Sunday, 25 September 2016

राजनीति की बिसात पर अखिलेश और शिवपाल



बात उन दिनों की है जब अखिलेश यादव राजस्थान के धौलपुर के मिलिट्री स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे। तब मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से स्कूल में बुलाया गया था। एक तरह से वे पहली बार अपने बेटे से मिलने स्कूल गए थे। स्कूल का पूरा लाव-लश्कर मुलायम सिंह की आगवानी में लगा हुआ था। मुलायम सिंह का हेलिकॉप्टर स्कूल के मैदान में उतरा तो सीनियर क्लास के बच्चे उनके स्वागत के लिए एक कतार में पंक्तिबद्ध खड़े थे, ताकि मुलायम सिंह बारी-बारी से उनसे मिल सकें। स्कूल के शिक्षक यह देखकर हैरान रह गए कि अखिलेश यादव भी अपने पिता से मिलने के लिए कतार में सावधान की मुद्रा में खड़े हैं। अखिलेश का यह व्यवहार देखकर शिक्षक भावविभोर हो गए और स्कूल के एक स्टॉफ ने इसकी तस्वीर भी कैमरे में कैद कर ली। जबकि अखिलेश को अपने मुख्यमंत्री पिता से मिलने के लिए कतार में खड़े होने की जरूरत नहीं थी। कार्यक्रम के दौरान भी अनुशासन का पालन करते हुए वे अपनी कक्षा के छात्रों के लिए तय नियत स्थान पर ही बैठे रहे। दूसरी घटना उनके आस्ट्रेलिया के अध्ययन के दौरान की है। वे वहां छात्र की हैसियत से एक साधारण घर में किराए पर रहते थे। मुलायम सिंह तब रक्षा मंत्री थे। उन दिनों अमिताभ बच्चन किसी कार्यक्रम में आस्ट्रेलिया गए थे। उस दौरान अखिलेश उनसे मिलने गए और संयोग से अमिताभ के साथ उनकी तस्वीर वहां के अखबारों में प्रकाशित हो गई। इसे देखकर मकान मालिक हैरान। अखिलेश ने जब मकान मालिक को बताया कि उनके पिता भारत के रक्षा मंत्री और अमिताभ अंकल उनके पिता के दोस्त हैं तो उसे यकीन नहीं हुआ। उसकी वजह थी अखिलेश का रसूखदार की बजाए आम आदमी की तरह जीवनयापन करना।

इन दोनों घटनाओं का जिक्र करने का मकसद यह बताना है कि अखिलेश का स्वभाव और सोच मुलायम परिवार के अन्य सदस्यों से बिलकुल जुदा है और यही वर्तमान में लड़ाई की जड़ भी है। अखिलेश की सोच और मुलायम के कुनबे की सोच में जमीन आसमान का अंदर है। अखिलेश की सोच विकासपरक है। वह पर्यावरण और खेल प्रेमी हैं। सबको मान सम्मान देते हैं। शिक्षा को महत्व देते हैं। पुरानी पंरपरा के नेताओं की तरह सेवाभाव उनके स्वभाव में है। मीडिया और खासकर सोशल मीडिया की तमाम रिपोर्टों पर जितना संज्ञान अखिलेश ने लिया है, उतना शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने लिया हो।

जबकि मुलायम का पूरा कुनबा सत्ता के मद में चूर है। इस परिवार पर जातिवाद, भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का आरोप भी खूब लगता रहा है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री बनने के बाद धीरे-धीरे परिवार की अनैतिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश की। इससे परिवार के लोगों और अखिलेश के बीच दुरियां बढ़नी शुरु हुई। मुलायम के गृह जनपद इटावा में यह आम चर्चा है कि अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद सरकारी ठेका टेंडर की बांट में मुलायम के भाई-भतीजों की मनमानी रुकी है। जबकि सपा सरकार के समय इटावा के आसपास के सारे सरकारी ठेका टेंडर मुलायम के भाई-भतीजों के कहने पर ही दिया जाता था। परिवार के लोग इसका रोना भी मुलायम सिंह से रो चुके हैं। परिवार के लोगों की मनमानी पर अखिलेश के हाथ खड़े करने पर मुलायम ने इसका रास्ता निकाला और कहा कि वे लोग उनकों बताएं या फिर शिवपाल को। ऐसा ही पार्टी में भी हुआ और अखिलेश ने पुराने नेताओं पर भी लगाम लगाने का पुरजोर प्रयास किया।    

मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने पार्टी कल्चर में परिवर्तन लाने की भी कोशिश की, जिस पर मुलायम के करीबियों और परिवार के लोगों ने पलीता लगा दिया। सपा नेताओं के संरक्षण में गुंडागर्दी पलती रही। हालांकि अपने स्तर पर अखिलेश ने बहुत हद तक बदलाव भी किया। विकास योजनाओं को प्राथमिकता दी। मायावती के समय जो मुख्यमंत्री निवास भारी तामझाम और सुरक्षा के लिए अभेद्य किले के रूप में जाना जाता था, मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने उसे जनता के लिए खोल दिया। मायावती जनता से जितनी दूर थी, अखिलेश उतना ही करीब। कानून व्यवस्था के मामले में नाकाम रहने के बावजूद अखिलेश अपने आचरण और व्यवहार से जनता के सीएम बने रहे। 

