Sunday, 23 September 2007

कौन बड़ा लूटेरा - नेता या डाकू

दूर क्षितिज से वह धरती पूरी लाल दिखाई दे रही थी...ऐसा लग रह था मानों वह खून से सनी हुई हो, सूरज की रोशनी के साथ इस धरती का रंग और भी गहरा होता जा रहा था. सूर्ख लाल...सड़क के दोनों तरफ दूर तलक फैले वह लाल फूल हमारे मन में कई तरह के ख्याल पैदा कर रहे थे. कौतूहल बस हमने अपनी गाड़ी रोक कर एक ग्रामीण से उन लाल फूलों का नाम जाना चाहा, “यह लडैन के फूल हैं साहब, ये जंगली फूल बरसात में अपने आप उग आते हैं.” तभी हमारे पास से एक तेज मोटरसाईकिल गुजरती है और उसपर सवार व्यक्ति के कंधों पर झूल रही बंदूक हमें बता देती है कि हम "बंदूकों की धरती" पर हैं. लडैन के फूल.. लडैन का अर्थ होता है बहादुर या लड़ाका. अचानक जेहन में बचपन में दादी से सुनी चंबल के डाकुओं की कहानी घूमने लगती हैं. डाकू मान सिंह, पुतलीबाई, डाकू सुल्ताना, मलखान सिंह... मां भवानी के पुजारी... गरीबों के मसीहा.. दादी बताती थीं अमीरों को लूटना और गरीबों की मदद करना चंबल के डाकू अपना फर्ज समझते थे. वे डाकू नहीं बागी थे.. बागी.. जुल्म के खिलाफ बगावत. यह सब सोचते हुए हम ग्वालियर से शिवपुरी होते हुए पूर्व दस्यु सरगना और कभी चंबल में आतंक के पर्याय रहे मलखान से मिलने गुना जा रहे थे. और जब मलखान से मिल कर लौटे तो उनकी कही यह बात, “चंबल से ज्यादा खतरनाक डाकू तो संसद और विधानसभा में हैं.” हमारे कानों में देर तक गूंजती रही. चंबल के बीहड के गांवों में हमने देखा कि ज्यादातर लोग यही सोचते हैं. जब हम उनसे डाकुओं के बारे में बाते करते तो चर्चा घूम फिर कर नेताओं पर ही आ जाती और सब यही कहते, "नेता ही असली डकैत हैं, वे देश को लूट रहे हैं."
मेरे सामने एक अजीब सा यक्ष प्रश्न था.. चंबल के बीहड़ों में जाकर मैं यह सोचने को मजबूर हो गया कि आखिर देश के लिए नेता ज्यादा खतरनाक हैं या फिर डाकू ??????
चबंल के लोगों के अपने अपने तर्क हैं. भिंड के एक युवक कहते हैं, "डाकुओं की वजह से ही चंबल का पर्यावरण बचा हुआ है." वे बताते हैं कि चंबल का रेत बहुत ही उम्दा किस्म का होता है. घडियालों के संरक्षित क्षेत्र होने की वजह से इसके रेत के खनन पर पाबंदी है. लेकिन नेता और पुलिस की मदद से यहां धडल्ले से रेत खनन की तस्करी हो रही थी. लेकिन इलाके के लोगों की गुजारिश पर जगजीवन परिहार ने इसे बंद करवा दिया था. जो अवैध काम पुलिस नहीं रुकवा पाई उसे एक डाकू ने रुकवा दिया.
