Sunday, 23 September 2007

इस सफर के कहां हम हैं...

रोड़ क्लब में आप का स्वागत है... इस क्लब में वे साथी शामिल हो सकते हैं जिन्हें यायावरी बहुत पसंद हैं. हमारी जिंदगी का एक लंबा वक्त सड़क पर चलते हुए गुजर जाता है. पहले स्कूल और फिर कालेज... इसके बाद घर से दफ्तर और दफ्तर से घर.. बाजार, बच्चों के स्कूल और वक्त हमें न जाने कहां कहां ले जाता है...छोटी सी जिंदगी और लंबा सफर.. इस सफर में आप को बहुत सारे अनुभव होते हैं जिन्हें आप इस ब्लाग के जरिए बांट सकते हैं. इस ब्लॉग के जरिए मैं भी अपने सफर के अनुभवों को आप से शेयर करूंगा.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।