Saturday, 25 April 2009

चेक का भी बनाया क्लोन


हर रोज की तरह 26 मार्च को भी अनूप कपूर दुकान खोलने के बाद इंटरनेट के जरिए अपने बैंक का हिसाब किताब देखने में जुट गए. दिल्ली के दिल कहे जाने वाले चांदनी चौक के पेंट व्यवसायी अनूप के कारोबार का लेन-देन चेक से ही होता है. वह हर दिन तीन-चार चेक जारी करते हैं. इसलिए इंटरनेट के जरिए अपने बैंक खाते की नित्य पड़ताल करना उनकी दिनचर्या में शुमार है. कप्यूटर बंद करने के बाद वे खुशनुमा मूड में चाय की चुसक्कियां ले रहे थे, तभी एक फोन ने उनके माथे पर बल डाल दिया. अनूप कपूर द्वारा शालीमार पेंट्स को जारी 40 हजार रूपये के चेक का भुगतान उनके खाते से हो चुका था, लेकिन यह चेक जिस कंपनी के नाम जारी किया गया था, उसके खाते में नहीं पहुंचा था. पहले तो अनूप इसे बैंक की लापरवाही मान रहे थे. लेकिन बैंक जाकर उन्होंने जो कुछ देखा, उससे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.

आखिर पैसा गया कहां? जो एकांउंटपेयी चेक शालीमार पेट्स लिमिटेड के नाम जारी किया था, वह कैसे करन के नाम से बियरर चेक में तब्दील हो गया? अनूप कपूर से लेकर शालीमार पेंट्स के सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा हैरान! लेकिन थोड़ी देर माथा पच्ची के बाद अनूप को मामला समझ में आ गया. किसी शातिर ने शालीमार पेंट्स को जारी उनके चेक का “क्लोन” तैयार कर खाते से से रकम गायब कर दी. अनूप कपूर द संडे इंडियन से कहते हैं, “जब बैंक मैनेजर ने मुझे चेक दिखाया, तो पहली नजर में तो मैं भी हैरान रह गया. चेक पर मेरे दस्तखत तो असली थे, लेकिन बाकी डिटेल नकली. जब गौर से देखा तो समझ में आ गया कि यह चेक तो नकली है. असली चेक से इसकी तुलना की तो पाया कि इसका रंग हल्का और कागज की मोटाई कहीं ज्यादा थी. फिर मैने नीले पेन से अपना हस्ताक्षर किया था, लेकिन इसमें यह काली स्याही से था.” अनूप अकेले नहीं हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया है, दिल्ली में कई और लोग भी हैं जिनके चेक का क्लोन तैयार कर उनके बैंक खाते से रकम छू मंतर कर दी गई है. चेक के क्लोनिंग करने वाले गिरोह के कितने लोग शिकार हो चुके हैं, इसका कुछ पता नहीं, लेकिन इसका भंडाफोड़ तब हुआ जब शालीमार पेट्स लिमिटेड के छह चेक गायब हुए. इनमें से तीन चेक का क्लोन तैयार कर पैसा निकाल लिया गया. ये तीनों चेक शालीमार पेंट्स के डीलरों, चांदनी चौक के कपूर पेंट्स एंड केमिकल्स, वजीरपुर के प्रीमियर पेंट्स और मंगोलपुरी के श्रीराम पेंट्स एंड हार्डवेयर के थे. इन लोगों ने ये चेक शालीमेर पेंट्स के नाम जारी किए थे. चौथा मामला रोहणी के सेक्टर-24 के पाकेट 20 के प्लाट नंबर 3-4 में रहने वाले सुशील गर्ग का है. सभी चेक स्टेट बैंक आफ इंडिया के पंजाबी बांग स्थित शाखा से 20 से 23 मार्च, 2009 के बीच ड्राप्स बाक्स से गायब हुए थे. चारो चेक क्लोनिंग के जरिए बियरर बनाकर जारीकर्ता के संबधित बैंक यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा, केनरा बैंक की वजीरपुर शाखा, इलाहाबाद बैंक की मंगोलपुरी शाखा और केनरा बैंक की त्री नगर शाखा से कैश करा लिए गए. ड्राफ्स बाक्स में से शालीमार पेंट्स के तीन और चेक गायब हुए हैं. लेकिन ये उन बैंकों के थे, जहां सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. लिहाजा, गिरोह ने इस चेक का इस्तेमाल नहीं किया.

