख्या में मछूआरे उनसे बात करने पहुंचे. लेकिन वापना उनसे बात किए बगैर ही वापस लौट गए. इस बारे में मछुआरों ने राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से शिकायत भी की है. इससे साबित होता है कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ के सहकारिता के सफल प्रयोगों को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए बलि का बकरा बना दिया. अगर ठेकेदार के शोषण से आजिज आकर ये लोग बंदूक उठा लें, तो इसका जिम्मदार कौन होगा?
आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने चंपालाल और दूसरे विस्थापित मछुआरों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इस सवाल के उत्तर के लिए आप को हमारे साथ मध्य प्रदेश के होशगांबाद जिले के केसला में स्थित तवा विस्थापित आदिवासी मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ (तवा मत्स्य संघ) के कार्यालय चलना होगा. जहां सहकारिता के एक सफल प्रयोग का गला घोटा जा रहा है. इसने साबित किया कि प्राकृतिक संसाधनों पर अगर स्थानीय लोगों को अधिकार मिलता है तो सरकारी व निजी तंत्र के मुकाबले कहीं बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है. इन संसाधनों के जरिए वे अपना विकास भी कर सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण भी. इसी सिद्धांत के तहत संघ ने स्थानीय मछुआरों को ठेकेदारों के शोषण से मुक्त कर उन्हें आत्म निर्भर बना दिया. संघ के मछली डीपो के प्रबंधक रूपेश बाथरी कहते हैं, "पहले भुगतान लेने मछुआरे हमारे पास पैदल आते थे लेकिन अब वे मोटरसाइकिल से आते हैं." कभी लोगों के हूजूम से रौशन रहने वाले संघ के मछली डीपों में अब विरानगी का आलम है. जबकि मछुआरे चंपालाल कहते हैं, "संघ के बंद होने से उनकी रातों की नींद उड़ गई है. न तो इनके पास खेत है और न ही कोई रोजगार. संघ को मछली बेचकर वे अपना भरण पोषण करते थे. लेकिन अब तो मछली पकड़ने पर ही रोक लगा दी गई है."
दरअसल तवा मत्स्य संघ तवा बांध से विस्थापित स्थानीय आदिवासियों की सहकारी संस्था है. जो स्थानीय मछुआरों के सहयोग से तवा जलाशय में मछली उत्पादन और विपणन कार्य करती थी. लेकिन करीब नौ महीने से सरकार ने इससे जलाशय से मछली उत्पादन और विपणन का अधिकार वापस ले लिया है. तवा बांध बनने से करीब 44 गांव डूब गए. इससे 4000 परिवार प्रभावित हुए हैं. 1974 में बने इस बांध से उजड़े लोगों को सरकार ने न तो उचित मुआवजा दिया और न ही इन्हें ठीक से पुनर्वासित किया. मछली का शिकार ही इनकी रोजी रोटी का जरिया है. लेकिन कानूनन ये लोग बांध में मछली का शिकार नहीं कर सकते है, क्योंकि इस पर सरकार का अधिकार होता है. सरकार यह काम ठेकेदारों से ठेके पर करवाती है. पहले ठेकेदार के तहत ही ये लोग मछली का शिकार करते थे. लेकिन ठेकेदार इनका जम कर शोषण करता था. इनसे वह मामलू दामों पर मछली खरीदता था और भारी मुनाफे के साथ वह लोगों को बेचता था. मछुआरों को खाने के लिए भी मछली ठेकेदार से खरीदनी पड़ती थी. चंपालाल बताते हैं, "एक बार ठेकेदार ने मछली चोरी के शक में उनकी इतनी पिटाई की की वे महीनों बिस्तर पर रहे. ठेकेदार के गुंडे जलाशय की निगरानी रखते. वे हमारे घरों में जाकर तलाशी भी लेते. अगर कोई मछली पकाते मिल जाता तो उसकी धुनाई की जाती."
लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने दिसंबर 1996 में तवा मत्स्य संघ को सहकारिता के जरिए तवा बांध के मछली के शिकार, विपणन और प्रबंधन की जिम्मेदारी देते हुए पांच साल का अनुबंध किया. यह प्रयोग सफल रहा और इसने मछुआरों को ठेकेदोरों से दुगनी कीमत देनी शुरु की. इसके अलावा साल के आखीर में लाभांश को बोनस के रूप में मछुआरों को बांट दिया जाता था. संघ के पास 10 साल तक तवा बांध का ठेका रहा. इस दौरान उसने अपना उत्पादन कई गुना बढ़ाया. पहले जहां मछुआरों को ठेकेदारों से साल में करीब सात लाख रूपये की कमाई होती थी. वहीं संघ के आने के बाद यह कमाई 40 लाख रूपये तक होने लगी. संघ के आंकड़ें बताते हैं कि 10 साल में उसने सरकार को रायल्टी के रूप में 1.39 करोड़ रूपये अदा किए. संघ मुनाफे में था. मुनाफे को वह बोनस के रुप में मछुआरों को बांट देता था. संघ हर साल वह करीब सवा करोड़ का कारोबार करता था. जिसमें से करीब 20 लाख रायल्टी के रूप में सरकार और करीब 45 लाख मेहनाते के रूप में मछुआरों की जेब में जाते थे. संघ इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि मछली का शिकार उतना ही किया जाए जिससे जलाशय के पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरण को नुकसान न हो.
तवा मतस्य संघ की वजह से वन विभाग और सरकारी अधिकारियों को ठेकेदारों से मिलने वाली मोटी कमाई बंद हो गई. संघ के सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कहते हैं, "बड़े जलाशयों के ठेके का पैसा बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक जाता है. लेकिन तवा से उन्हें कुछ हासिल नहीं होता था. लिहाजा सरकारी अमला तवा मत्स्य संघ के खिलाफ हो गया." अधिकारियों ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी गुमराह किया. तवा और बरगी मत्स्य संघ के बारे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं, "वहां के बारे में हमें कई तरह की अनिमियताओं की शिकायतें मिली हैं." मध्य प्रदेश में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर ही करीब 30 बड़े और 135 मध्यम दर्जे के बांध प्रस्तावित हैं. जाहिर है बांधों के मछली के ठेके की आड़ में अधिकारियों की मोटी कमाई होगी. तवा में जिस तरह से सहकारिता का प्रयोग सफल हो रहा था उससे इन अधिकारियों को लगने लगा कि कहीं इसे समूचे राज्य में न लागू कर दिया जाए. लिहाजा इस बार उन्होंने तवा बांध को आरक्षित वन क्षेत्र में शामिल होने का सहारा लेकर इसमें मछली के शिकार पर रोक लगा दी है. यही वजह है कि दिसंबर, 2006 में संघ का अनुबंध फिर नहीं बढ़ाया गया. तवा बांध सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभ्यारण और पंचमढ़ी अभ्यारण से घिरा हुआ है. कुछ समय पहले सरकार ने इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल करते हुए टाईगर रिजर्व एरिया घोषित कर दिया. लिहाजा वन्य प्राणी संरक्षण कानून के तहत यहां मछली का शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया. फिलहाल यह मामला सुप्रिम कोर्ट में है.
तवा जलाशय में जब मैने नाव के जरिए घूम कर पड़ताल की तो पाया कि प्रतिबंध के बावजूद मछली का शिकार रुका नहीं है. वन अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर मछली की चोरी हो रही है. स्थानीय मछुआरों से भी वन विभाग वसूली कर रहा है. चंपालाल बताते हैं, "वन विभाग के लोगों ने उनके भाई को मछली का शिकार करते हुए पकड़ लिया और 1500 रिश्वत लेने के बाद छोड़ा." जबकि तवा के वन संरक्षक एस एस राजपूत उल्टे तवा मत्स्य संघ पर आरोप लगाते हुए कहते हैं," संघ मछली की चोरी कर रहा है. इसके खिलाफ कार्रवाई के लिए हमने शासन से सिफारिश भी की है." दरअसल तवा बांध की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जलाशय के दो छोर पर जंगल है, जिस पर वन विभाग का अधिकार है. इन इलाकों में बाहरी लोग आकर मछली का शिकार कर रहे हैं. यह भी सही है कि स्थानीय मछुआरे भी, जो तवा मत्स्य संघ से जुड़े रहे हैं, मछली का शिकार कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इसके अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है. सरकार उन्हें चोर बनने के लिए मजबूर कर रही है.