सत्तर के दशक में चंबल के बीहड़ों में मलखान सिंह का जबरदस्त आतंक था. गांव के मंदिर की जमीन पर सरपंच के कब्जे का विरोध मलखान को बीहडों में खीच ले गया. तब के एक मंत्री का रिश्तेदार इस सरपंच ने अपने रुतबे की वजह से मलखान को झूठे मामले में फंसा कर जेल भिजवा दिया और उनके एक साथी की हत्या करवा दी. जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद अन्याय के खिलाफ मलखान ने बंदूक उठा ली. जमीनदार से डाकू बनने वाले मानसिंह से लेकर फूलन देवी तक सभी लोगों ने अन्याय के खिलाफ ही बंदूक उठाई. डकैत होते हुए भी इनके अपने सिद्धांत हुआ करते थे... जरूरतमंदों की मदद करना और बहन-बेटियों की शादी कराना डाकू अपना फर्ज समझते थे. डाकू होते हुए भी मानसिंह अपने नेक कामों की वजह से लोकप्रिय थे. यह सुन कर आप को थोड़ा अजीब लगेगा कि इस डाकू का आगरा स्थित इसके गांव में मंदिर बना हुआ है. साल में एक बार यहां धार्मिक उत्सव भी होता है.
तीसरी पीढी के डाकुओं (ददुआ और जगजीवन परिहार वगैरह) को छोड़ दें तो पहली और दूसरी पीढ़ी के डाकू अपने चरित्र की वजह से जाने जाते थे. मानसिंह गिरोह के सरदार रह चुके लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का डाकू की इस बात पर शायद तथाकथित पढ़ लिखे लोग यकीन नहीं करेंगे कि डकैतों के भी अपने आदर्श और सिद्धांत हुआ करते थे. डकैती के वक्त डाकू घर की किसी महिला को स्पर्श नहीं करते थे. लुक्का बताते हैं, "हम लोग डकैती के दौरान किसी बहन व बेटी के गहने नहीं लूटते थे और न ही विवाहित महिला के मंगलसूत्र को हाथ लगाते थे." शराब और शबाब से दूर रहने वाले डाकू कभी बलात्कार नहीं करते थे. लुक्का की बात सुनकर अखबार की वह सुर्खियां याद आ जाती है जिसमें हमारे जनप्रतिनिधियों और नेताओं के काले कारनामें छपे होते हैं. ददुआ, दयाराम गडेरिया और जगजीवन परिहार की भी अपने इलाके व जातियों में राबिनउड की छवि थी. यहां मेरी डाकुओं की महिमागान की मंशा नहीं हैं, मैं तो यह बताना चाहता हूं कि आखिर क्यों चंबल के लोग नेताओं को देश के लिए डाकुओ से ज्यादा खतरनाक बता रहे हैं. संसद और राज्य की विधानसभाओं में सैकड़ों जनप्रतिनिधि ऐसे हैं जो आपराधिक रिकार्ड वाले हैं. उन पर हत्या, लूट और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का आरोप है. चंबल के बीहड़ों में जा कर ही समझ में आया कि आखिरकार यहां नेता से ज्यादा डाकू क्यों लोकप्रिय हैं. ददुआ अगर 30 साल तक बुंदेलखंड के जंगलों में राज करता रहा तो अपनी लोकप्रियता की वजह से. इलाके के लोग बताते हैं कि ददुआ के पास से कोई कभी निराश नहीं लौटता था. वह अपनी जाति के लोगों की भरपूर मदद करता था. आलम यह था कि हमारे जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के लिए उसकी "लोकप्रियता" और "आतंक" का सहारा लेते थे.
बीहड़ों में एक सप्ताह गुजारने के बाद लौटते वक्त जेहन में बार बार वह यक्ष प्रश्न घूम रहा था.. असली डाकू कौन है.. एक पुलिस अधिकारी की बातों ने इसका जवाब ढूढने में मदद की. अधिकारी की माने तो चंबल की दस्यु समस्या की जड में यहां के जनप्रतिनिधि ही हैं. वे ही डकैत पैदा करते हैं. दरअसल डकैत उनके लिए कमाई का जरिया हैं. अपहरण उद्योग का एक मोटा हिस्सा नेताओं के पास पहुंचता है. डाकू नेता के लिए वोट का जुगाड़ करते हैं और बदले में नेता जी उन्हें पुलिस से संरक्षण दिलाते हैं. लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार मुझे अपने यक्ष प्रश्न का जवाब मिल गया था.

