Saturday, 25 April 2009

बीटी कॉटन की खेती सब लील रही है


उन्नत खेती और पशुपालन के दम पर समृद्धि का प्रतीक बने हरियाणा में पिछले साल भर से यहां के पशुओं में बीमारियां बढ़ रही हैं और राज्य की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली भैसों की मौतों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है. गाय और भैसों की गर्भ धारण क्षमता और दूध की मात्रा भी लगातार कम होती जा रही है. ऐसा क्यों हो रहा है, सरकार इससे बेपरवाह है. लेकिन किसानों को अब इसकी वजह समझ में आने लगी है. वे मानने लगे हैं कि बीटी काटन की खल और बीज खिलाने से ही उनके पशुओं में बीमारियां और मौते हो रही हैं. उनकी गर्भ धारण क्षमता प्रभावित हो रही है. इतना ही नहीं, बीटी काटन की खेती से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव अब हरियाणा में साफ तौर पर दिखने लगा है. बीटी काटन की खेती में काम करने वाले किसान और मजदूर बड़े पैमाने पर खुजली जैसी बीमारी के शिकार हो रहे हैं.
हरियाणा के विभिन्न जिलों में घूम कर जो खोजबीन की उससे पता चला कि बीटी काटन के खेतों में काम करने वाले किसानों में यह बीमारी आम है. अगर सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो यह महामारी का भी रूप ले सकती है. जीन में परिवर्तन कर तैयार किए खाद्यानों व सब्जियों की खेती से पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर दुनियाभर में बहस चल रही है. बीटी काटन पारंपरिक काटन के बीज में बायो तकनीक के जरिए बैसिलस थूरीनजैनसिस (बीटी) नामक वायरस का जीन डालकर बनाया जाता है. बीटी वायरस एक खास तरह का जहर पैदा करता है, जिससे कपास को नुसकसान पहुंचाने वाले कीडे अमेरिकन शुंडी की मौत हो जाती है. बीटी काटन की खासियत यह होती है कि इससे पैदा हुए बीज का इस्तेमाल अगर किसान करता है तो इससे उसकी पैदावार प्रभावित होती है. इसलिए उसे हर बार कंपनी से नया बीज ही लेना पड़ेगा. इससे बीटी काटन बीज बनाने वाली कंपनियों को भारी मुनाफा होता है. कृषि विशेषज्ञ और किसान बचाओ आंदोलन के संयोजक डा. सुधीर कौड़ा कहते हैं, “अध्ययननों से पता चला है कि जैव तकनीक से तैयार बीटी काटन में सायनाइट जैसा जहरीला व विषाक्त पदार्थ होता है. अगर इसके पौधे या बीज को पशु खाता है तो यह जहर उसमें प्रवेश कर जाता है. इससे पशु गंभीर बीमारी व मौत का शिकार हो सकता है. हरियाणा में यह बड़े पैमाने पर दिखाई दे रहा है. दूध और घी के जरिए यह जहर मनुष्य में भी प्रवेश कर सकता है. जिसका भयानक दुष्परिणाम हो सकता है.” हरियाणा का घी और मख्खन तो दूसरे राज्यों में भी भेजा जाता है. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो इसका असर व्यापक होगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है. यहां का किसान एक भैंस के दूध से अमूनन पांच से छह हजार रूपये महीना कमा लेता है.

