Saturday, 25 April 2009
चेक का भी बनाया क्लोन
हर रोज की तरह 26 मार्च को भी अनूप कपूर दुकान खोलने के बाद इंटरनेट के जरिए अपने बैंक का हिसाब किताब देखने में जुट गए. दिल्ली के दिल कहे जाने वाले चांदनी चौक के पेंट व्यवसायी अनूप के कारोबार का लेन-देन चेक से ही होता है. वह हर दिन तीन-चार चेक जारी करते हैं. इसलिए इंटरनेट के जरिए अपने बैंक खाते की नित्य पड़ताल करना उनकी दिनचर्या में शुमार है. कप्यूटर बंद करने के बाद वे खुशनुमा मूड में चाय की चुसक्कियां ले रहे थे, तभी एक फोन ने उनके माथे पर बल डाल दिया. अनूप कपूर द्वारा शालीमार पेंट्स को जारी 40 हजार रूपये के चेक का भुगतान उनके खाते से हो चुका था, लेकिन यह चेक जिस कंपनी के नाम जारी किया गया था, उसके खाते में नहीं पहुंचा था. पहले तो अनूप इसे बैंक की लापरवाही मान रहे थे. लेकिन बैंक जाकर उन्होंने जो कुछ देखा, उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.
आखिर पैसा गया कहां? जो एकांउंटपेयी चेक शालीमार पेट्स लिमिटेड के नाम जारी किया था, वह कैसे करन के नाम से बियरर चेक में तब्दील हो गया? अनूप कपूर से लेकर शालीमार पेंट्स के सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा हैरान! लेकिन थोड़ी देर माथा पच्ची के बाद अनूप को मामला समझ में आ गया. किसी शातिर ने शालीमार पेंट्स को जारी उनके चेक का “क्लोन” तैयार कर खाते से से रकम गायब कर दी. अनूप कपूर द संडे इंडियन से कहते हैं, “जब बैंक मैनेजर ने मुझे चेक दिखाया, तो पहली नजर में तो मैं भी हैरान रह गया. चेक पर मेरे दस्तखत तो असली थे, लेकिन बाकी डिटेल नकली. जब गौर से देखा तो समझ में आ गया कि यह चेक तो नकली है. असली चेक से इसकी तुलना की तो पाया कि इसका रंग हल्का और कागज की मोटाई कहीं ज्यादा थी. फिर मैने नीले पेन से अपना हस्ताक्षर किया था, लेकिन इसमें यह काली स्याही से था.” अनूप अकेले नहीं हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया है, दिल्ली में कई और लोग भी हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर उनके बैंक खाते से रकम छू मंतर कर दी गई है. चेक के क्लोनिंग करने वाले गिरोह के कितने लोग शिकार हो चुके हैं, इसका कुछ पता नहीं, लेकिन इसका भंडाफोड़ तब हुआ जब शालीमार पेट्स लिमिटेड के छह चेक गायब हुए. इनमें से तीन चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया. ये तीनों चेक शालीमार पेंट्स के डीलरों, चांदनी चौक के कपूर पेंट्स एंड केमिकल्स, वजीरपुर के प्रीमियर पेंट्स और मंगोलपुरी के श्रीराम पेंट्स एंड हार्डवेयर के थे. इन लोगों ने ये चेक शालीमेर पेंट्स के नाम जारी किए थे. चौथा मामला रोहणी के सेक्टर-24 के पाकेट 20 के प्लाट नंबर 3-4 में रहने वाले सुशील गर्ग का है. सभी चेक स्टेट बैंक आफ इंडिया के पंजाबी बांग स्थित शाखा से 20 से 23 मार्च, 2009 के बीच ड्राप्स बाक्स से गायब हुए थे. चारो चेक क्लोनिंग के जरिए बियरर बनाकर जारीकर्ता के संबधित बैंक यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा, केनरा बैंक की वजीरपुर शाखा, इलाहाबाद बैंक की मंगोलपुरी शाखा और केनरा बैंक की त्री नगर शाखा से कैश करा लिए गए. ड्राफ्स बाक्स में से शालीमार पेंट्स के तीन और चेक गायब हुए हैं. लेकिन ये उन बैंकों के थे, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. लिहाजा, गिरोह ने इस चेक का इस्तेमाल नहीं किया.