बनारसीपन से मुक्त होना चाहती है नई पीढ़ी

कभी फुटपाथ किनारे चाय की दुकानों पर अड्डेबाजी करने वाले राहुल और उसके साथियों की शामें अब बनारस के सिगरा स्थित आईपी माल में गुजरती हैं. मैकडोनाल्ड के रेस्तरां में कोक और बर्गर के साथ दोस्तों के साथ गपशप..फिल्म देखना और कभी कभी बीयर के दो पैक मार लेना उनकी दिनचर्या में शुमार है. किसी एमएनसी में बढ़ियां सी नौकरी करना और विदेश में बसना उनका ख्वाब है. बीटेक कर रहे राहुल को बनारस अब बहुत बोर शहर लगने लगा है. उन्हें मलाल है कि वह दिल्ली क्यों नहीं गए पढ़ने. जींस और टी शर्ट पहने राहुल को गमछे से शख्त नफरत है. गमछा किसी बनारसी के लिए "आइ़डेंटी कार्ड" की तरह है. जबकि राहुल और उसके दोस्तों को यह गमछा "गंवारपन" का सर्टीफिकेट लगता है. और गंगा तो आम बनारसियों को मैली होने के बाद भी पवित्र लगती हैं जबकि इनके लिए गंगा एक प्रदूषित नदी भर है. राहुल कहते हैं, "बनारस में ऐसा क्या है जो यहां रहा जाए.. पान खा कर गाली देने के अलावा यहां के लोगों को कुछ काम ही नहीं है."
यह बनारस के बदलाव की एक झलक भर है. यह उस शहर की नई पीढ़ी है जिस शहर के बिस्मिल्ला खान और डा. वीरभद्र मिश्र ने लाख मौका मिलने के बाद भी इसे कभी नहीं छोड़ा. यह दोनों तो बानगी भर हैं. बनारस में ऐसे सैकड़ों लोग मिल जाएंगे जिन्हें विदेश में नौकरी और बसने का मौका मिला लेकिन वे इस शहर को छोड़ कर नहीं गए. इनके बनारस न छोडने की बस एक ही वजह थी- यहां की मस्ती और गंगा. विश्व प्रसिद्ध शहनाई वादक विस्मिल्ला खान से जब विदेश में न बसने की वजह पूछी गई तो उनका जबाव था, "वहां गंगा कहां मिलती..." तुलसी घाट पर बैठे प्रसिद्ध पर्यावरणविद व आईआईटी, बनारस में प्रोफेसर रहे डा. वीर भद्र मिश्र कहते हैं, "बनारस छोड़कर कभी कहीं जाने की इच्छा ही नहीं हुई. जब भी कभी व्याख्यान देने विदेश जाता हूं तो अपने साथ गंगा जल ले कर जाता हूं. बिना गंगा के सब सूना लगता है" डा. वीर भद्र मिश्र यहां के प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर के महंत भी हैं. दरअसल यह गंगा की नहीं गंगा के तट पर बसे बनारस की मस्ती है, यहां का फक्कड़पन है जो उन्हें यहां रोक कर रखती है. बाबा महादेव की नगरी में एक जुमला बहुत मशहूर है—"जो मजा बनारस में, न पेरिस में न फारस में." और इस मजे के लिए लोग अपना सुख और ऐशो आराम छोड़ कर बनारस में ही जमे रहते हैं. बनारस के बारे में कहा भी जाता है, "चना, चबैना गंग जल, जो पुरवे करतार. काशी कबहू न छोड़िए, विश्वनाथ दरबार." सही कहें तो यह वाक्य बनारस के पूरे जीवन दर्शन का निचोड़ है. यहां के लोगों को न धन चाहिए, न दौलत, बस चना और चबैना के साथ गंगा जल मिलता रहे तो वे कभी काशी नहीं छोड़ना चाहेंगे. लेकिन अब इस दर्शन को जीने वाले लोगों की तादाद में धीरे धीरे कमी आ रही है. नई पीढ़ी तो बनारस की आध्यात्मिक शांति और मस्ती से दूर होती जा रही है. वह बनारसीपन से मुक्त होना चाहती है. वरिष्ठ साहित्यकार और बनारस की मस्ती को जीने वाले प्रो. गया सिंह कहते हैं, "काशी अपनी परंपरागत चाल से चल रहा था कि भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने यहां के जनजीवन की शांति में खलल डाल दिया है. उपभोक्तावाद ने यहां की नई और पुरानी पीढ़ी के बीच दूरी बढ़ा दी है. पश्चिम की तथाकथित नई संस्कृति युवाओं को धीरे धीरे अपनी गिरफ्त मे ले रही है. लिहाजा वे बनारस की संस्कृति और परंपरा से कटते जा रहे हैं."