दरअसल, अखिलेश मुख्यमंत्री भले बने लेकिन उनकी अफसरशाही के लोग मुलायम और शिवपाल के करीबी ही रहे। शुरुआत में तो मुलायम के यहां से ही सब कुछ गवर्न होता था। शिवपाल की भी धाक कायम रही। प्रदेश में चार मुख्यमंत्री की भी चर्चा खूब हुई। लेकिन धीरे-धीरे अखिलेश ने नौकरशाही और फैसलों पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरु की। इससे मुलायम के करीबियों की मनमानी पर कुछ हद तक लगाम लगनी शुरु हुई। कुछ को भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्री पद से भी हटाया तो कुछ का पार्टी में कद कम कर दिया। अमर सिंह की पार्टी में वापसी के बाद यह कटुता और बढ़ी है। वे सरकार और नौकरशाही पर दखल रखना चाहते थे। अखिलेश ने इससे साफ इनकार किया। अखिलेश ने उनकी कोई सिफारिश नहीं मानी। यहां तक कि अखिलेश ने कई बार अमर सिंह को मुलाकात का वक्त भी नहीं दिया। इसका इजहार अमरसिंह सार्वजनिक रूप से टीवी इंटरव्यू में कर चुके हैं।
समाजवादी पार्टी में लड़ाई महज अखिलेश बनाम शिवपाल नहीं है, बल्कि यह लड़ाई सत्ता का मलाई चख चुके मुलायम के पुराने करीबियों और अखिलेश से है। 
शिवपाल की महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है। लिहाजा, वे अखिलेश के विरोधियों को हवा देने लगे। धीरे-धीरे अखिलेश के सारे विरोधी शिवपाल के इर्दगिर्द जमा होने लगे और मुलायम के भी कान भरने लगे। अखिलेश के आसपास  युवाओं की एक फौज तैयार हो गई। जिनसे पुराने नेता चिढ़ने लगे। पार्टी में दो ध्रुव बन गए। एक अखिलेश के नेतृत्व में युवा नेताओं का तो दूसरे मुलायम के करीबी पुराने नेताओं का। जिनका नेतृत्व शिवपाल कर रहे हैं। मुलायम सिंह ने पुराने नेताओं की शिकायत पर पार्टी अध्यक्ष के नाते अखिलेश के कई करीबियों को संगठन के पदों से बर्खास्त भी किया। लेकिन बाद में अखिलेश के अड़ने पर उनकी वापसी भी हुई। अखिलेश को जानने वाले बताते हैं कि वे मुलायम सिंह का पिता और राजनीतिक गुरु के रूप में बहुत सम्मान करते हैं। आज भी वे सीएम हाउस की बजाए पिता के साथ ही रहते हैं। उनका कोई कहा टालते नहीं। उनके फैसलों पर अंगुली उठाने की बजाय मन मसोस कर मान लेते हैं। लेकिन धीरे-धीरे वे भ्रष्टाचार और अपराधियों को संरक्षण देने के मामले में कठोर रुख अपनाने लगे। यह मामला अखिलेश की छवि से भी जुड़ा हुआ है। अखिलेश पर चार साल में भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। इसी वजह से उनकी लोकप्रियता भी है। पिछले विधानसभा चुनाव में जब माफिया डॉन डीपी यादव को शिवपाल ने पार्टी में शामिल करवा लिया था तब भी अखिलेश ने कड़ा विरोध किया और मुलायम को डीपी यादव की पार्टी में वापसी को रद्द करना पड़ा। ताजा मामला पूर्वांचल के माफिया डॉन और कौमी एकता दल के अध्यक्ष अफजाल अंसारी का है। शिवपाल ने करीब तीन महीने पहले बगैर अखिलेश की जानकारी के कौमी एकता दल के अध्यक्ष अफजाल अंसारी के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कौमी एकता दल के विलय का औपचारिक ऐलान कर दिया था। शिवपाल ने तब कहा कि अंसारी पहले भी सपा में रह चुके हैं और अब वह अपने घर वापस आ गए हैं। अखिलेश ने न केवल इसका कड़ा विरोध किया, बल्कि एक बार फिर जिद करके इस विलय को निरस्त भी कराया।

साल 2007 में सपा के सत्ता खोने और मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी कमजोर हो गई थी। सपाईयों की गुंडई छवि पर मायावती का सख्त प्रशासन तमाम सर्वे पर भारी पड़ रहा था। सर्वे बता रहे थे कि 2012 में मायावती की फिर से सरकार बन रही है। 2012 के विधानसभा चुनाव में पहले बसपा सपा पर भारी पड़ रही थी। इससे सपा में गहरी निराशा छा गई थी। ऐसे में अखिलेश ने अकेले कमान संभाली और अपने दम पर सपा को बहुमत दिलाया। 2012 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश अपने जुझारूपन, संघर्ष, सहजता और शालीनता की वजह से एक नायक के रूप में उभर कर आए। पहली बार अखिलेश की वजह से उत्तर प्रदेश में सपा को पूर्ण बहुमत मिला। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे पार्टी और सरकार की कार्यशैली में परिवर्तन लाना चाहते थे। लेकिन सपा नेताओं और मुलायम के करीबियों ने उनकी नहीं चलने दी। लेकिन इस बार अखिलेश जिद पर अड़ गए हैं। अब देखना है इस जिद से पार्टी की कार्यशैली में बदलाव आएगा या फिर अखिलेश में।

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।