आशंका है कि गिरोह और भी लोगों के चेक का क्लोन तैयार उनके एकाउंट से पैसा गायब कर चुका है. धीरे-धीरे और भी मामले सामने आएंगे. व्यापारियों को लाखों का चूना लगा चुके इस गिरोह के भंडाभोड़ के प्रति पुलिस उदासीन है. शालीमार पेंट्स लिमिटेड के एरिया सेल्स मैनेजर मनोज वर्मा कहते हैं, “पुलिस और बैंक वाले इस मामले को गंभीरता से लेने की बजाए लीपापोती पर लगे हैं. जो चेक देखने में साफ नकली नजर आ रहा है, बैंक उसे असली साबित करने पर लगा है. नकली चेक पर वाटर मार्क बिलकुल नहीं है. जिससे साफ जाहिर होता है की बैंक ने जिस के जरिए भुगतान किया है वह नकली है. पुलिस और बैंक के लोग तो उल्टे हमें गलत बताकर मामले को वापस लेने का दबाव डाल रहे हैं.”
चारो मामलों में अलग-अलग थानों में शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन पुलिस ने एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज नहीं की है. सुशील गर्ग ने पत्र भेजकर इसकी शिकायत दिल्ली पुलिस कमिश्नर और इलाके के डीसीपी से भी की है. लेकिन उनके पास यहां से कोई जवाब नहीं आया है. जिस भारतीय स्टेट बैंक की पंजाबीबाग शाखा से चारों चेक गायब हुए हैं, उस इलाके के सब इंसपेक्टर और इस मामले के जांच अधिकारी मनोहर लाल द संडे इंडियन से कहते हैं, “जांच के बाद ही एफआईआर दर्ज की जाएगी. मैं जांच के लिए स्टेट बैंक गया था लेकिन तब वहां के मैनेजर ने यह कह कर की क्लोजिंग चल रही है इसलिए वे व्यस्त हैं, मिलने से इनकार कर दिया था. मै उन्हें जांच के सिलसिले में मिलने के लिए लिखित नोटिस भी दे कर आया हूं.” इस बारे में जब द संडे इंडियन ने स्टेट बैंक आफ इंडिया की पंजाबीबाग शाखा के प्रबंधक एसबी चोपड़ा से बात की तो उनका कहना था, “मैने अपने स्तर पर जांच करा ली है. हमारे ड्राप बाक्स से चेक गायब नहीं हुआ है. ड्राप बाक्स से चेक निकलने और बैंक में जमा कराने के बीच पूरी पारदर्शिता रखी जाती है. रही बात पुलिस को जांच में सहयोग देने की तो जब पुलिसवाले आए थे तो मैं मिटिंग में था और उनके जाने के बाद मैने खुद इस बारे में एसएचओ से फोन पर बात की है और जांच में पूरा सहयोग देने का वादा किया है.”


