Tuesday, 18 October 2016

तो उत्तर प्रदेश में बसपा बनेगी मुसलमानों की मजबूरी!!!





बसपा भारतीय राजनीति में बिलकुल अलग तरह की पार्टी है। उसका अंदाज और काम करने का ढ़ग भी निराला है। जब दूसरे विपक्षी दल सत्ता पक्ष के खिलाफ सड़क पर होते है तो यह पार्टी खामोशी अख्तियार कर लेती है। जब सभी राजनीतिक दल सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में बसपा इसे लेकर बिल्कुल उदासीन है। जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियां विकास को मुद्दा बनाने में जुटी हैं और इसे लेकर अपने पक्ष में नारे गढ़ रही हैं, तब बसपा प्रमुख मायावती दिल्ली के अपने आलीशान घर में बैठ कर सत्ता तक पहुंचने के लिए मजबूत जातीय समीकरण बनाने का ताना-बाना बुन रही हैं। दरअसल, वह चुनावों के गुणा-गणित को अच्छी तरह पहचानती हैं और और जानती हैं कि किस समय वोटरों के नब्ज पर चोट करनी है। इस बार वह मुसलमान वोटरों की नब्ज पकड़ने में जुटी हुई हैं। 2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे सत्ता हासिल करने वाली मायावती इस बार दलित-मुसलिम गठजोड़ के सहारे पांचवी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने का प्रयास कर रही हैं।
   
करीब चार साल तक खामोश रहीं बसपा प्रमुख मायावती अचानक अब रैलियों के जरिए अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश कर रही हैं। बसपा की उदासीनता की वजह से कुछ दिनों पहले तक माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश में मुख्य लड़ाई सपा और भाजपा के बीच ही रहेगी। लेकिन भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की मायावती पर अभद्र टिप्पणी ने बसपा के उदासीन दलित वोटरों को फिर से लामबद और अक्रोशित कर दिया। और अब समाजवादी परिवार में मचे अंतरकलह ने बसपा को सत्ता में फिर से वापसी की उम्मीद बधा दी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने वाली बसपा की मुखिया मायावती एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने लगी हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है मायावती की पार्टी बसपा का मजबूत दलित वोट बैंक और उसका जातीय गठजोड़। वैसे तो उत्तर प्रदेश में सभी दल विधानसभा चुनाव में जाति का खेल खेलते हैं और पार्टी में पद देने से लेकर टिकट बंटवारे तक में जातीय समीकरण को महत्व देते हैं, लेकिन वे इसे सार्वजनिक रूप से कभी स्वीकारते नहीं हैं। बसपा इकलौती पार्टी है जो सार्वजनिक रूप से जातीय गठजोड़ और इसके समीकरण को स्वीकार करती है। बसपा संस्थापक कांशी राम ने नारा भी दिया था, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। यानी पार्टी को जो जाति जितना वोट देगी, उसी आधार पर उसकी जाति के नेताओं को मंत्री पद हासिल होगा। कांशी राम जानते थे कि दलित भले ही एक बड़ा वोट बैंक है लेकिन अकेले उसके बूते वह कभी सत्ता हासिल नहीं कर पाएंगे। लिहाजा पार्टी से और जातियों को जोड़ना होगा। कालांतर वह सत्ता हासिल करने के लिए पिछड़ो और सवर्णों से समय-समय पर गठजोड़ करते रहे हैं। इस बार मायावती की नजर मुसलिम वोटों से गठजोड़ पर है। इसके लिए उनके पास नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसा एक कद्दावर नेता भी है।       

मायावती की चुनावी रणनीति पर चर्चा करने से पहले उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात को जानना होगा। वैसे तो पूरे देश में चुनावों में जातीय समीकरण और सामुदायिक भावनाओं को भुनाने की परंपरा रही है। लेकिन उत्तर भारत में बिहार और उत्तर प्रदेश इस बीमारी से ज्यादा ग्रसित हैं। यहां सभी दल जातीय समीकरण की भूल भुलैया से जरूर गुजरते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा, सपा और रालोद दमदार तरीके से चुनाव लड़ती हैं। इसके अलावा अपना दल, पीस पार्टी और कौमी एकता दल जैसी कई छोटी पार्टियां भी हैं जिनका एक छोटे से इलाके में कुछ प्रभाव होता है। छोटे दल हो या बड़े, सभी के अपने-अपने जातीय आधार हैं। हर दल की कोशिश होती है कि अन्य जातियों या फिर आवारा वोटों में से कुछ वोट अपने हिस्से में लाकर चुनाव में अधिक से अधिक सीटें हासिल कर सकें। सपा यादव और मुसलिमों के सहारे चुनाव जीतती है तो भाजापा अति पिछड़ो, बनियों और सवर्णों के भरोसे। बसपा के पास दलित वोट बैंक का एक मजबूत आधार है। रालोद मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे प्रभावशाली जाति जाटों की पार्टी मानी जाती है। जबकि कांग्रेस से सवर्णों और दलितों का उसका पारंपरिक वोट बैंक छिटकता ही जा रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनावो का उदारण लें तो बात अपने आप समझ में आ जाएगी कि यहां जातीय गठजोड़ कितना फायदेमेंद रहता है। 2007 में जब सपा को हरा कर बसपा सत्ता में आई थी तो दोनों पार्टियों के वोट बैंक में करीब पांच फीसदी का अंतर था। यानी बसपा को सपा से करीब पांच फीसदी वोट ज्यादा मिले थे। जब 2012 में सपा सत्ता में आई तो उसे बसपा से करीब पांच फीसदी वोट ज्यादा मिले थे। महज पांच फीसदी वोटो के हेर-फेर से ही सपा को पूर्ण बहुमत मिल गया, जबकि बसपा की सीटें पहले के मुकाबले तकरीबन आधी रह गईं। जाहिर है एक दूसरे के वोट बैंक में से थोड़ा सा सेंध लगाने से ही चुनावी नतीजे बदल जाते हैं।   

