Saturday, 25 April 2009

आखिर किसने बनाया आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी

उस दिन अखबार की सुर्खियां खून से लथपथ थी. तमाम अखबार चीख चीख कर कह रहे थे, “दिल्ली, अहमदाबाद और उत्तर प्रदेश की अदालतों में सीरियल ब्लास्ट कर तबाही करने वाले आतंकी आजमगढ़ के रहने वाले थे.”… टीवी पर एंकर चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था, “आजमगढ़ है आतंकवाद की नर्सरी....” शाम ढलते-ढलते समाचार चैनलों ने देश भर में हुए तमाम विस्फोटों के तार आजमगढ़ से जोड़ दिए. अचानक उत्तर प्रदेश का यह जिला अंतरऱाष्ट्रीय पटल पर छा जाता है. टीवी देखते-देखते मैं स्मृतियों में खो जाता हूं और आजमगढ़ में बिताए बचपन के दिन सिनेमा की रील तरह आंखों से गुजरने लगते हैं.

मेरा आजमगढ़.... कैफी आजमी और राहुल सांस्कृत्यायन का आजमगढ़... गंगा जमुनी संस्कृति का आजमगढ़... लेकिन मेरा आजमगढ़ तो ऐसा नहीं था, जैसा आज दिखाई दे रहा है. नब्बे के दशक में हमारे राजनेताओं ने अपने चंद स्वार्थों के लिए हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत के जो बीज बोए, 18 साल बाद आज हम उसी की फसल काट रहे हैं. मुझे अपने प्यारे दोस्त साजिद का वह मासूम चेहरा आज भी अच्छी तरह याद है. कैसे मंदिर आंदोलन ने हम दोनों की दोस्ती को अलविदा कर दिया था. दोनों के बीच नफरत के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे मासूम मन तब समझ नहीं पाया था. “राम लला हम आंएगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” के नारों की गूंज ने मेरे सहपाठियों राशिद, सलाउद्दीन, हासिम, फरदीन.... को भी मुझसे दूर कर दिया था. तब मैं दसवी में पढ़ता था. मुझे आज भी याद है साजिद की अम्मी की वे दुलार भरी आंखें... उनके कोमल हाथ, जिसे वे हमारे माथे पर फेर कर लंबी उम्र की दुआएं दिया करती थीं. शाम को स्कूल की छुट्टी हुई नहीं, मैं साजिद के घर पहुंच जाता था. या फिर साजिद मेरे घर आ जाता था. दोनों छत पर घंटों बैठते और सपने बुनते. हमारे सपनों में फौज हुआ करती थी. हम दोनों सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते थे.

लेकिन सपने बुनने का सिलसिला अचानक एक दिन रुक जाता है. तब 15 साल की उम्र में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं हिंदू हूं और साजिद मुसलमान और हिंदू और मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते. साजिद मुझसे मिलने मेरे घर आता है और मेरे घर के लोग उसके साथ न केवल दुर्व्यवहार करते हैं, बल्कि उसे दुबारा कभी घर न आने की हिदायत भी देते हैं. मुझसे कहा जाता है कि साजिद मुसलमान है, इसलिए वह कभी घर नहीं आना चाहिए. मैं चुपके से घरवालों की नजरें बचा कर साजिद से मिलने उसके घर जाता हूं. लेकिन वहा भी वही हालात थे, जो मेरे घर में थे. तब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं द्वारा हमें बताया गया कि मुसलमान इस देश के नहीं हैं. वे आक्रमणकारी हैं. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों, हिंदुओं पर सैकड़ों साल तक जुल्म ढाया है. हमारे मंदिरों को उजाड कर मसजिद बना डाला है. हमें मसजिद को तोड़ कर मंदिर बनाना है. देखते-देखते पूरी फिजा में अशोक सिंघल, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार के आग उगलते भाषण गूंजने लगते हैं. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेता लोगों को कार सेवक बनाने लगे. गांव के जिस मंदिर में कभी दिया नहीं जतला था, उसमें 24 घंटे भजन कीर्तन होने लगा. जिस मसजिद में मौलवी साहब अकेले अजान दिया करते थे, उसमें लाउड स्पीकर के जरिए सैकड़ों अजान की आवाज सुनाई देने लगी. और हां, मसजिद के बाहर शाम की अजान के वक्त मौलवी साहब से अपने बच्चों की नजरे उतरवाने के लिए हिंदू मांओं की जो लंबी कतार लगती थी, वह भी अचानक काफूर हो जाती है. जिन बाबू मियां और फकीरिन चच्ची का हमारे घर खूब आना-जाना हुआ करता था, अचानक वह बंद हो जाता है. तब पहली बार मैने साजिद के चेहरे पर खौफ देखा था...मौत का खौफ. जब मैने गौर किया तो पाया कि यह खौफ तो गांव के सभी मुसलमान बच्चों के चेहरे पर दिखाई दे रहा था. और एक दिन साजिद जब स्कूल के रास्ते में मिला तो उसने मुझसे डरते हुए कहा, “हमें हिंदू लोग मार डालेंगे.”