चेक का क्लोन तैयार कर रकम हड़पने का यह देश का संभवत: पहला मामला है. द संडे इंडियन ने अपनी पड़ताल में पाया कि इसे देश की राजधानी में बड़े ही शातिर तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. अपराध को अंजाम देने के तरीके से लगता है कि यह गिरोह पूरी तरह से संगठित है और इसमें पढ़े लिखे और कंप्यूटर तकनीक में दक्ष लोग शामिल हैं. गिरोह के लोग बैंक के चेक ड्राप बाक्स से चेक गायब कर देते हैं. उस चेक का कलर स्कैन कर लिया जाता है. इसके बाद कप्यूटर तकनीक का इस्तेमाल कर स्कैन किए हुए चेक से हस्ताक्षर के अलावा बाकी लिखे हुए शब्द इरेज कर दिए जाते हैं. इसके बाद असली चेक में इस्तेमाल होने वाले कागज पर इसका प्रिट आउट निकाल लिया जाता है. फिर इस पर हाथ से नाम और रकम लिख कर बियरर चेक के रूप में उसे बैंक से कैस करा लिया जाता है. यह काम इतनी सफाई से किया जाता है कि इन नकली चेकों को पहचान पाना काफी मुश्किल होता है. द संडे इंडियन के इस संवाददाता ने संबंधित बैंकों में जाकर नकली चेक की पड़ताल की तो महसूस किया कि वाकई इनको पहचानना काफी मुश्किल है. यूनियन बैंक आफ इंडिया की चांदनी चौक शाखा से अनूप कपूर का चेक कैश कराया गया था. इस बैंक के मुख्य शाखा प्रबंधक भी हैरान हैं. 30 साल के करियर में कभी उन्होंने चेक के इस तरह के फर्जीवाड़े के बारे में नहीं सुना. वे नाम न छापने का आग्रह करते हुए द संडे इंडियन को चेक दिखाते हुए कहते हैं, “हमारे हिसाब से तो चेक असली है और हस्ताक्षर मिलाने के बाद ही हमने रकम दी है. लेकिन शिकायकर्ता का कहना है कि यह क्लोनिंग के जरिए तैयार किया गया है. मैं इस संभावना से भी इनकार नहीं कर रहा हूं. अगर ऐसा है तो यह किसी शातिर दिमाग का काम है, जिसने तकनीक का इस्तेमाल कर हूबहू चेक तैयार कर दिया है. पुलिस को इसकी गहराई से जांच करनी चाहिए. मैने भी अपने हेड आफिस को इस बारे में जांच करने के लिए लिखा है.” जिस ड्राप बाक्स से चेक गायब हुए हैं, वह बैंक के बाहर चाहरदीवारी पर टांगा गया था. फिलहाल बैंक ने उसे हटाकर शाखा के अंदर रख दिया है.
गिरोह के लोगों को बैंक के कामकाज की पूरी जानकारी है. आशंका यह भी है कि उन्होंने इंटरनेट के जरिए पासवर्ड आदि हैक कर या किसी कर्मचारी से मिलकर चेक जारी करने वाले लोगों के एकाउंट की डिटेल भी हासिल की है. सुशील गर्ग कहते हैं, “मेरे दो चेक चोरी हुए थे, एक एकाउंट में पांच हजार रूपये थे, कम रकम होने की वजह से उससे पैसा नहीं निकाला गया. दूसरा चेक जो मैने एसबीआई क्रेडिट कार्ड के नाम से 9101.22 रूपये का जारी किया था, उस एकाउंट से 20 हजार रूपये निकाल लिए गए. इस एकाउंट में करीब 22 हजार रूपये थे. इससे लगता है कि चेक चोरों ने पैसा निकालने से पहले मेरा एकाउंट बैलेंस चेक किया था.” इसी तरह से श्रीराम पेंट्स ने 12,012 रूपये का चेक जारी किया था, लेकिन चोरों ने उनके एकाउंट से 40 हजार रूपये निकाले. बियरर चेक द्वारा किसी भी एकाउंट से 50 हजार रूपये से ज्यादा नगद निकालने पर रकम निकालने वाले व्यक्ति को अपना पैन नंबर और परिचय पत्र देना होता है. इसलिए चोरों ने प्रीमियर पेंट्स के एकाउंट से 48 हजार रूपये निकाले. जबिक उन्होंने 90 हजार का चेक जारी किया था. यानी उनके खाते में कङीं ज्यादा पैसे थे. चारो चेक से पैसे एक ही व्यक्ति ने निकाले हैं. सभी बियरर चेक करन के नाम से ही कैस कराए गए हैं. कैशियर के कहने पर करन ने चेक पीछे जो अपना मोबाइल नंबर दिया है वह नई दिल्ली स्थित नागालैंड हाउस के एक सुरक्षाकर्मी का है.

अभी तक नकली नोटों और नकली क्रेडिट कार्ड का मामला ही सामने आया है. लिहाजा, सतर्कता बरतते हुए पुलिस और सरकार ने इसे रोकने के लिए न केवल जागरुकता अभियान चलाया है बल्कि बैंकों के लिए कई तरह की गाइडलाइन भी तैयार की है. सरकार और खासकर रिजर्व बैंक को चेक क्लोनिंग के मामले को भी गंभीरता से लेना चाहिए और इसे रोकने के लिए नकली नोट पकड़ने वाली मशीन की तरह नकली चेक पकड़ने वाली मशीन की व्यवस्था करनी चाहिए. क्रेडिट कार्ड के मुकाबले भारत में चेक प्रचलन कहीं बहुत ज्यादा है. नकली चेक को पहचानने के लिए अगर जल्दी ही कोई कदम नहीं उठाए गए तो, बहुत सारे लोग कंगाल हो जाएंगे.

