Tuesday, 28 February 2017

बाल मजदूरी की वजह से ही गरीबी है!!!

बाल मजदूरी पर जब भी चर्चा होती है तो अकसर लोगों का तर्क होता है कि भारत में इतनी गरीबी है कि गरीब का बच्चा काम नहीं करेगा तो भूखों मर जाएगा। लेकिन यह मिथ है कि गरीबी की वजह से बाल मजदूरी है। बल्कि हकीकत यह भी है कि बाल मजदूरी की वजह से ही गरीबी है। दुनिया के तमाम अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि बाल मजदूरी से गरीबी बढ़ती है।
 इस हकीकत को समझने के लिए हमें बाल मजदूरी और गरीबी के अंतरसंबंध को समझना होगा। गरीबी और बाल मजदूरी में गहरा रिश्ता है। दुनिया में करीब 16.8 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। जबकि बेरोजगारों की संख्या तकरीबन 20 करोड़ है। इसी तरह से भारत में गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 5 करोड़ बाल मजदूर हैं। जबकि बेरोजगारों की संख्या 6 करोड़ है। अब जरा सरकारी आंकड़ो पर नजर डालते हैं। भारत सरकरा की जनगणना रिपोर्ट-2011 के मुताबित देश में बाल मजदूरों की संख्या करीब 43 लाख है। जबकि श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि देश में बेरोजगारों की संख्या तकरीबन 50 लाख है। इन आंकड़ों पर गौर करने से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि बाल मजदूरों और बेरोजगारों की संख्या में कोई बहुत अंतर नहीं है। दुनिया के कई देशों में गैरसरकारी अध्ययनों से यह बात निकल कर आई है कि बाल मजदूरी करने वाले बच्चे बेरोजगार वयस्कों की ही औलाद होती हैं। भारत में भी इस पर अध्ययन हुआ है। लेकिन हाल ही में ब्राजील, नाईजीरिया, मेक्सिको व फिलीपिंस में किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि बाल मजदूर उन माता-पिताओं की संताने होती हैं जिन्हें 100 या 100 से अधिक दिनों में रोजगार नहीं मिल पाता। यानी अगर बाल मजदूरी न कराई जाए तो ऐसी स्थिति में इन बच्चों के माता-पिता को ही रोजगार मिलेगा। इसका निष्कर्ष यह निकला कि अगर बाल मजदूरी पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाए तो  ज्यादातर बेरोजगार वयस्कों को रोजगार मिल सकता है। ऐसी स्थित में बच्चे काम की बजाए पढ़ाई करेंगे और वे भविष्य में एक बेहतर नागरिक के रूप में तैयार होंगे। भारत में 14 साल तक के सभी बच्चों के लिए अऩिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने का कानूनी प्रावधान भी है। शिक्षा और रोजगार को लेकर दुनिया में किए गए अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि जिन लोगों ने एक साल की प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर ली, उनकी आय में तकरीबन 15 फीसदी का इजाफा हो जाता है।  यह तो जग जाहिर है कि अच्छी पढ़ाई से अच्छा करियर बनता है। जो बच्चा आज बाल श्रमिक के रूप में कलंक की तरह है, वही कल को पढ़ लिख कर न केवल अच्छा रोजगार प्राप्त करेगा, बल्कि देश की जीडीपी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान भी प्रदान करेगा। योग्य वयस्क अगर बेरोजगार रहेंगे और उनकी जगह सस्ते श्रमिकों के लालच में बच्चों से मजदूरी कराई जाती रहेगी तो आर्थिक विकास में बाधा का एक मुख्य कारण बाल मजदूरी ही होगी।
दरअसल बाल मजदूरी के दुष्चक्र की वजह नियोक्ताओं का लालच है। वे पैसे बचाने के लिए बड़ो की बजाए बच्चों को रोजगार देते हैं। बच्चा न केवल सस्ता श्रमिक होता है बल्कि मालिक के किसी अन्यायपूर्ण व्यवहार का विरोध भी नहीं करता। उससे जबरन 15-20 घंटे काम कराया जाता है जबकि वयस्क मजदूर 8 घंटे से ज्यादा काम कराने पर ओवरटाइम की मांग करेगा। उसे मजदूरों के अधिकार के तहत सभी सुविधाएं भी देनी होगी। जबकि 500-1000 रूपये महीने की पगार पर बाल मजदूरों को बहाल किया जाता है। अगर इन बाल मजदूरों के स्थान पर कोई वयस्क व्यक्ति को रखा जाए तो उसे कम से कम 7000 से 8000 रूपये देने पड़ेगे। एक और महत्वपूर्ण बात, बालश्रम काला धन को भी बढ़ावा देता है। बाल मजदूरों को जो पैसा दिया जाता है, मालिक उसका कोई कानूनी हिसाब किताब नहीं रखता। हम सभी जानते हैं कि काला धन किस तरह से किसी भी अर्थव्यवस्था को खोखला कर देता है। इस तरह से बालश्रम पर पूर्ण रूप से रोक लगाने पर न केवल देश से गरीबी मिटेगी, बल्कि देश की तरक्की में बाधक काले धन के प्रवाह पर भी शिकंजा कसा जा सकता है।                  

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।