Tuesday, 11 October 2016



            सौ रूपये में गोवा यात्रा!!!

यह फोटो महज कुछ दिन ही पुरानी है, लेकिन मेरे लिए बहुत अनमोल है। इस फोटो को मैंने लैपटॉप के डेस्कटॉप पर सजा रखा है। जब भी इस फोटो पर नजर जाती है, कुछ पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और ओठों पर मुस्कान तैर जाती है। खास करके गोवा घूमने की घटना याद करके। इस घटना पर जरा रुक कर आता हूं। पहले फोटो का परिचय करा दूं। इस फोटो में बाए मैं हूं और दाएं जयवीर सिंह राणा। बीच में हैं हमारे प्रिय गुरु जी और दिल्ली विश्वविद्यालय के एआरएसडी कॉलेज के प्राचार्य डा ज्ञानतोष झा सर।
जब हमने और जयवीर ने एआरएसडी कॉलेज में दाखिला लिया था उसी साल झा सर असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर आए थे। मुझसे और जयवीर से झा सर का खासा लगाव रहता था। वैसे, सर जयवीर को ज्यादा स्नेह करते थे और आज भी ज्यादा करते हैं। यह सर से शिकायत नहीं है। दरअसल, जयवीर है ही ऐसा कि सब उसे बहुत प्यार करते हैं और सम्मान देते हैं। सरल और निश्छल। आज भी जयवीर उनसे महीने में एक-दो बार मिल ही आता है। पिछले कुछ दिनों से जब भी यह फोटो देखता हूं, जयवीर और अपने साथ के कॉलेज के बिताए दिन याद आ जाते हैं। हमारी कक्षाएं अलग-अलग थीं, लेकिन ज्यदातर समय हम साथ ही रहते। हमारी पक्की वाली जोड़ी हुआ करती थी। बस थोड़ी देर के लिए क्लास अटेंट करने के लिए जुदा होते और क्लास खत्म होते ही फिर अपने अड्डे पर मिल जाते।

अब बात जयवीर के साथ गोवा भ्रमण की करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में दिसंबर में क्रिसमस के अवसर पर 15 दिन की छुट्टियां होती हैं। एक तरह से छात्रों की मौजमस्ती का यह अंतिम महीना होता है। मार्च से परीक्षाएं शुरु हो जाती थीं, लिहाजा जनवरी से लोग इसकी तैयारी में जुट जाते थे। इन छुट्टियों में कॉलेज के कन्सेशन टिकट पर छात्र घूमने जाते। हमारे कुछ साथियों ने गोवा जाने का कार्यक्रम बना लिया। लेकिन किसी कारण से मैं उनके साथ गोवा नहीं जा रहा था। जयवीर को मैं गोवा एक्सप्रेस में सीऑफ करने निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा। ट्रेन चलने से कुछ देर पहले जयवीर कहने लगा, पांडे तू नहीं चलेगा तो मजा नहीं आएगा यार। जयवीर के दिमाग में फौरन एक आइडिया आया उसने कहा, हमारा एक साथी नहीं जा रहा है। उसकी टिकट पर तू चल। जयवीर चलने के लिए जिद करने लगा। पहले तो मैं थोडा असहज हुआ। न तो कपड़े हैं और न ही अन्य जरूरत के सामान। लेकिन दोस्त की बात टाली भी नहीं जा रही थी। ट्रेन के रवाना होने में कुछ ही मिनट बचे थे कि जयवीर ने स्टोशन के ही टेलीफोन बूथ से फौरन बड़े भैया को फोन कर दिया कि अनिल को मैं अपने साथ गोवा ले जा रहा हूं। बड़े भैया भी सकपकाए कि यह क्या मजाक है। खैर, यह जयवीर का स्वभाव है कि वह सबसे अपनी बात मनवा लेता है। भैया को उसने मना लिया कि अनिल को कोई दिक्कत नहीं होगी और गोवा में हम उसके लिए कपड़े खरीद लेंगे। गोवा पहुंचते ही एक टी शर्ट और निक्कर खरीद लिया। बाकी, रोज रात में कपड़े धुलता और सुबह पहन कर घूम आता। रोज एक ही शर्ट और पैंट पहनने वाला मैं गोवावासियों के लिए किसी अजूबे से कम न था। लोग मुझे एक ही कपड़ों की वजह से अच्छे से पहचानने लगे थे। होटल वाले से लेकर पुलिस वाले भी। मेरे जेब में सौ रूपये पड़े थे और इन पैसों के साथ मैं जयवीर के साथ करीब दो हफ्ते गोवा घूम कर आ गया था। खूब मस्ती की... न जाने क्या क्या किया। हमारी देर से आने की आदतों से तंग आ कर एक रात यूथ हॉस्टल के वार्डन ने दरवाजा ही नहीं खोला और हमने समुद्र किनारे एक पार्क में ठिठुरते हुए रात गुजारी। समुद्र किनारे की रात बहुत ही ठंडी होती है और आदमी ठिठुरने लगता है। ठंड से बेहाल हम एक दूसरे के कपड़ों में अपना हाथ मुंह छुपा कर इससे बचने की नाकाम कोशिश करते रहे। जब ठंड असहनीय हो गई तो हमने नारियल और अन्य पेड़ों के पत्ते इकठ्ठा कर सिगरेट पीने वाले एक दोस्त की मदद से उसमें आग लगा कर किसी तरह रात काटी। सुबह यूथ हास्टल पहुंचे तो वार्डन ने हमारा सामान बाहर रखवा दिया था। बाकी दिन रहने के लिए हमें बड़ा संघर्ष करना पड़ा। क्रिसमस के मौके पर गोवा में सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं और होटल मिलना मुस्किल होता है। हमारे एक दोस्त के बड़े भाई पंजाब टूरिज्म में बड़े अधिकारी थे। वे बड़ी मशक्कत के बाद हमें पंजाब टूरिज्म के होटल में एक कमरा दिला पाए। हम करीब 10 जने थे। नहाते-धोते कमरे में और सोते होटल की छत पर खुले आसमान के नीचे।  