तवा मत्य संघ के कार्यों की प्रशंसा देश की गरीबी पर अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो नीलकंठ रथ ने भी की है. अहमदाबाद स्थित संस्थान सेंटर फार इनवारमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नालॉजी ने तवा मत्स्य संघ पर शोध किया और इसके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दोहन के बीच संतुलन कायम करने के इसके कार्यों की प्रशंसा की. प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायणन की अध्यक्षता में बनी टाइगर टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में तवा मत्स्य संघ के कार्यों की सराहना करते हुए इसे एक मॉडल के रूप में पेश किया है कि कैसे स्थानीय लोगों की मदद से पर्यावरण व वन्य जीवों का संरक्षण किया जा सकता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में तवा और महाराष्ट्र के पेंच बांध की तुलना भी की है. रिपोर्ट के मुताबिक वन संरक्षण कानून के तहत पेंच जलाशय में भी मछली के शिकार पर रोक लगा दी गई है. लेकिन असलियत यह है कि वहां मछली चोरों का संगठित गिरोह तैयार हो गया है जो गैरकानूनी रूप से वहां मछली का शिकार कर रहा है.
लाल फीता शाही का दूसरा उदाहरण बरगी जलाशय है. तवा से पहले ठेकेदारों ने सरकारी अधिकारियों से मिल कर बरगी बांध विस्तापित मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ के भी ठेके को रद्द करवा दिया था. बरगी मत्स्य संघ के संयोजक राजकुमार सिन्हा कहते हैं, "ठेकेदारी के बाद संघ के मुकाबले औसत मत्स्य उत्पादन घटा है. यह सालाना 430 मीट्रीक टन से घट कर अब 181 मीट्रिक टन हो गया है. सरकार का दोहरा चरित्र देखिए की वह बरगी मत्स्य संघ के लिए तो वह सालाना 700 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का काफी ऊंचा लक्ष्य रखती है, जबकि ठेकेदार को केवल 300 मीट्रिक टन का लक्ष्य दिया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि लक्ष्य न हासिल कर पाने पर संघ का अनुबंध खत्म करने का उन्हें बहाना मिल जाए." 1994 से 2001 तक मछली शिकार का ठेका तवा संघ की तर्ज पर बर्गी मत्स्य संघ के पास था.
सरकारी अधिकारी कैसे ठेकेदारों के हित में काम करते हैं, बर्गी इसकी मिसाल है. 3 सितंबर, 2007 को मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें यह फैसला हुआ कि बांधों में मछली के शिकार का ठेका ठेकेदारों को न दे कर स्थानीय मछुआरों के फेडरेशन को दिया जाए. जैसा कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ हैं. इस बैठक में प्रमुख सचिव (मछली पालन), नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) के उपाध्यक्ष और राज्य मत्स्य महासंघ की प्रबंध निदेशक मौजूद थी. राज्य मत्स्य महासंघ ही बांधों के जलाशयों में मछली के ठेके आदि देती है. इस फैसले का उलंघन करते हुए 13 सितंबर, 2007 राज्य मत्स्य महासंघ ने बर्गी जलाशय का ठेका बर्गी मत्स्य संघ को देने की बजाए पुराने ठेकेदार को दे दिया. सरकार ने इसकी जांच के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई. कमेटी ने जांच में पाया कि राज्य मत्स्य महासंघ ने ठेका देने में अनियमितता बरती है. लेकिन महासंघ के अधिकारी अब अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए इस कमेटी की रिपोर्ट को झूठा ठहराते हुए फिर से जांच के लिए अपने एक महा प्रवंधक डीके वापना को बर्गी भेजा. महासंघ की करतूतों को भांप कर बड़ी संख्या में मछूआरे उनसे बात करने पहुंचे. लेकिन वापना उनसे बात किए बगैर ही वापस लौट गए. इस बारे में मछुआरों ने राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से शिकायत भी की है. इससे साबित होता है कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ के सहकारिता के सफल प्रयोगों को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए बलि का बकरा बना दिया. अगर ठेकेदार के शोषण से आजिज आकर ये लोग बंदूक उठा लें, तो इसका जिम्मदार कौन होगा?
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