आशंका है कि गिरोह और भी लोगों के चेक का क्लोन तैयार उनके एकाउंट से पैसा गायब कर चुका है. धीरे-धीरे और भी मामले सामने आएंगे. व्यापारियों को लाखों का चूना लगा चुके इस गिरोह के भंडाभोड़ के प्रति पुलिस उदासीन है. शालीमार पेंट्स लिमिटेड के एरिया सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा कहते हैं, “पुलिस और बैंक वाले इस मामले को गंभीरता से लेने की बजाए लीपापोती पर लगे हैं. जो चेक देखने में साफ नकली नजर आ रहा है, बैंक उसे असली साबित करने पर लगा है. नकली चेक पर वाटर मार्क बिलकुल नहीं है. जिससे साफ जाहिर होता है की बैंक ने जिस के जरिए भुगतान किया है वह नकली है. पुलिस और बैंक के लोग तो उल्टे हमें गलत बताकर मामले को वापस लेने का दबाव डाल रहे हैं.”
चारो मामलों में अलग-अलग थानों में शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन पुलिस ने एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की है. सुशील गर्ग ने पत्र भेजकर इसकी शिकायत दिल्ली पुलिस कमिश्नर और इलाके के डीसीपी से भी की है. लेकिन उनके पास यहां से कोई जवाब नहीं आया है. जिस भारतीय स्टेट बैंक की पंजाबीबाग शाखा से चारों चेक गायब हुए हैं, उस इलाके के सब इंसपेक्टर और इस मामले के जांच अधिकारी मनोहर लाल द संडे इंडियन से कहते हैं, “जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज की जाएगी. मैं जांच के लिए स्टेट बैंक गया था लेकिन तब वहां के मैनेजर ने यह कह कर की क्लोजिंग चल रही है इसलिए वे व्यस्त हैं, मिलने से इनकार कर दिया था. मै उन्हें जांच के सिलसिले में मिलने के लिए लिखित नोटिस भी दे कर आया हूं.” इस बारे में जब द संडे इंडियन ने स्टेट बैंक आफ इंडिया की पंजाबीबाग शाखा के प्रबंधक एसबी चोपड़ा से बात की तो उनका कहना था, “मैने अपने स्तर पर जांच करा ली है. हमारे ड्राप बाक्स से चेक गायब नहीं हुआ है. ड्राप बाक्स से चेक निकलने और बैंक में जमा कराने के बीच पूरी पारदर्शिता रखी जाती है. रही बात पुलिस को जांच में सहयोग देने की तो जब पुलिसवाले आए थे तो मैं मिटिंग में था और उनके जाने के बाद मैने खुद इस बारे में एसएचओ से फोन पर बात की है और जांच में पूरा सहयोग देने का वादा किया है.”
चेक का क्लोन तैयार कर रकम हड़पने का यह देश का संभवत: पहला मामला है. द संडे इंडियन ने अपनी पड़ताल में पाया कि इसे देश की राजधानी में बड़े ही शातिर तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. अपराध को अंजाम देने के तरीके से लगता है कि यह गिरोह पूरी तरह से संगठित है और इसमें पढ़े लिखे और कंप्यूटर तकनीक में दक्ष लोग शामिल हैं. गिरोह के लोग बैंक के चेक ड्राप बाक्स से चेक गायब कर देते हैं. उस चेक का कलर स्कैन कर लिया जाता है. इसके बाद कप्यूटर तकनीक का इस्तेमाल कर स्कैन किए हुए चेक से हस्ताक्षर के अलावा बाकी लिखे हुए शब्द इरेज कर दिए जाते हैं. इसके बाद असली चेक में इस्तेमाल होने वाले कागज पर इसका प्रिट आउट निकाल लिया जाता है. फिर इस पर हाथ से नाम और रकम लिख कर बियरर चेक के रूप में उसे बैंक से कैस करा लिया जाता है. यह काम इतनी सफाई से किया जाता है कि इन नकली चेकों को पहचान पाना काफी मुश्किल होता है. द संडे इंडियन के इस संवाददाता ने संबंधित बैंकों में जाकर नकली चेक की पड़ताल की तो महसूस किया कि वाकई इनको पहचानना काफी मुश्किल है. यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा से अनूप कपूर का चेक कैश कराया गया था. इस बैंक के मुख्य शाखा प्रबंधक भी हैरान हैं. 30 साल के करियर में कभी उन्होंने चेक के इस तरह के फर्जीवाड़े के बारे में नहीं सुना. वे नाम न छापने का आग्रह करते हुए द संडे इंडियन को चेक दिखाते हुए कहते हैं, “हमारे हिसाब से तो चेक असली है और हस्ताक्षर मिलाने के बाद ही हमने रकम दी है. लेकिन शिकायकर्ता का कहना है कि यह क्लोनिंग के जरिए तैयार किया गया है. मैं इस संभावना से भी इनकार नहीं कर रहा हूं. अगर ऐसा है तो यह किसी शातिर दिमाग का काम है, जिसने तकनीक का इस्तेमाल कर हूबहू चेक तैयार कर दिया है. पुलिस को इसकी गहराई से जांच करनी चाहिए. मैने भी अपने हेड आफिस को इस बारे में जांच करने के लिए लिखा है.” जिस ड्राप बाक्स से चेक गायब हुए हैं, वह बैंक के बाहर चाहरदीवारी पर टांगा गया था. फिलहाल बैंक ने उसे हटाकर शाखा के अंदर रख दिया है.
