हमारी उससे मुलाकात आगरा-जयपुर नेशनल हाइवे पर सिकंदरा के पास होती है. वह एक ऐसा नौजवान था जिसकी आखों में भविष्य के सुनहरे सपने की बजाय नफरत झलक रही थी. कल तक जिनके साथ वह हंसी ठिठोली करता था आज उन्हीं के खून का प्यासा है.. हम गूजरों के मुख्य धरना स्थल पाटोली गांव से वापस लौट कर दौसा की तरफ बढ़ रहे थे. चारों तरफ सन्नाटा था, दहशतभरी इन सूनसान सड़कों पर बस अगर कुछ नजर आ रहा था तो जली हुई गाड़ियां और तबाह पुलिस चौकियां. जगह जगह बल्लम, गड़ासी, सरिए और लाठियों से लैस गूजर प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी एक अजीब से डर और खौफ का एहसास करा रही थी. यदाकदा सेना व अर्धसैनिक बलों की सनसनाती गाड़ियां इस दहशत को चीरती हुई आगे निकल जातीं. नेशनल हाइवे-11 और उसे जोड़ने वाली सड़कों पर सैकड़ों जगहों पर गूजरों ने पत्थर और बिजली के खंभों के जरिए अवरोध खड़ा कर रखा था. कई जगह रेल की पटरियां उखाड़ दी थी. रेलवे फाटक तोड़ दिए थे. हम लोग पत्थरों और खंभों को हटा कर रास्ता बनाते हुए बांदीकुई से करीब 60 किलोमीटर तक का सफर तय कर यहां तक पहुंचे थे. जहां हम अवरोध नहीं हटा सकते थे वहां से हम गांवों और पगडंडियों से होते हुए फिर हाइवे पर पहुंचते थे. और ऐसा सफर करने वाले उस दिन हम शायद अकेले शख्स रहे होंगे...
जली हुई बसों के पीछे से सहसा भीड़ को चीरते हुए वह हमारी कार के आगे आ जाता है. कल तक कलम उठाने वाले उसके हाथों में अब गड़ासी लहरा रही थी.. तल्खी से वह हमसे सवाल करता, “हमें पता चला है कि पीछे बालाजी मोड़ पर मीणाओं ने गूजरों को मारा है और उनकी मोटरसाइकिल जला दी है??”.. “नहीं ऐसी तो कोई घटना नहीं हुई है” हालांकि हमारे इस जबाव से वह संतुष्ट नहीं था और इस बारे में बार-बार हमसे पूछताछ करता रहा..शायद वह हमारे चेहरे की सच्चाई को पढ़ चुका था कि हम उससे झूट बोल रहे हैं. हकीकत यह थी की हमारे सामने ही मीणाओं के एक हूजूम ने “जय मीण भगवान के जयकारे के साथ” एक गूजर की न केवल बुरी तरह पिटाई की बल्कि उसकी मोटरसाइकिल को आग के हवाले कर दिया. आप जानना चाहेंगे कि जब यह सब हो रहा था तो पुलिस कहां थी? इस घटना से थोड़ी देर पहले तक बालाजी मोड़ पर सेना और पुलिस दोनों की गाड़ियां मैजूद थी. लेकिन जैसे ही मीणाओं का हुजूम मोड़ की तरफ आने लगा हमारे देखते देखते सेना की गाड़ी आगे बढ़ गई और पुलिस की पीछे. अगर हम (मैं और मेरे फोटोग्राफर साथी सुजान सिंह) वहां न मौजूद होते तो वे लोग उस गूजर को जिंदा न छोड़ते. शायद यह मीडिया का भय था... पता चला हमारे यहां पहुंचने से कुछ देर पहले मीणाओं ने दो और गूजरों की मोटरसाइकलें जला दी थी. गूजरों पर मीणाओं के हमले की यह पहली घटना थी और जातीय हिंसा की यहीं से शुरुआत भी. बालाजी मोड़ पर मीणाओं का नेतृत्व कर रहे सुखलाल ने एमए तक की पढ़ाई की है. वह कहते हैं, “हम किसी भी सूरत में गूजरों को अपना हक नहीं छीनने देंगे. अगर गूजरों ने पाटोली से अपना धरना खत्म नहीं किया तो हम उन्हें वहां से खदेड़ देंगे.” इस बीच भीड़ से कई मीणा एक साथ ललकारते हैं, “देखते हैं गूजरों का राशन पानी इधर से कैसे जाता है. वे नहीं हटेंगे तो भूखे मर जाएंगे.” और जैसा की अंदेशा था वही हुआ. मीणाओं ने गूजरों के लिए भोजन ले जाने वाले कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया.