जयवीर और हमारी दोस्ती आज भी उसी शिद्दत के साथ बरकरार है। लेकिन उसके बाद हम दोनों कभी साथ घूमने नहीं जा पाए। जयवीर और हम छात्र नेता थे। जयवीर बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का उपाध्यक्ष और अध्यक्ष भी बना। भाजपा युवा मोर्चा का उपाध्यक्ष भी रहा। वर्तमान में दिल्ली प्रदेश भाजपा का सचिव और फिल्म सेंसर बोर्ड का सदस्य है। जयवीर का आरोप है कि मैं उसे राजनीति में ढकेल कर खुद मलाई वाली पत्रकारिता में आ गया। अब राजनीति में हैं तो समाज का काम बहुत करना पड़ता है और इस चक्कर में जनाब अक्कर देर से घर पहुंचते हैं। और जब कभी हमारी भाभी जी देर से आने का उलाहना देते हुए तल्खी से शिकायत करती हैं तो भाईसाहब गाली मुझे देते हैं, ये पांडे साला था जो मुझे राजनीति में ढ़केल गया, नहीं तो मैं किसी कॉलेज में प्रोफेसर होता। यह सच भी है जयवीर पढ़ने में मेधावी था। बाद में वकालत की पढ़ाई भी की। इसमें कोई शक नहीं की जयवीर प्रोफेसर बनना चाहता था और उसमें प्रोफेसर बनने की पूरी संभावना भी थी। लेकिन, जयवीर राजनीति में भी सफल हैं। राजनीति में सफलता किसी नेता के सांसद-विधायक बनने से नहीं मापी जाती, बल्कि उसकी लोकप्रियता से माफी जाती है। अगर जयवीर की लोकप्रियता किसी को देखनी है तो उसे एक दिन उसके साथ घूमना होगा। दिल्ली की राजनीति और सत्ता के गलियारे का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो जयवीर को न जानता हो। वैसे हम लाख कोशिश करें, लेकिन होता वही है तो नियति तय करती है। मुझे पत्रकारिता करनी थी और जयवीर को राजनीति। तुलसीदास भी कह गए हैं, होइहैं सोई जो राम रचि राखा।      



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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।