और इस बीच एक दिन आजमगढ़ से सटे फौजाबाद जिले में स्थित अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा दी गई. कहा गया कि हिंदुओं के माथे पर लगा कलंक मिटा दिया गया है. इस खुशी में मिठाईंयां बांटी जाती हैं. कई जगह दंगे होते हैं. दोनों संप्रदायों के ढेर सारे निर्दोष लोग दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं. गांव और शहर खामोश हो जाते हैं. खैर, कुछ दिन बाद यह खामोशी तो छंट जाती है, लेकिन नफरत का गुबार नहीं. उस समय हिंदू और मुसलमानों में नफरत की जो खाई बनी, वह फिर कभी भर न सकी. बल्कि नई पीढ़ी के बीच वह और चौड़ी होती गई. आजमगढ़ कभी अंडरवर्ल्ड का गढ़ हुआ करता था. कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान यही का रहने वाला था. दाउद के पिता ओर अबू सलेम का घर भी आजमगढ़ ही है. इनके गिरोहों में हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के लोग हुआ करते थे. दाऊद के करीबियों में तो मुसलमानों से ज्यादा संख्या हिंदुओं की थी. लेकिन बाबरी मसजिद के विध्वंस ने अंडरवर्ल्ड को भी दो खेमों में बांट दिया. इससे पहले आजमगढ़ अपराध की धरती थी, लेकिन नफरत की नहीं. 1992 के बाद देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी नफरत की फसल लहलहाने लगी. फर्क सिर्फ इतना था कि यहां अंडरवर्ल्ड के जरिए आईएसआई और दहशदगर्दों ने नफरत करने वाले लोगों के हाथों में हथियार पकड़ा दिया.
करीब 16 साल बाद एक दिन जब मैं साजिद से मिला तो वह बिल्कुल बदल चुका था. उसका बदला रूप देख कर मैं चौक गया. उसके चेहरे की मासूमियत नफरत में तब्दील हो चुकी थी. सेना में भर्ती होकर देश सेवा का सपना संजोने वाला नौजवान जेहादी बनना चाहता है. गुजरे वक्त ने साजिद को जेहाद का समर्थक और ओसामा बिन लादेन का फैन बना दिया था. घंटे भर की मुलाकात के दौरान वह लगातार मुझसे शिकायत करता रहा कि इस मुल्क में अब वह सुरक्षित नहीं है. यह असुरक्षा की भावना आजमगढ़ के नई पीढ़ी के नौजवानों में घर कर गई है. बाबरी मसजिद को गिरते देखने वाली पीढ़ी अब नौजवान हो गई है. अगर ऐसे में कोई आतंकी संगठन या फिर आइएसआई नौजवानों को गुमराह कर दे, तो उन्हें शायद बंदूक उठाते देर न लगे. हो सकता है आतिफ और साजिद के साथ भी ऐसा ही हुआ हो. आज जब आजमगढ़ के बारे में सोचता हूं तो खुद से सवाल करता हूं, “आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी किसने बनाया है?” आतिफ ने या फिर अशोक सिंघल, मुलायम सिंह, इमाम बुखारी और सैयद शहाबुद्दीन ने.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।