Wednesday, 5 December 2007

आजादी के साठ साल बाद भी क्यों पैदा होते हैं चंबल में डकैत

चार दिन तक हंसता खिलखिलाता उसका चेहरा अचानक खामोश हो जाता है. उसकी यह अप्रत्याशित चुप्पी हमें परेशान कर रही थी. बाईस साल के उस नौजवान की आंखों में हमें कुछ अजीब सी हलचल दिखाई दे रही थी. कई बार कुरेदने पर उसने जब यह कहा, "साहब मेरा मन भी बंदूक उठा कर बागी बनने का करता है" तो हमारे चेहरे की हवाइयां उड़ गई. हम चौंके, क्योंकि हमने उससे ऐसे जवाब की कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी. जब हमने उसके बगावत की वजह जाननी चाही तो उसका जवाब था, "मेरी दस बीघे जमीन पर मेरे गांव के ही एक दबंग व्यक्ति ने कब्जा कर लिया है. इस गम में मेरे पिता की मौत हो गई और मुझे गांव छोड़ कर शहर में नौकरी करनी पड़ रही है. सोचता हूं उसकों मार कर मैं भी चंबल के बीहड़ों में चला जाऊं." क्या पुलिस में इसकी शिकायत की? वह कहता है, "पुलिस मुझसे पैसा लेकर मुझे कब्जा दिला देती, लेकिन वे पुलिसवालों को मुझसे ज्यादा पैसा देकर फिर मेरी जमीन पर कब्जा कर लेते. ऐसा कई बार हुआ." उसका जवाब सुन कर हमारे कानों में चंबल के पूर्व दस्यु सरगना मोहर सिंह की कही यह बात गूंजने लगती है, "जब तक अन्याय है तब बागी (चंबल में डाकुओं को बागी कहा जाता है) पैदा होते रहेंगे."

यह घटना इस समय की है जब हम चंबल के बीहड़ों से पांच दिन की अपनी यात्रा पूरी कर वापस लौट रहे थे. उपर हमने जिस शख्स की चर्चा की है वह हमारा ड्राइवर कृष्णा था. हरियाणा निवासी कृष्णा हमारे साथ चंबल के कई वर्तमान और पूर्व डैकेतों से मिलकर वापस आ रहा था. उन डकैतों में से कई की कहानी कृष्णा जैसी ही थी. लोगों द्वारा सताए जाने पर ही इन लोगों ने बंदूक उठाई और बागी बन गए. इन्हें देख कर कृष्णा के मन में भी अन्याय के खिलाफ बगावत करने की तमन्ना जगी. लेकिन अगर कृष्णा हरियाणा की बजाय चंबल में होता तो शायद अब तक वह डाकू बन गया होता. चंबल की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियां उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित भी करतीं. और खास कर चंबल के लोग तो अदालत और पुलिस से न्याय की गुहार करने की बजाय खुद बदला लेना ज्यादा पसंद करते हैं. अन्याय और शोषण के खिलाफ हथियार उठाना और "खून का बदला खून" से लेने की यहां की परंपरा रही है.
चंबल का इलाका अपनी बहादुरी और वीरता के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि यहां की धरती पर अगर डाकू भी पैदा होते हैं तो सरहद पर देश की रक्षा के लिए शहीद होने वाले वीर सिपाही भी. कई बार तो एक भाई फौज में तो दूसरा डाकू. भिंड जिले के रिदौली गांव के जयश्रीराम बघेल 6 साल तक दस्यु सरगना विद्या गडेरिया के गिरोह में सक्रिय रहे. उनका छोटा भाई फौज में सुबेदार हैं. जयश्रीराम बघेल कहते हैं, "गांव के कुछ सबल लोगों ने मेरे चाचा की हत्या कर दी. बदला लेने के लिए ही मैं गडेरिया गिरोह में शामिल हो गया." चंबल इलाके से देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले कहीं ज्यादा लोग सेना में हैं. 1965 और 1972 की लड़ाई के अलावा कारगिल युद्द के दौरान भी यहां के कई जवान शहीद हुए थे. यहां की धरती पर कभी अंग्रेजों और सिंधिया स्टेट के अन्याय के खिलाफ हथियार उठाने वाले बागियों से लेकर मौजूदा समय में अपहरण को उद्योग बनाने वाले डाकुओं की कहानियां बिखरी पड़ी हैं. पुलिस की नजर में ये डकैत बर्बर अपराधी हैं लेकिन वे अपने इलाके में रॉबिनवुड हैं. अपनी जाति के हीरों हैं. अमीरों से पैसा ऐठना और गरीबों खासकर अपनी जाति के लोगों की मदद करना इनका शगल है. लेकिन दुश्मनों और मुखबिरों के साथ ये ऐसा बर्बर रवैया अपनाते हैं कि देखने वालों के दिल दहल जाएं. मध्य प्रदेश के डकैती विरोधी अभियान के प्रमुख रह चुके पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसएस शुक्ला कहते हैं, "जिस जाति का व्यक्ति अपराध कर डाकू बन जाता है उसे उस विशेष जाति समुदाय के लोग अपना 'हीरो' मानने लगते हैं. उसके साथ नायक जैसा व्यवहार करते हैं." यह परंपरा आज की नहीं है, जब से यहां डाकू पैदा हुए तब से यह परंपरा चली आ रही है. मानसिंह से लेकर दयाराम गड़ेरिया और ददुआ तक अपनी जाति के हीरो रहे.