बीटी कॉटन की खेती सब लील रही है


उन्नत खेती और पशुपालन के दम पर समृद्धि का प्रतीक बने हरियाणा में पिछले साल भर से यहां के पशुओं में बीमारियां बढ़ रही हैं और राज्य की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली भैसों की मौतों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है. गाय और भैसों की गर्भ धारण क्षमता और दूध की मात्रा भी लगातार कम होती जा रही है. ऐसा क्यों हो रहा है, सरकार इससे बेपरवाह है. लेकिन किसानों को अब इसकी वजह समझ में आने लगी है. वे मानने लगे हैं कि बीटी काटन की खल और बीज खिलाने से ही उनके पशुओं में बीमारियां और मौते हो रही हैं. उनकी गर्भ धारण क्षमता प्रभावित हो रही है. इतना ही नहीं, बीटी काटन की खेती से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव अब हरियाणा में साफ तौर पर दिखने लगा है. बीटी काटन की खेती में काम करने वाले किसान और मजदूर बड़े पैमाने पर खुजली जैसी बीमारी के शिकार हो रहे हैं.
हरियाणा के विभिन्न जिलों में घूम कर जो खोजबीन की उससे पता चला कि बीटी काटन के खेतों में काम करने वाले किसानों में यह बीमारी आम है. अगर सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो यह महामारी का भी रूप ले सकती है. जीन में परिवर्तन कर तैयार किए खाद्यानों व सब्जियों की खेती से पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर दुनियाभर में बहस चल रही है. बीटी काटन पारंपरिक काटन के बीज में बायो तकनीक के जरिए बैसिलस थूरीनजैनसिस (बीटी) नामक वायरस का जीन डालकर बनाया जाता है. बीटी वायरस एक खास तरह का जहर पैदा करता है, जिससे कपास को नुसकसान पहुंचाने वाले कीडे अमेरिकन शुंडी की मौत हो जाती है. बीटी काटन की खासियत यह होती है कि इससे पैदा हुए बीज का इस्तेमाल अगर किसान करता है तो इससे उसकी पैदावार प्रभावित होती है. इसलिए उसे हर बार कंपनी से नया बीज ही लेना पड़ेगा. इससे बीटी काटन बीज बनाने वाली कंपनियों को भारी मुनाफा होता है. कृषि विशेषज्ञ और किसान बचाओ आंदोलन के संयोजक डा. सुधीर कौड़ा कहते हैं, “अध्ययननों से पता चला है कि जैव तकनीक से तैयार बीटी काटन में सायनाइट जैसा जहरीला व विषाक्त पदार्थ होता है. अगर इसके पौधे या बीज को पशु खाता है तो यह जहर उसमें प्रवेश कर जाता है. इससे पशु गंभीर बीमारी व मौत का शिकार हो सकता है. हरियाणा में यह बड़े पैमाने पर दिखाई दे रहा है. दूध और घी के जरिए यह जहर मनुष्य में भी प्रवेश कर सकता है. जिसका भयानक दुष्परिणाम हो सकता है.” हरियाणा का घी और मख्खन तो दूसरे राज्यों में भी भेजा जाता है. जाहिर है अगर ऐसा हुआ तो इसका असर व्यापक होगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है. यहां का किसान एक भैंस के दूध से अमूनन पांच से छह हजार रूपये महीना कमा लेता है.

हिसार से करीब 20 किमी दूर धानसू गांव के लोग दो साल से बीटी काटन की खेती करते हैं. हमारी मुलाकात यहां बीटी काटन की खेती करने वाले ओम प्रकाश से होती है. ओम प्रकाश का पूरा परिवार खुजली से पीड़ित है. ओम प्रकाश कहते हैं, “इस साल गांव के बहुत सारे लोगों को खुजली हुई है. कुत्ते और भेंसे भी इस बीमारी से पीड़ित हैं.” द संडे इंडियन ने गांव में जाकर सर्वे किया तो तमाम लोग और उनके पशु खुजली के बीमारी से पीड़ित थे. वहीं हमें कई ऐसे भी लोग मिले जिनके पशुओं की मौत हो गई थी. जाबर सिंह कहते हैं, “पिछले छह महीने में गांव में पचास से ज्यादा भैसों की मौत हुई है. साथ ही अब भैसे ब्याने में भी काफी समय लेने लगी हैं.” गांव के रिटायर मेजर आरपी बाना को भी गांव में पिछले साल भर से काफी बदलाव नजर आ रहा है. वे कहते हैं, “गांव के ज्यादातर लोग खुजली की बीमारी से पीड़ित हैं. भैसों में बांझपन बढ़ रहा है, या फिर वे देर से ब्या रही हैं. पशुओं में बीमारी भी और मौतें भी बढ़ रही हैं. मैने गांव वालों से सुना है कि यह सब बीटी के खल और बिनौले खिलाने से हो रहा है. गांव की इंदों की भैस की की चार दिन पहले ही मौत हुई थी. भैस की कीमत 33 हजार रूपये थी. वे कहती हैं, “हम अपनी भैस को सुबह-शाम मिला कर चार किलो बिनौला की खल खिलाते थे. वह ठीक थी. अचानक एक दिन वह शाम को वह दम तोड़ देती है.” हिसार जिले के ही तलवंडी राना गांव के चांदी राम की चार भैसे जब एक साथ मर गई तो उन्होंने पशुओं को विनौला और उसका खल खिलाना बंद कर दिया. वे कहते हैं, “बिनौले की खल से अब डर लगने लगा है. इसकी वजह से मेरी भैसों का देर से गर्भ ठहरता था या फिर कई गर्भपात हो जाता था. लिहाजा, अब मैं अपने पशुओं को गेहूं और बाजरा खिलाना शुरु कर दिया है.”