बनारस एक ऐसा शहर है जहां जन-जीवन की शुरआत अल भोर से होती है और रात 12 बजे तक चहल पहल बरकरार रहती है. सुबहे बनारस की ख्याति तो दूर दूर तक है. गंगा के मैली होने से यहां के लोगों में उसकी श्रद्दा कम नहीं हुई है लेकिन "सुबहे बनारस" की छटा इससे जरूर प्रभावित हुई है. दुनियाभर के लोग जिस शांति की तलाश में यहां आते हैं तो बनारस के घाट ही उन्हें वह शांति प्रदान करते हैं. लेकिन अब घाट घाट न रह कर पर्यटन स्थल बनते जा रहे हैं. घाटों के किनारे के घर होटल और मोटल में तब्दील हो गए हैं. घाटों पर पूजा करने वाले पंडिज जी लोग अब पूजा पाठ छोड़कर होटल का व्यवसाय कर रहे हैं. अशोक पांडेय कहते हैं, "बनारस के घाट अब घाट नहीं रह गए जुहू चौपाटी बन गए हैं. पंडों ने अपने घरों को पेइंग गेस्ट हाउस में तब्दील कर दिया है. जजमानों को आशीर्वाद देने वाले हाथ अब अंग्रेजों के कपड़े धुल रहे हैं और उनके लिए खाना बना रहे हैं." बाजार ने काशी के रक्षक पंडितों को धोबी और बाबर्जी बना दिया है.

प्रो. गया सिंह की माने तों काशी पर बाजार के साथ साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अन्य जिलो और बिहार के लोगों का भी आक्रमण हुआ है. जिससे यहां की संस्कृति खतरे में पड़ गई है. लोग पढ़ाई और रोजगार की तलाश में यहां आए और यहीं के हो कर रह गए. प्रो. गया सिंह कहते हैं, "इससे न केवल शहर पर जनसंख्या का बोझ बढ़ा बल्कि इससे काशी की मस्ती में भी खलल पड़ा, क्योंक जो लोग बाहर से आए वह काशी की संस्कृति और परंपरा से अनजान थे." बाहरी लोगों के बसने की वजह से यहां की भाषा भी प्रभावित हुई. गालियों से लबरेज काशी की बोली में गजब की मस्ती और फक्कड़पन है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चर्चित उपान्यास के लेखक प्रो. काशी नाथ सिंह कहते हैं, "यहां की बोली और गाली में एक मधुर रिश्ता है. ये गालियां आत्मीयता की सूचक होती हैं. अगर यहां कोई अपने किसी मित्र से बिना गालियों के संबोधन से बात करें, तो दूसरा मित्र पूछ बैठेगा कि सब ठीक ठाक तो है." लेकिन जिन गालियों को पुरानी पीढ़ी के लोग प्यार की भाषा मानते थे, नई पीढ़ी उन्हें अश्लील और फूहड मानती है.