बागी होना यहां गर्व की बात मानी जाती है. हालांकि अब बागियों को वह सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं मिलती जो पहले मिला करती थी. पहले के डाकुओं के अपने कुछ सिद्धांत और आदर्श हुआ करते थे. एसएस शुक्ला कहते हैं, "जो लोग कानून के प्रति विद्रोह कर हथियार उठाते थे उन्हें बागी कहा जाता था. उनके कुछ आदर्श और सिद्धांत हुआ करते थे. 1970 तक डाकुओं के आदर्श और सिद्धांत बरकरार थे. तब वे डकैती पैसे कमाने के लिए नहीं बल्कि बगावत की लड़ाई लड़ने के लिए हथियार व गोले बारूद खरीदनें व अपने भरण पोषण के लिए करते थे." लेकिन जैसे जैसे वक्त बदला डाकुओं का चरित्र और उनकी कार्य प्रणाली भी बदली. अब वे बागी नहीं प्रोफेशनल डाकू बन गए हैं. अपहरण इनका मुख्य धंधा है. दुर्दांत दस्यु सरगना जगजीवन परिहार के इनकाउंटर में प्रमुख भूमिका निभाने वाले चंबल रेंज के डीआईजी डीसी सागर कहते हैं, "अब ये लोग डकैती नहीं डालते बल्कि अपहरण और वसूली करते हैं. पिछले दस सालों से डकैतों ने यहां अपहरण को एक उद्योग बना लिया है. आसपास के अलावा दूसरे बड़े शहरों से भी ये लोग अपहरण करते हैं. ठेकेदारों और खदानमालिकों से रंगदारी वसूलना भी इनकी आय का एक बड़ा स्रोत है."
वह भी कृष्णा जैसा ही एक नौजवान था जो बदले की भावना से उबल रहा था. भिंड स्थित अटेर किले के पीछे के बीहड़ों में चंबल के किनारे हमारी उससे मुलाकात होती है. बड़े बड़े बाल, मस्तक पर बड़ा सा तिलक लगाए और माथे पर पट्टी बांधे यह नौजवान कभी जगजीवन परिहार के गैंग का सदस्य रहा है. अपने भाई के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए बंदूक उठाने वाले इस नौजवान को अब अपहरण की दुनिया रास आने लगी है. वह कहता है, "डकैती की तरह इसमें न तो पकड़े जाने का खतरा है न ही मुठभेड़ का. बैठे बिठाए लाखों रुपये महीने आ जाते हैं." नारायण नाम का यह शख्स चंबल के तीसरी पीढ़ी का डकैत है जो बदले की भावना से 'बागी' बना और अब 'प्रोफेशनल अपराधी'. उसकी माने तो अपहरण से जो उसे कमाई हुई है उसका एक बड़ा हिस्सा वह प्रापर्टी और जमीन खरीदने में निवेश कर चुका है. यह चंबल के डकैतों का असली चेहरा है. कभी अपने चरित्र और सिद्धांतों के लिए चर्चित रहे चंबल के डकैतों का चेहरा अब बदल चुका है.