हिसार से करीब 20 किमी दूर धानसू गांव के लोग दो साल से बीटी काटन की खेती करते हैं. हमारी मुलाकात यहां बीटी काटन की खेती करने वाले ओम प्रकाश से होती है. ओम प्रकाश का पूरा परिवार खुजली से पीड़ित है. ओम प्रकाश कहते हैं, “इस साल गांव के बहुत सारे लोगों को खुजली हुई है. कुत्ते और भेंसे भी इस बीमारी से पीड़ित हैं.” द संडे इंडियन ने गांव में जाकर सर्वे किया तो तमाम लोग और उनके पशु खुजली के बीमारी से पीड़ित थे. वहीं हमें कई ऐसे भी लोग मिले जिनके पशुओं की मौत हो गई थी. जाबर सिंह कहते हैं, “पिछले छह महीने में गांव में पचास से ज्यादा भैसों की मौत हुई है. साथ ही अब भैसे ब्याने में भी काफी समय लेने लगी हैं.” गांव के रिटायर मेजर आरपी बाना को भी गांव में पिछले साल भर से काफी बदलाव नजर आ रहा है. वे कहते हैं, “गांव के ज्यादातर लोग खुजली की बीमारी से पीड़ित हैं. भैसों में बांझपन बढ़ रहा है, या फिर वे देर से ब्या रही हैं. पशुओं में बीमारी भी और मौतें भी बढ़ रही हैं. मैने गांव वालों से सुना है कि यह सब बीटी के खल और बिनौले खिलाने से हो रहा है. गांव की इंदों की भैस की की चार दिन पहले ही मौत हुई थी. भैस की कीमत 33 हजार रूपये थी. वे कहती हैं, “हम अपनी भैस को सुबह-शाम मिला कर चार किलो बिनौला की खल खिलाते थे. वह ठीक थी. अचानक एक दिन वह शाम को वह दम तोड़ देती है.” हिसार जिले के ही तलवंडी राना गांव के चांदी राम की चार भैसे जब एक साथ मर गई तो उन्होंने पशुओं को विनौला और उसका खल खिलाना बंद कर दिया. वे कहते हैं, “बिनौले की खल से अब डर लगने लगा है. इसकी वजह से मेरी भैसों का देर से गर्भ ठहरता था या फिर कई गर्भपात हो जाता था. लिहाजा, अब मैं अपने पशुओं को गेहूं और बाजरा खिलाना शुरु कर दिया है.”

यहां के बाद हम हिसार के दूसरे छोर पर स्थित गांव सदलपुर पहुंचते हैं. यहां हमारी मुलाकात हनुमान प्रसाद से होती है. बजुर्ग हनुमान प्रसाद ने भी अनुभव किया की बिनौला और उसका खल खिलाने से पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. वे अपनी भैंस और उसके बच्चे को दिखाते हुए कहते हैं, “उनकी भैस ने तय समय से एक महीने पहले ही बच्चे जन्म दिया. इससे बच्चा छोटा और कमजोर पैदा हुआ है.” वे आगे कहते हैं, “हाल ही में मेरी जानकारी में कई लोगों की भैंसों ने समय से पहले बच्चा जन्मा है. दरअसल, लोग इस बात को छिपाते हैं क्योंकि इससे भैस की कीमत घट जाती है.” हनुमान प्रसाद हमें बनवारी के पास लेकर जाते हैं जिसकी हफ्ते भर पहले ही बीमारी से भैस मरी है. बनवारी कहते हैं, “एक और बीमारी यहां देखने को मिल रही है कई भैसों का शरीर (बच्चेदानी) बाहर निकल आता है. इससे भी कई बार पशु की मौत हो जाती है.”

बीटी काटन के अपने खेतों में चुगाई कर रही फतेहाबाद जिले के बड़ोपड़ गांव की कृष्णा भी खुजली की शिकार हैं और हमें बताती हैं कि उनके गांवों में भी बीमारी की वजह से हाल ही में कई लोगों की भैंसे मरी हैं. हम जिन गांवों में जाते हैं तकरीबन हर जगह हमें खुजली और भैसों के बीमारी की बात पता चलती. बड़ोया गांव की सतपाल, निर्मला और सुनीता खुजली के धब्बों को हमें दिखाती हैं. तो सुनीता हाल ही में मरी अपनी भैंस को याद कर गमगीन हैं. सुनीता बताती हैं कि भैंस की बीमारी पर उन्होंने हजारों रूपये खर्च कर दिए. वे कहती हैं, “पहले सरकारी डाक्टर से इलाज कराते थे, वह 70 रूपये फीस लेता था. जब आराम नहीं हुआ तो प्राइवेट डाक्टर को बुलाया वह 150 रूपये फीस लेता था. दवा का खर्च अलग था.” जाहिर है भैस की बीमारी का फायदा उठा कर सरकारी व निजी पशु चिकित्सक भी अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं. सतपाल कहते हैं, “इस बार भैसें बहुत बीमार हो रही हैं.” धानियां गांव के रणबीर की भी यही शिकायत है कि उनकी भैस भी अचानक मर गई. उसे उन्होंने 32 हजार में खरीदी थी. वे कहते हैं, “मेरी जानकारी में गांव में 10 दिन में पांच लोगों की भैंसे मरी हैं.”