यहां के बाद हम हिसार के दूसरे छोर पर स्थित गांव सदलपुर पहुंचते हैं. यहां हमारी मुलाकात हनुमान प्रसाद से होती है. बजुर्ग हनुमान प्रसाद ने भी अनुभव किया की बिनौला और उसका खल खिलाने से पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. वे अपनी भैंस और उसके बच्चे को दिखाते हुए कहते हैं, “उनकी भैस ने तय समय से एक महीने पहले ही बच्चे जन्म दिया. इससे बच्चा छोटा और कमजोर पैदा हुआ है.” वे आगे कहते हैं, “हाल ही में मेरी जानकारी में कई लोगों की भैंसों ने समय से पहले बच्चा जन्मा है. दरअसल, लोग इस बात को छिपाते हैं क्योंकि इससे भैस की कीमत घट जाती है.” हनुमान प्रसाद हमें बनवारी के पास लेकर जाते हैं जिसकी हफ्ते भर पहले ही बीमारी से भैस मरी है. बनवारी कहते हैं, “एक और बीमारी यहां देखने को मिल रही है कई भैसों का शरीर (बच्चेदानी) बाहर निकल आता है. इससे भी कई बार पशु की मौत हो जाती है.”

बीटी काटन के अपने खेतों में चुगाई कर रही फतेहाबाद जिले के बड़ोपड़ गांव की कृष्णा भी खुजली की शिकार हैं और हमें बताती हैं कि उनके गांवों में भी बीमारी की वजह से हाल ही में कई लोगों की भैंसे मरी हैं. हम जिन गांवों में जाते हैं तकरीबन हर जगह हमें खुजली और भैसों के बीमारी की बात पता चलती. बड़ोया गांव की सतपाल, निर्मला और सुनीता खुजली के धब्बों को हमें दिखाती हैं. तो सुनीता हाल ही में मरी अपनी भैंस को याद कर गमगीन हैं. सुनीता बताती हैं कि भैंस की बीमारी पर उन्होंने हजारों रूपये खर्च कर दिए. वे कहती हैं, “पहले सरकारी डाक्टर से इलाज कराते थे, वह 70 रूपये फीस लेता था. जब आराम नहीं हुआ तो प्राइवेट डाक्टर को बुलाया वह 150 रूपये फीस लेता था. दवा का खर्च अलग था.” जाहिर है भैस की बीमारी का फायदा उठा कर सरकारी व निजी पशु चिकित्सक भी अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं. सतपाल कहते हैं, “इस बार भैसें बहुत बीमार हो रही हैं.” धानियां गांव के रणबीर की भी यही शिकायत है कि उनकी भैस भी अचानक मर गई. उसे उन्होंने 32 हजार में खरीदी थी. वे कहते हैं, “मेरी जानकारी में गांव में 10 दिन में पांच लोगों की भैंसे मरी हैं.”