इस बार भी नतीजा कुछ ऐसा ही होने वाला है। चार-पांच फीसदी वोटों के स्विंग से ही चुनाव का गणित बदल जाएगा। सभी पार्टियां इसे जानती हैं। लेकिन जाति जोड़ो के मंत्र से सत्ता प्राप्ति का ख्वाब देखने वाले कांशीराम की पार्टी बसपा इसे बखूबी समझती है। उत्तर प्रदेश में दलितों का एक बड़ा वोट बैंक है। करीब 21 फीसदी दलित वोटर हैं। इसके बाद संख्या आती है मुसलमानों की। सूबे में मुलमानों की संख्या करीब 19 फीसदी है। मायावती की नजर इस बार मुसलिम वोटों पर है। दलित और मुसलमान का गठजोड़ 40 फसीदी होता है। पिछली विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि जिस पार्टी को भी 30 फीसदी वोट मिला है उसने सत्ता हासिल की है। 2007 में मायावती ने सूबे के 10 फीसदी ब्राम्हणों का दामन थाम कर सत्ता की वैतरणी पार की थी। इस बार ब्राह्मण वोटों के भाजपा और कांग्रेस के पाले में जाने की ज्यादा संभावना है। इसलिए मायावती इस पर ज्यादा प्रयास नहीं कर रही हैं।

हाल ही में कांशीराम की पुण्यतिथि पर लखनऊ में आयोजित बसपा की रैली में मुसलमानों को अपने पाले में खींचने के लिए मायावती ने संदेश भी दिया। रैली को संबोधित करते हुए मायावती ने कहा, इस बार दलित-मुसलिम मिल कर सरकार बनाएंगे। उत्तर प्रदेश में पहले मुसलमान कांग्रेस के वोटर थे। बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद उनका झुकाव सपा की तरफ हुआ। पिछले विधानसभा चुनाव में करीब 65 फीसदी मुसलमानों ने सपा को वोट दिया था। जबकि बसपा को महज 18 फीसदी मुसलिम मतदाताओं ने पंसद किया था। मुसलमानों की स्वाभाविक रूप से पहली पंसद सपा है। सपा 12 फीसदी यादवों और मुसलमानों के भरोसे ही सरकार बनाती रही है। लेकिन सपा के जिस तरह के हालात हैं और पिछले कुछ दिनों से अखिलेश-शिवपाल की लड़ाई में जिस तरह से पार्टी का ग्राफ गिरा है, उससे मुसलिम मतदाताओं में असमंजस की स्थिति बन रही है। अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले खुद यह बयान दिया था, पहले सपा एक नंबर पर थी, अब किस नंबर पर है उन्हें पता नहीं। अखिलेश के इसी बयान से मुसलमानों को किसी और विकल्प के बारे में सोचने के लिए बेकरार किया है।

मुसलमान वोटर किसे पसंद करता है? इस सवाल का जवाब जानने से पहले चुनाव के दौरान मुसलमानों के बीच लगने वाले इस नारे, पहले अपना भाई, फिर जो भाजपा को हराई के निहितार्थ को समझना होगा। मुसलमान वोटरों की पहली पसंद अपनी बिरादरी का उम्मीदवार होता है, चाहे वह किसी पार्टी का हो। दूसरी पंसद वह दल होता है जो भाजपा को हरा सके।  इस कसौटी पर सपा ही आगे रहती थी। अब सवाल उठता है अगर सपा मैदान में पीछे हो गई है तो भाजपा को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने से कौन सा दल रोक सकता है? ऐसे में बसपा का नाम उभरता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में प्रशांत किशोर की लाख मशक्कत के बाद भी कांग्रेस फिलहाल तो लड़ाई में नहीं दिख रही है। इसलिए मौजूदा राजनीतिक परिस्थियों में बसपा मुसलमानों की भी मजबूरी बनती दिख रही है। मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न भी किसी दल को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मुसलिम वोट एक तरफा और एक मुश्त पड़ता है। इनके मतदान का प्रतिशत भी अन्य जातियों के मुकाबले कहीं बहुत ज्यादा होता है।