सिरसा जिले के थेड़ी बाबा सावंतसिंह गांव के रहने वाले एनआरआई हरपाल सिंह ग्रेवाल बड़े किसान और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल कहते हैं, “मै एक चैरिटेबल अस्पताल से जुड़ा हुआ हूं, इस अस्पताल के रिकार्ड बताते हैं कि यहां इस साल खुजली के मरीजों की संख्या भयानक रूप से बढ़ी है. ये वे लोग हैं जो बीटी काटन के खेतों में काम करते हैं.” वे अपने इलाके में पशुओं की बीमारी और उनकी मौतों को भी स्वीकार करते हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल हमें अपने साथ कोटली गांव ले जाते हैं. करीब सात हजार आबादी वाला यह गांव बीटी काटन के मजदूरों के गांव के रूप में जाना जाता है. गांव के मजदूर गुजरात तक काटन चुनने जाते हैं. गांव में मेड़िकल स्टोर चलाने वाले पवन तनेजा कहते हैं, “गांव के तकरीबन हर मजदूर खुजली की बीमारी से ग्रस्त है. हर रोज दो तीन मजदूर उनके पास दवाई लेने आ ही जाता है.”

बीटी काटन की खेती का जैसा दुष्परिणाम हरियाणा में दिखना शुरु हुआ है, वह आंध्र प्रदेश में पहले ही दिख चुका है. करीब साल भर पहले आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में बीटी काटन के बीज और खल कान से सैकड़ों भेड़ों की मौत हो गई थी. तब आंध्र प्रदेश सरकार के पशुपालन विभाग ने इसकी जांच कराई तो पौधे में साइनाट की मात्रा पाए जाने पर किसानों को बीटी काटन के पोंधों और बीज व खल से अपने पशुओं को दुर रखने की हिदायत दी. लेकिन बाद में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी जांच में आंध्र सरकार की रिपोर्ट को गलत करार कर बीटी काटन के बीज और खल को पशुओं के लिए हानि रहित बताया. प्रर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर कई वैज्ञानिकों ने सवाल भी उठाया है. देश के जानेमाने वैज्ञानिक और सेंटर फार सेलुलर और मोलेक्यूलर बाइलोजी के पूर्व फाउंडर डायरेक्टर प्रो. पी. एम भार्गव ने पर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर सवाल उठाते हुए बीटी काटन के दुष्परिणामों से सरकार को चेताया भी है.

हमने जब राज्य में पशुओं की तेजी से हो रही मौतों और बढ़ते खुजली की बीमारी के बारे में हरियाणा सरकार के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. हरियाणा के पशुपाल व डेरी विभाग के महानिदेशक डा. एस. के डांगी ने कहा, “हरियाणा में पशुओं में न कोई बीमारी फैली है और नहीं उनकी किसी बीमारी से मौत हो रही है.” जबकि हरियाणा स्वास्थ सेवा के महानिदेशक डा. अविनाश शर्मा का कहना था, “आप के फोन आने से पहले मैं जिले के चिकित्सा अधिकारियों से विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग कर रहा था, उन्होंने मुझे ऐसी किसी बीमारी के बारे में तो नहीं बताया.” वहीं जब हमने हिसार स्थित केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के पशु पोषाहार विभाग (एनीमल न्यूट्रीशियन डीवीजन) के अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. टी. आर चौहान से बीटी काटन की खल और बीज का पशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “पशु आहार में 35 फीसदी से ज्यादा खल नहीं होनी चाहिए. इसमें भी बिनौले की खल की मात्रा 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. जरूरत से अधिक मात्रा में अगर कोई चीज अगर खिलाई जाएगी, उसके नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं.” सरकार भले इनकार करे लेकिन स्वामी रामदेव के गुरु आचार्य बलदेव ने जिंद स्थित आर्स महाविद्यालय गुरुकुल गोशाला में बीटी काटन के बीज और खल के असर का प्रयोग किया और नतीजा काफी खतरनाक निकला. गोशाला के प्रबंधक आचार्य धर्म देव कहते हैं, “जब हमने कुछ महीने तक गायों को बीटी कायन के बीज और खल खिलाए तो उन्होंन दूध देना कम कर दिया और उनमें से कई बीमार हो गईं. लेकिन जब हमने इसे बंद कर दिया तो न केवल उनका दूध बढ़ा बल्कि वे पहले से चुस्त रहने लगीं.”
खैर, यह तो वैज्ञानिक जांच के बाद ही पता चलेगा कि आखिर पशुओं की बीमारी व मौत और खुजली की वजह बीटी काटन है या कुछ और. लेकिन यह तय है कि अगर इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो पशुपालन पर आधारित हरियाणा की अर्थ व्यवस्था चौपट हो सकती है और हरियाणा में प्रचलित यह जुमला “जिसके घर में काली (भैंस), उसके घर में सदा दिवाली” अपना अर्थ खो देगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।