सिरसा जिले के थेड़ी बाबा सावंतसिंह गांव के रहने वाले एनआरआई हरपाल सिंह ग्रेवाल बड़े किसान और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल कहते हैं, “मै एक चैरिटेबल अस्पताल से जुड़ा हुआ हूं, इस अस्पताल के रिकार्ड बताते हैं कि यहां इस साल खुजली के मरीजों की संख्या भयानक रूप से बढ़ी है. ये वे लोग हैं जो बीटी काटन के खेतों में काम करते हैं.” वे अपने इलाके में पशुओं की बीमारी और उनकी मौतों को भी स्वीकार करते हैं. हरपाल सिंह ग्रेवाल हमें अपने साथ कोटली गांव ले जाते हैं. करीब सात हजार आबादी वाला यह गांव बीटी काटन के मजदूरों के गांव के रूप में जाना जाता है. गांव के मजदूर गुजरात तक काटन चुनने जाते हैं. गांव में मेड़िकल स्टोर चलाने वाले पवन तनेजा कहते हैं, “गांव के तकरीबन हर मजदूर खुजली की बीमारी से ग्रस्त है. हर रोज दो तीन मजदूर उनके पास दवाई लेने आ ही जाता है.”

बीटी काटन की खेती का जैसा दुष्परिणाम हरियाणा में दिखना शुरु हुआ है, वह आंध्र प्रदेश में पहले ही दिख चुका है. करीब साल भर पहले आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में बीटी काटन के बीज और खल कान से सैकड़ों भेड़ों की मौत हो गई थी. तब आंध्र प्रदेश सरकार के पशुपालन विभाग ने इसकी जांच कराई तो पौधे में साइनाट की मात्रा पाए जाने पर किसानों को बीटी काटन के पोंधों और बीज व खल से अपने पशुओं को दुर रखने की हिदायत दी. लेकिन बाद में भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी जांच में आंध्र सरकार की रिपोर्ट को गलत करार कर बीटी काटन के बीज और खल को पशुओं के लिए हानि रहित बताया. प्रर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर कई वैज्ञानिकों ने सवाल भी उठाया है. देश के जानेमाने वैज्ञानिक और सेंटर फार सेलुलर और मोलेक्यूलर बाइलोजी के पूर्व फाउंडर डायरेक्टर प्रो. पी. एम भार्गव ने पर्यावरण मंत्रालय की दलीलों पर सवाल उठाते हुए बीटी काटन के दुष्परिणामों से सरकार को चेताया भी है.

हमने जब राज्य में पशुओं की तेजी से हो रही मौतों और बढ़ते खुजली की बीमारी के बारे में हरियाणा सरकार के अधिकारियों से बात की तो उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. हरियाणा के पशुपाल व डेरी विभाग के महानिदेशक डा. एस. के डांगी ने कहा, “हरियाणा में पशुओं में न कोई बीमारी फैली है और नहीं उनकी किसी बीमारी से मौत हो रही है.” जबकि हरियाणा स्वास्थ सेवा के महानिदेशक डा. अविनाश शर्मा का कहना था, “आप के फोन आने से पहले मैं जिले के चिकित्सा अधिकारियों से विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग कर रहा था, उन्होंने मुझे ऐसी किसी बीमारी के बारे में तो नहीं बताया.” वहीं जब हमने हिसार स्थित केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के पशु पोषाहार विभाग (एनीमल न्यूट्रीशियन डीवीजन) के अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. टी. आर चौहान से बीटी काटन की खल और बीज का पशुओं पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पूछा तो उनका कहना था, “पशु आहार में 35 फीसदी से ज्यादा खल नहीं होनी चाहिए. इसमें भी बिनौले की खल की मात्रा 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए. जरूरत से अधिक मात्रा में अगर कोई चीज अगर खिलाई जाएगी, उसके नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं.” सरकार भले इनकार करे लेकिन स्वामी रामदेव के गुरु आचार्य बलदेव ने जिंद स्थित आर्स महाविद्यालय गुरुकुल गोशाला में बीटी काटन के बीज और खल के असर का प्रयोग किया और नतीजा काफी खतरनाक निकला. गोशाला के प्रबंधक आचार्य धर्म देव कहते हैं, “जब हमने कुछ महीने तक गायों को बीटी कायन के बीज और खल खिलाए तो उन्होंन दूध देना कम कर दिया और उनमें से कई बीमार हो गईं. लेकिन जब हमने इसे बंद कर दिया तो न केवल उनका दूध बढ़ा बल्कि वे पहले से चुस्त रहने लगीं.”
खैर, यह तो वैज्ञानिक जांच के बाद ही पता चलेगा कि आखिर पशुओं की बीमारी व मौत और खुजली की वजह बीटी काटन है या कुछ और. लेकिन यह तय है कि अगर इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो पशुपालन पर आधारित हरियाणा की अर्थ व्यवस्था चौपट हो सकती है और हरियाणा में प्रचलित यह जुमला “जिसके घर में काली (भैंस), उसके घर में सदा दिवाली” अपना अर्थ खो देगा. देश में कुल दूध उत्पादन में हरियाणा का हिस्सा पांच फीसदी से ज्यादा है.