हालांकि बसपा के साथ भी एक चुनौती उसका खुद का दलित वोट बैंक है। दलितों के तबके का मायावती से धीरे-धीरे मोह भंग हो रहा है। दलितों का पढ़ा लिखा तबका मायावती की पारंपरिक राजनीति को पसंद नहीं करता और वह भाजपा जैसे दलों की तरफ रुख कर रहा है। सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि सन 2000 तक दलितों के 85 फीसदी वोट बसपा को मिलते थे। इसके बाद धीरे-धीरे इसमें गिरावट आनी शुरु हुई है। एक दशक बाद साल 2012 में दलितो के इस समर्थन में 23 फीसदी की और गिरावट आई। 2014 के लोकसभा में बसपा को दलितों का महज 62 फीसदी वोट ही हासिल हो पाया था। बावजूद इसके, अगर दलित-मुसलिम गठजोड़ बनता है तो यह सभी दलों पर भारी पड़ सकता है।





Tuesday, 11 October 2016



            सौ रूपये में गोवा यात्रा!!!

यह फोटो महज कुछ दिन ही पुरानी है, लेकिन मेरे लिए बहुत अनमोल है। इस फोटो को मैंने लैपटॉप के डेस्कटॉप पर सजा रखा है। जब भी इस फोटो पर नजर जाती है, कुछ पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और ओठों पर मुस्कान तैर जाती है। खास करके गोवा घूमने की घटना याद करके। इस घटना पर जरा रुक कर आता हूं। पहले फोटो का परिचय करा दूं। इस फोटो में बाए मैं हूं और दाएं जयवीर सिंह राणा। बीच में हैं हमारे प्रिय गुरु जी और दिल्ली विश्वविद्यालय के एआरएसडी कॉलेज के प्राचार्य डा ज्ञानतोष झा सर।
जब हमने और जयवीर ने एआरएसडी कॉलेज में दाखिला लिया था उसी साल झा सर असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर आए थे। मुझसे और जयवीर से झा सर का खासा लगाव रहता था। वैसे, सर जयवीर को ज्यादा स्नेह करते थे और आज भी ज्यादा करते हैं। यह सर से शिकायत नहीं है। दरअसल, जयवीर है ही ऐसा कि सब उसे बहुत प्यार करते हैं और सम्मान देते हैं। सरल और निश्छल। आज भी जयवीर उनसे महीने में एक-दो बार मिल ही आता है। पिछले कुछ दिनों से जब भी यह फोटो देखता हूं, जयवीर और अपने साथ के कॉलेज के बिताए दिन याद आ जाते हैं। हमारी कक्षाएं अलग-अलग थीं, लेकिन ज्यदातर समय हम साथ ही रहते। हमारी पक्की वाली जोड़ी हुआ करती थी। बस थोड़ी देर के लिए क्लास अटेंट करने के लिए जुदा होते और क्लास खत्म होते ही फिर अपने अड्डे पर मिल जाते।