गिरोह के लोगों को बैंक के कामकाज की पूरी जानकारी है. आशंका यह भी है कि उन्होंने इंटरनेट के जरिए पासवर्ड आदि हैक कर या किसी कर्मचारी से मिलकर चेक जारी करने वाले लोगों के एकाउंट की डिटेल भी हासिल की है. सुशील गर्ग कहते हैं, “मेरे दो चेक चोरी हुए थे, एक एकाउंट में पांच हजार रूपये थे, कम रकम होने की वजह से उससे पैसा नहीं निकाला गया. दूसरा चेक जो मैने एसबीआई क्रेडिट कार्ड के नाम से 9101.22 रूपये का जारी किया था, उस एकाउंट से 20 हजार रूपये निकाल लिए गए. इस एकाउंट में करीब 22 हजार रूपये थे. इससे लगता है कि चेक चोरों ने पैसा निकालने से पहले मेरा एकाउंट बैलेंस चेक किया था.” इसी तरह से श्रीराम पेंट्स ने 12,012 रूपये का चेक जारी किया था, लेकिन चोरों ने उनके एकाउंट से 40 हजार रूपये निकाले. बियरर चेक द्वारा किसी भी एकाउंट से 50 हजार रूपये से ज्यादा नगद निकालने पर रकम निकालने वाले व्यक्ति को अपना पैन नंबर और परिचय पत्र देना होता है. इसलिए चोरों ने प्रीमियर पेंट्स के एकाउंट से 48 हजार रूपये निकाले. जबिक उन्होंने 90 हजार का चेक जारी किया था. यानी उनके खाते में कङीं ज्यादा पैसे थे. चारो चेक से पैसे एक ही व्यक्ति ने निकाले हैं. सभी बियरर चेक करन के नाम से ही कैस कराए गए हैं. कैशियर के कहने पर करन ने चेक पीछे जो अपना मोबाइल नंबर दिया है वह नई दिल्ली स्थित नागालैंड हाउस के एक सुरक्षाकर्मी का है.
अभी तक नकली नोटों और नकली क्रेडिट कार्ड का मामला ही सामने आया है. लिहाजा, सतर्कता बरतते हुए पुलिस और सरकार ने इसे रोकने के लिए न केवल जागरुकता अभियान चलाया है बल्कि बैंकों के लिए कई तरह की गाइडलाइन भी तैयार की है. सरकार और खासकर रिजर्व बैंक को चेक क्लोनिंग के मामले को भी गंभीरता से लेना चाहिए और इसे रोकने के लिए नकली नोट पकड़ने वाली मशीन की तरह नकली चेक पकड़ने वाली मशीन की व्यवस्था करनी चाहिए. क्रेडिट कार्ड के मुकाबले भारत में चेक प्रचलन कहीं बहुत ज्यादा है. नकली चेक को पहचानने के लिए अगर जल्दी ही कोई कदम नहीं उठाए गए तो, बहुत सारे लोग कंगाल हो जाएंगे.
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About Me
- Anil Pandey
- अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।
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