आखिर किसने बनाया आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी

उस दिन अखबार की सुर्खियां खून से लथपथ थी. तमाम अखबार चीख चीख कर कह रहे थे, “दिल्ली, अहमदाबाद और उत्तर प्रदेश की अदालतों में सीरियल ब्लास्ट कर तबाही करने वाले आतंकी आजमगढ़ के रहने वाले थे.”… टीवी पर एंकर चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था, “आजमगढ़ है आतंकवाद की नर्सरी....” शाम ढलते-ढलते समाचार चैनलों ने देश भर में हुए तमाम विस्फोटों के तार आजमगढ़ से जोड़ दिए. अचानक उत्तर प्रदेश का यह जिला अंतरऱाष्ट्रीय पटल पर छा जाता है. टीवी देखते-देखते मैं स्मृतियों में खो जाता हूं और आजमगढ़ में बिताए बचपन के दिन सिनेमा की रील तरह आंखों से गुजरने लगते हैं.

मेरा आजमगढ़.... कैफी आजमी और राहुल सांस्कृत्यायन का आजमगढ़... गंगा जमुनी संस्कृति का आजमगढ़... लेकिन मेरा आजमगढ़ तो ऐसा नहीं था, जैसा आज दिखाई दे रहा है. नब्बे के दशक में हमारे राजनेताओं ने अपने चंद स्वार्थों के लिए हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत के जो बीज बोए, 18 साल बाद आज हम उसी की फसल काट रहे हैं. मुझे अपने प्यारे दोस्त साजिद का वह मासूम चेहरा आज भी अच्छी तरह याद है. कैसे मंदिर आंदोलन ने हम दोनों की दोस्ती को अलविदा कर दिया था. दोनों के बीच नफरत के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे मासूम मन तब समझ नहीं पाया था. “राम लला हम आंएगे, मंदिर वहीं बनाएंगे” के नारों की गूंज ने मेरे सहपाठियों राशिद, सलाउद्दीन, हासिम, फरदीन.... को भी मुझसे दूर कर दिया था. तब मैं दसवी में पढ़ता था. मुझे आज भी याद है साजिद की अम्मी की वे दुलार भरी आंखें... उनके कोमल हाथ, जिसे वे हमारे माथे पर फेर कर लंबी उम्र की दुआएं दिया करती थीं. शाम को स्कूल की छुट्टी हुई नहीं, मैं साजिद के घर पहुंच जाता था. या फिर साजिद मेरे घर आ जाता था. दोनों छत पर घंटों बैठते और सपने बुनते. हमारे सपनों में फौज हुआ करती थी. हम दोनों सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते थे.

लेकिन सपने बुनने का सिलसिला अचानक एक दिन रुक जाता है. तब 15 साल की उम्र में मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं हिंदू हूं और साजिद मुसलमान और हिंदू और मुसलमान कभी दोस्त नहीं बन सकते. साजिद मुझसे मिलने मेरे घर आता है और मेरे घर के लोग उसके साथ न केवल दुर्व्यवहार करते हैं, बल्कि उसे दुबारा कभी घर न आने की हिदायत भी देते हैं. मुझसे कहा जाता है कि साजिद मुसलमान है, इसलिए वह कभी घर नहीं आना चाहिए. मैं चुपके से घरवालों की नजरें बचा कर साजिद से मिलने उसके घर जाता हूं. लेकिन वहा भी वही हालात थे, जो मेरे घर में थे. तब बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं द्वारा हमें बताया गया कि मुसलमान इस देश के नहीं हैं. वे आक्रमणकारी हैं. उन्होंने इस देश के मूल निवासियों, हिंदुओं पर सैकड़ों साल तक जुल्म ढाया है. हमारे मंदिरों को उजाड कर मसजिद बना डाला है. हमें मसजिद को तोड़ कर मंदिर बनाना है. देखते-देखते पूरी फिजा में अशोक सिंघल, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विनय कटियार के आग उगलते भाषण गूंजने लगते हैं. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के नेता लोगों को कार सेवक बनाने लगे. गांव के जिस मंदिर में कभी दिया नहीं जतला था, उसमें 24 घंटे भजन कीर्तन होने लगा. जिस मसजिद में मौलवी साहब अकेले अजान दिया करते थे, उसमें लाउड स्पीकर के जरिए सैकड़ों अजान की आवाज सुनाई देने लगी. और हां, मसजिद के बाहर शाम की अजान के वक्त मौलवी साहब से अपने बच्चों की नजरे उतरवाने के लिए हिंदू मांओं की जो लंबी कतार लगती थी, वह भी अचानक काफूर हो जाती है. जिन बाबू मियां और फकीरिन चच्ची का हमारे घर खूब आना-जाना हुआ करता था, अचानक वह बंद हो जाता है. तब पहली बार मैने साजिद के चेहरे पर खौफ देखा था...मौत का खौफ. जब मैने गौर किया तो पाया कि यह खौफ तो गांव के सभी मुसलमान बच्चों के चेहरे पर दिखाई दे रहा था. और एक दिन साजिद जब स्कूल के रास्ते में मिला तो उसने मुझसे डरते हुए कहा, “हमें हिंदू लोग मार डालेंगे.”