हाथों में गड़ासी लिए आक्रोश से भरा जो गूजर नौजवान हमसे मीणाओं के हमले के बारे में पूछ रहा था, वह अब हमसे चेतावनी भरे लहजे में कहता है, “आगे रास्ते में मीणाओं का गांव है अगर वह मिलें तो...(गाली देते हुए) उनसे कह देना कि इस हाइवे पर दो सौ गांव गूजरों के हैं, अगर उन्होंने एक भी गूजर को मारा तो उनके गांव के गांव जला दिए जाएंगे…” और वहां जमे लोग हथियारों से लैस अपने हाथ ऊपर उठाते हुए “भौणा जी भगवान के जयकारे” के साथ उस नौजवान की बातों का समर्थन करते हैं. जयकारे देर तक हवा में तैरते रहे.. और हम अवाक देखते रहे कि इंसान ही नहीं इस जातीय संघर्ष में तो देवता भी शामिल हो गए हैं.
हमसे सवाल जबाब करने वाला नौजवान अपना नाम राजबीर सिंह गूजर बताता है. बीए तक पढ़ाई करने वाला राजबीर तीन साल से बेरोजगार है. उसे लगता है कि मीणा अकेले मलाई खाना चाहते हैं इसीलिए वह गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं होने देना चाहते. वह गूजरों को उनका हक देने की बजाय उनकी जान लेने पर उतारू हो गए हैं. यही वजह है कि राजबीर की गड़ासी मीणाओं के खून की प्यासी है. राजबीर कहते हैं, "गूजर और मीणाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि एक जैसी है लेकिन आरक्षण का फायदा उठाकर वे आगे बढ़ गए और हम पीछे रह गए. देश में हमारी जाति का एक भी आईएएस तक नहीं है. जबकि मीणा लोगों की सरकारी महकमें में भरमार है. चपरासी से लेकर डीजीपी तक की कुर्सी पर उनके लोग बैठे हुए हैं." यह टीस राजस्थान के हर गूजर युवक में दिखाई देती है.
मीणाओं की तरक्की की बात काफी हद तक सही भी है मीणाओं ने आरक्षण का फायदा उठा कर भरपूर तरक्की की. मीणाओं की प्रशासन में भारी तादाद में भागीदारी है. अलवर से बांदीकुई के रास्ते में हमें मीणाओं के कई पट्रोल पंप मिले और मीणा पैलेस (मीणाओं की कोठियां) की तो भरमार थी. मीणाओं की समृद्धि देखर गूजरों में ईर्ष्या होना स्वाभाविक है. आलम यह है कि स्कूलों और कालेजों में जातीय आधार पर गूजरों और मीणाओं के छात्र बंटे होते हैं. और गूजर जहां बहुमत में होते हैं वहां वह मीणाओं से किसी न किसी बहाने अपनी खुन्नस निकालते रहते हैं. बांदीकुई के रहने वाले एक गूजर युवक रूप सिंह की कालेज के दिनों में मीणा जाति के छात्रों से कई बार झड़प हुई. एक बार तो कालेज में गूजर और मीणाओं के संघर्ष ने व्यापक रूप ले लिया और दोनों समुदायों के लोग सड़कों पर उतर आए. कई दिनों तक बाजार बंद रहा और आखिरकार दोनों समुदायों में सुलह के बाद ही जन जीवन सामान्य हो पाया.
आखिर क्या वजह है जिन लोगों के साथ राजबीर का बचपन बीता आज वह उन्हीं लोगों के खून का प्यासा हैं. दरअसल इस नफरत की बुनियाद बहुत पुरानी है. आज जो गूजर और मीणाओं का संघर्ष दिखाई दे रहा है उसके बीज तो कई साल पहले ही बो दिए गए थे. आरक्षण का फायदा उठाकर जब मीणा समाज के लोग आगे बढ़ने लगे तो गूजरों में उनके प्रति नफरत की भावना भड़कने लगी. कई बार स्कूल और कालेज स्तर पर इस नफरत का उफान दिखा लेकिन आग भड़कने से पहले ही स्थानीय लोगों के प्रयास से इसे बुझा दिया गया. लेकिन इस बार ऐसी आग लगी कि पूरा राजस्थान जातीय हिंसा की आग में धूं धूं कर जल रहा है. अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग को लेकर करीब सात साल से संघर्ष कर रहे गूजरों का धैर्य उस समय जवाब दे गया जब भरतपुर-दौसा के बीच आगरा-जयपुर नेशनल हाइवे पर स्थित पाटोली गांव में 29 मई को प्रदर्शन करने आए लोगों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. इस गोलाबारी में गूजर समुदाय के छह लोगों की मौत हो गई. आरक्षण की मांग कर रहे गूजरों के इस ऐलान के बाद की जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जाती तब तक वे पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों का दाह संस्कार नहीं करेंगे, यह आंदोलन व्यापक और उग्र रूप ले लेता है. राजनीति ने इसे और हवा दी और अब आलम यह है कि इसकी चपेट में केवल राजस्थान ही नहीं दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी आ चुका है.