बनारस बदल रहा है और लोगों के जीवन से बनारसीपन दूर होता जा रहा है. सुस्त चाल में चलने वाला यह शहर अब बाजार की दौड़ में शामिल हो गया है. लिहाजा यह शहर अब हड़बड़ी में रहने लगा है. लोगों के पास अब घाट पर घूमने और बहरी अलंग के लिए समय ही नहीं है. बहरी अलंग के तहत लोग शाम को घाटों पर इकठ्ठा होते और नाव में सिल बट्टे पर भांग घोटते गंगा के उस पार जाते और फिर मस्ती का घूंट पी कर दिन छिपने के बाद घर वापस लौटते. बाजार ने उनके रहने सहन को भी प्रभावित किया है. अशोक पांडेय कहते हैं, "जब पश्चिम के लोग हमारी संस्कृति की तरफ आकर्षित हो रहे हैं तो हम उनकी नकल पर उतारू हैं. वे हमारी धोती पहन रहे हैं जबिक हमारे युवा उनकी जींस की तरफ आकर्षित हो रहे हैं."
राजनीति ने भी बनारस को तोड़ा है. काशी का अस्सी कस्बा अपनी बौद्धिक बहसों और बुद्दिजीवियों के अड़्डे के रूप में जाना जाता है. देश के नामीगिरामी बुद्दिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों का यहां अवागमन रहता है. यहां की पप्पू व केदार की चाय की दुकान में आप को बनारस के तमाम बुद्दिजीवी मिल जाएंगे. प्रसिद्ध साहित्यकार धूमिल और नामवर सिंह का अस्सी अड़्डा रहा है. मधु दंडवते, राम मनोहर लोहिया, मधु लिमए और राज नारायण भी यहां आया करते थे. बहस मुहाबसों का अस्सी में ऐसा दौर हुआ करता था कि यहां की सड़के "संसद" के नाम से "कुख्यात" थीं. लेकिन राजनीति ने बुद्धिजीवियों को भी आपस में बांट दिया है और अब विचारधारा के आधार पर उनकी अलग अलग चाय की दुकाने हैं. प्रो. काशी नाथ सिंह कहते हैं, "अब यहां असहमित की गुंजाइश खत्म हो गई है. पहले लोगों के बीच संवाद हुआ करता था, लेकिन अब संवादहीनता की स्थिति बन गई है. लिहाजा अस्सी पर आने वाले लोग तितर बितर हो गए हैं."
सनातनी परंपरा वाले इस शहर में एक मॉल खुल गया है. काशी के रक्षक इसे बाजार का पहला हमला मान रहे हैं. लेकिन जल्दी ही यहां कई और माल खुलने वाले हैं. हालांकि बनारस अभी बाजार का उतना शिकार नहीं हुआ है जितना दूसरे शहर. हालांकि बाजार की चमक दमक से देश दुनिया के सभी शहर प्रभावित हो रहे हैं. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि वह शहर जहां पश्चिम के लोग उपभोक्तावाद और बाजार की चकाचौंध से भाग कर शांति की तलाश में आया करते है, वह शहर अब बाजार की चकाचौंध की तरफ आकर्षित हो रहा है. बनारस के बुद्धिजीवी चिंतित हैं कहीं बाजार की आंधी में इस शहर की परंपरा व संस्कृति तहस नहस न हो जाए. संस्कृति व परंपराएं इतनी आसानी से तहस नहीं होती और वह भी बनारस की, जिसकी जड़े बहुत गहरी हैं. लेकिन एक बात तो साफ है नई पीढ़ी बनारसीपन से मुक्त होने के लिए छटपटा रही है.

इस सफर के कहां हम हैं...

रोड़ क्लब में आप का स्वागत है... इस क्लब में वे साथी शामिल हो सकते हैं जिन्हें यायावरी बहुत पसंद हैं. हमारी जिंदगी का एक लंबा वक्त सड़क पर चलते हुए गुजर जाता है. पहले स्कूल और फिर कालेज... इसके बाद घर से दफ्तर और दफ्तर से घर.. बाजार, बच्चों के स्कूल और वक्त हमें न जाने कहां कहां ले जाता है...छोटी सी जिंदगी और लंबा सफर.. इस सफर में आप को बहुत सारे अनुभव होते हैं जिन्हें आप इस ब्लाग के जरिए बांट सकते हैं. इस ब्लॉग के जरिए मैं भी अपने सफर के अनुभवों को आप से शेयर करूंगा.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।