और इस बीच एक दिन आजमगढ़ से सटे फौजाबाद जिले में स्थित अयोध्या में बाबरी मसजिद गिरा दी गई. कहा गया कि हिंदुओं के माथे पर लगा कलंक मिटा दिया गया है. इस खुशी में मिठाईंयां बांटी जाती हैं. कई जगह दंगे होते हैं. दोनों संप्रदायों के ढेर सारे निर्दोष लोग दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं. गांव और शहर खामोश हो जाते हैं. खैर, कुछ दिन बाद यह खामोशी तो छंट जाती है, लेकिन नफरत का गुबार नहीं. उस समय हिंदू और मुसलमानों में नफरत की जो खाई बनी, वह फिर कभी भर न सकी. बल्कि नई पीढ़ी के बीच वह और चौड़ी होती गई. आजमगढ़ कभी अंडरवर्ल्ड का गढ़ हुआ करता था. कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान यही का रहने वाला था. दाउद के पिता ओर अबू सलेम का घर भी आजमगढ़ ही है. इनके गिरोहों में हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के लोग हुआ करते थे. दाऊद के करीबियों में तो मुसलमानों से ज्यादा संख्या हिंदुओं की थी. लेकिन बाबरी मसजिद के विध्वंस ने अंडरवर्ल्ड को भी दो खेमों में बांट दिया. इससे पहले आजमगढ़ अपराध की धरती थी, लेकिन नफरत की नहीं. 1992 के बाद देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी नफरत की फसल लहलहाने लगी. फर्क सिर्फ इतना था कि यहां अंडरवर्ल्ड के जरिए आईएसआई और दहशदगर्दों ने नफरत करने वाले लोगों के हाथों में हथियार पकड़ा दिया.
करीब 16 साल बाद एक दिन जब मैं साजिद से मिला तो वह बिल्कुल बदल चुका था. उसका बदला रूप देख कर मैं चौक गया. उसके चेहरे की मासूमियत नफरत में तब्दील हो चुकी थी. सेना में भर्ती होकर देश सेवा का सपना संजोने वाला नौजवान जेहादी बनना चाहता है. गुजरे वक्त ने साजिद को जेहाद का समर्थक और ओसामा बिन लादेन का फैन बना दिया था. घंटे भर की मुलाकात के दौरान वह लगातार मुझसे शिकायत करता रहा कि इस मुल्क में अब वह सुरक्षित नहीं है. यह असुरक्षा की भावना आजमगढ़ के नई पीढ़ी के नौजवानों में घर कर गई है. बाबरी मसजिद को गिरते देखने वाली पीढ़ी अब नौजवान हो गई है. अगर ऐसे में कोई आतंकी संगठन या फिर आइएसआई नौजवानों को गुमराह कर दे, तो उन्हें शायद बंदूक उठाते देर न लगे. हो सकता है आतिफ और साजिद के साथ भी ऐसा ही हुआ हो. आज जब आजमगढ़ के बारे में सोचता हूं तो खुद से सवाल करता हूं, “आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी किसने बनाया है?” आतिफ ने या फिर अशोक सिंघल, मुलायम सिंह, इमाम बुखारी और सैयद शहाबुद्दीन ने.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।