अब बात जयवीर के साथ गोवा भ्रमण की करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में दिसंबर में क्रिसमस के अवसर पर 15 दिन की छुट्टियां होती हैं। एक तरह से छात्रों की मौजमस्ती का यह अंतिम महीना होता है। मार्च से परीक्षाएं शुरु हो जाती थीं, लिहाजा जनवरी से लोग इसकी तैयारी में जुट जाते थे। इन छुट्टियों में कॉलेज के कन्सेशन टिकट पर छात्र घूमने जाते। हमारे कुछ साथियों ने गोवा जाने का कार्यक्रम बना लिया। लेकिन किसी कारण से मैं उनके साथ गोवा नहीं जा रहा था। जयवीर को मैं गोवा एक्सप्रेस में सीऑफ करने निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा। ट्रेन चलने से कुछ देर पहले जयवीर कहने लगा, पांडे तू नहीं चलेगा तो मजा नहीं आएगा यार। जयवीर के दिमाग में फौरन एक आइडिया आया उसने कहा, हमारा एक साथी नहीं जा रहा है। उसकी टिकट पर तू चल। जयवीर चलने के लिए जिद करने लगा। पहले तो मैं थोडा असहज हुआ। न तो कपड़े हैं और न ही अन्य जरूरत के सामान। लेकिन दोस्त की बात टाली भी नहीं जा रही थी। ट्रेन के रवाना होने में कुछ ही मिनट बचे थे कि जयवीर ने स्टोशन के ही टेलीफोन बूथ से फौरन बड़े भैया को फोन कर दिया कि अनिल को मैं अपने साथ गोवा ले जा रहा हूं। बड़े भैया भी सकपकाए कि यह क्या मजाक है। खैर, यह जयवीर का स्वभाव है कि वह सबसे अपनी बात मनवा लेता है। भैया को उसने मना लिया कि अनिल को कोई दिक्कत नहीं होगी और गोवा में हम उसके लिए कपड़े खरीद लेंगे। गोवा पहुंचते ही एक टी शर्ट और निक्कर खरीद लिया। बाकी, रोज रात में कपड़े धुलता और सुबह पहन कर घूम आता। रोज एक ही शर्ट और पैंट पहनने वाला मैं गोवावासियों के लिए किसी अजूबे से कम न था। लोग मुझे एक ही कपड़ों की वजह से अच्छे से पहचानने लगे थे। होटल वाले से लेकर पुलिस वाले भी। मेरे जेब में सौ रूपये पड़े थे और इन पैसों के साथ मैं जयवीर के साथ करीब दो हफ्ते गोवा घूम कर आ गया था। खूब मस्ती की... न जाने क्या क्या किया। हमारी देर से आने की आदतों से तंग आ कर एक रात यूथ हॉस्टल के वार्डन ने दरवाजा ही नहीं खोला और हमने समुद्र किनारे एक पार्क में ठिठुरते हुए रात गुजारी। समुद्र किनारे की रात बहुत ही ठंडी होती है और आदमी ठिठुरने लगता है। ठंड से बेहाल हम एक दूसरे के कपड़ों में अपना हाथ मुंह छुपा कर इससे बचने की नाकाम कोशिश करते रहे। जब ठंड असहनीय हो गई तो हमने नारियल और अन्य पेड़ों के पत्ते इकठ्ठा कर सिगरेट पीने वाले एक दोस्त की मदद से उसमें आग लगा कर किसी तरह रात काटी। सुबह यूथ हास्टल पहुंचे तो वार्डन ने हमारा सामान बाहर रखवा दिया था। बाकी दिन रहने के लिए हमें बड़ा संघर्ष करना पड़ा। क्रिसमस के मौके पर गोवा में सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं और होटल मिलना मुस्किल होता है। हमारे एक दोस्त के बड़े भाई पंजाब टूरिज्म में बड़े अधिकारी थे। वे बड़ी मशक्कत के बाद हमें पंजाब टूरिज्म के होटल में एक कमरा दिला पाए। हम करीब 10 जने थे। नहाते-धोते कमरे में और सोते होटल की छत पर खुले आसमान के नीचे।  

जयवीर और हमारी दोस्ती आज भी उसी शिद्दत के साथ बरकरार है। लेकिन उसके बाद हम दोनों कभी साथ घूमने नहीं जा पाए। जयवीर और हम छात्र नेता थे। जयवीर बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का उपाध्यक्ष और अध्यक्ष भी बना। भाजपा युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष भी रहा। वर्तमान में दिल्ली प्रदेश भाजपा का सचिव और फिल्म सेंसर बोर्ड का सदस्य है। जयवीर का आरोप है कि मैं उसे राजनीति में ढकेल कर खुद मलाई वाली पत्रकारिता में आ गया। अब राजनीति में हैं तो समाज का काम बहुत करना पड़ता है और इस चक्कर में जनाब अक्कर देर से घर पहुंचते हैं। और जब कभी हमारी भाभी जी देर से आने का उलाहना देते हुए तल्खी से शिकायत करती हैं तो भाईसाहब गाली मुझे देते हैं, ये पांडे साला था जो मुझे राजनीति में ढ़केल गया, नहीं तो मैं किसी कॉलेज में प्रोफेसर होता। यह सच भी है जयवीर पढ़ने में मेधावी था। बाद में वकालत की पढ़ाई भी की। इसमें कोई शक नहीं की जयवीर प्रोफेसर बनना चाहता था और उसमें प्रोफेसर बनने की पूरी संभावना भी थी। लेकिन, जयवीर राजनीति में भी सफल हैं। राजनीति में सफलता किसी नेता के सांसद-विधायक बनने से नहीं मापी जाती, बल्कि उसकी लोकप्रियता से माफी जाती है। अगर जयवीर की लोकप्रियता किसी को देखनी है तो उसे एक दिन उसके साथ घूमना होगा। दिल्ली की राजनीति और सत्ता के गलियारे का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो जयवीर को न जानता हो। वैसे हम लाख कोशिश करें, लेकिन होता वही है तो नियति तय करती है। मुझे पत्रकारिता करनी थी और जयवीर को राजनीति। तुलसीदास भी कह गए हैं, होइहैं सोई जो राम रचि राखा।      



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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।