गूजरों का मानना है कि सामाजिक रूप से उनकी स्थिति और हैसियत मीणाओं जैसी ही है. लिहाजा उन्हें आदिवासी की श्रेणी में रखते हुए मीणाओं की तरह ही अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए. हिमाचल, उत्रांचल और जम्मू कश्मीर में गूजरों (वन गूजर) को जनजाति का दर्जा मिला हुआ है जबकि राजस्थान में वह अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में शामिल है. पाटोली गांव में धरने पर बैठे गूजर आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष व गूजर प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला कहते हैं, “संविधान ने अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिए जो मापदंड तय किए हैं गूजर उन पर खरे उतरते हैं. हमारी अपनी अलग संस्कृति और अलग देवी-देवता है. हम हमेशा शहर से दूर जंगलों और पहाड़ों में रहे हैं. इस लिहाज से हम अनुसूचित जनजाति के सारे लक्षणों को पूरा करते हैं. लोकूर कमेटी और प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टार्ड ने भी गूजरों को अनुसूचित जनजाति ही माना था. लिहाजा हमें अन्य पिछड़ा वर्ग की बजाय अनुसूचित जनजाति में शुमार किया जाए.” आजादी के बाद से ही गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग उठने लगी थी. लेकिन काका कालेलकर समिति की अनुशंसा के बाद जब मीणाओं को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया गया तो यह असंतोष और बढ़ गया. लेकिन 1993 में शेखावत सरकार ने गूजरों को ओबीसी में शामिल कर उनके असंतोष को कम करने की कोशिश की. राज्य सरकार के इस कदम से गूजरों ने भी राहत की सांस ली. लेकिन उनकी यह खुशी 1999 में उस समय काफूर हो गई जब वाजपेयी सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के चलते जाटों को केंद्र में ओबीसी में शामिल करने का फैसला किया. बाद में राज्य सरकार ने भी उन्हें यह दर्जा दे दिया.
सामाजिक व आर्थिक रुप से समृद्ध जाटों के ओबीसी में शामिल होने से गूजरों को जो फायदा मिल रहा था वह कम हो गया. ऐसे में गूजरों ने फिर से खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अपनी मांग तेज कर दी. पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजनीतिक फायदे के लिए गूजरों की इस महत्वाकांक्षा को हवा दी और उन्हें आश्वासन दिया कि अगर वह सत्ता में आईं तो गूजरों को वह अनुसूचित जनजाति में शामिल करेंगी. गूजरों ने भी वसुंधरा राजे सिंधिया पर भरोसा कर उन्हें ताज तक पहुंचाया. राजस्थान में गूजरों की तादाद करीब 70 लाख बताई जाती है.
वसुंधरा राजे के सत्ता में आने के साढ़े तीन साल बीत चुके हैं लेकिन अभी तक राज्य की बीजेपी सरकार ने केंद्र सरकार को इसकी अनुशंसा नहीं भेजी है. लंबे इतंजार के बाद करीब छह महीने पहले गूजरों ने अपनी मांग को लेकर फिर आंदोलन तेज कर दिया तो मुख्यमंत्री ने उनसे तीन महीने में केंद्र को इस बाबत अनुशंसा भेजने की मोहलत मांग कर आंदोलन स्थगित करने की मांग की. एक बार फिर गूजर नेताओं ने मुख्यमंत्री की बात मान कर आंदोलन स्थगित कर दिया. लेकिन समय सीमा खत्म होने के तीन महीने बाद उनका धैर्य जवाब दे गया और इस बार वे आर पार की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. गूजर नेता और राजस्थान गूजर युवा महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष मान सिंह गूजर कहते हैं, “इस बार तो हम अपना हक लेकर ही रहेंगे. चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े.”
लेकिन अब यह आरक्षण की लडाई न होकर जाति के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है. दोनों समुदाय के नेता और विधायक अपनी अपनी जातियों के पक्ष में मैदान में आ गए हैं. मीणा समुदाय के 33 विधायक और गूजर समुदाय के सात विधायक अपनी-अपनी बिरादरी के हको की लड़ाई में एक दूसरे को सह और मात देने में लगे हुए हैं. बिरादरी को शांत रखने की बजाय यह नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उन्हें और भड़का रहे हैं. राजनीति ने इस मसले को आसान बनाने की बजाय और जटिल बना दिया है. और हाशिए पर खड़ी एक दूसरे के खून की प्यासी दोनों जातियां यह नहीं समझ पा रही हैं वह नफरत का जो बीज बो रही हैं उसकी कीमत उनकी आने वाली पीढ़ियों को चुकाना होगा. राजबीर का यह एलान "खून का बदला हम खून से लेंगे" आने वाले समय में किसी अनर्थ की भविष्यवाणी सी लगती है.
Tuesday, 4 December 2007
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About Me
- Anil Pandey
- अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।
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