आखिर यहां डाकू क्यों पैदा होते हैं? हमने पड़ताल करने पर पाया कि प्रतिष्ठा, प्रतिशोध और प्रताडना इसका मूल कारण है. लेकिन डाकू पैदा करने में पुलिस की सबसे अहम भूमिका होती है. चंबल के दस्यु सरगनाओं का इतिहास देंखे तो डाकू मानसिंह से लेकर फूलन देवी तक सभी लोग अमीरों या रसूख वाले लोगों के शोषण के शिकार रहे हैं. और इस शोषण में पुलिस और व्यवस्था ने इनकी बजाय रसूखवालों का ही साथ दिया. ऐसे में ये लोग न्याय की उम्मीद किससे करते. कभी चंबल में पुलिस की नाक में दम करने वाले पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, "मेरे गांव के सरपंच ने मंदिर की जमीन पर कब्जा कर लिया. मेरे विरोध करने पर उन्होंने मेरे खिलाफ फर्जी केस दर्ज कर मुझे जेल भिजवा दिया और फिर मेरे साथ ही विरोध करने वाले मेरे एक साथी की हत्या भी कर दी. सरपंच तब के एक मंत्री का रिश्तेदार था और दरोगा और दीवान उसके घर पर हाजिरी बजाते थे. ऐसे में मैं किससे न्याय मागता. बंदूक उठाने के अलावा मेरे पास कोई चारा ही नहीं था." कमोबेश यह स्थिति आज भी बरकरार है. भिंड के एसपी निरंजन बी वायंगणकर मानते हैं कि फर्जी मुकदमें डाकू बनने की एक बड़ी वजह है. वे कहते हैं, "लोग दुश्मनी निकालने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ फर्जी मुकदमें दर्ज करा देते हैं. लेकिन मैंने शख्त हिदायद दी है कि फर्जी मुकदमें न दर्ज किए जाएं और न ही किसी किसी बेकसूर पर इनाम घोषित किया जाए."
चंबल का इतिहास विद्रोह से भरा पड़ा है. यहां के भदावर और तोमर राजाओं ने भी अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है. यह बगावत की भावना आज भी बरकरारा है. चंबल की दस्यु समस्या पर शोध कर चुके समाजशास्त्री प्रो पी.वी.एस तोमर कहते हैं, "यहां के लोग स्वाभिमानी और बहादुर होते हैं. इसलिए ये लोग प्रताड़ना और अन्याय बर्दास्त नहीं कर पाते. यही वजह है कि ये लोग अन्याय के खिलाफ बंदूक उठा लेते हैं." चंबल की भोगोलिक स्थिति इसमें मददगार साबित होती है. चंबल का इलाका क्वारी, सिंध, चंबल, वैशाली और यमुना नदियों के अलावा कई छोटी नदियों से घिरा है. इनके किनारे मिट्टी के बड़े बड़े टीले और घने जंगल छुपने और पुलिस से सुरक्षित रहने की सबसे बेहतर जगह है. देश आजाद हो गया है लेकिन हालात नहीं बदले हैं. शोषण आज भी जारी है. बस अंतर इतना है कि पहले मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के लोगों का शोषण किया तो अब व्यवस्था व पुलिस कर रही है. 1947 में देश आजाद हुआ तो आम जनता के साथ डाकुओं ने भी आजादी का जश्न मनाया. डाकू मानसिंह के साथी और उनके मरने के बाद गिरोह के सरदार रहे लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का कहते हैं, "देश आजाद हुआ तो हम भी खुश हुए. क्वींटलों लड्डू बांटे गए. जश्न मनाया गया कि अब शोषण और अन्याय बंद होगा. लेकिन अब तो यह पहले से कहीं ज्यादा हो रहा है. हमारे सपने चूर हो गए. "

हमने दस्यु प्रभावित क्षेत्र ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, भिंड, मुरैना, इटावा और आगरा के विभिन्न इलाकों का दौरा किया. इस दौरान पाया कि यहां आजादी के साठ साल बाद भी विकास की बयार कहीं दिखाई नहीं देती. गांवों में न सड़कें है और न ही दूसरी बुनियादी सुविधाएं. बीहडों में कई जगह हालत यह थी कि हमें अपनी गाड़ी दूर छोड़कर पैदल सफर करना पड़ता था. उद्योग धंधे और रोजगार के अवसर तो न के बराबर हैं. खेती पर ही लोगों की आजीविका निर्भर है. भिंड के पूर्व विधायक और दस्यु उन्मूलन अभियान चलाने वाले परशुराम भदौरिया कहते हैं, "बिजली की समस्या की वजह से खेतों की सिचाई नहीं हो पाती है. इससे पैदावार प्रभावित होती है. रोजगार के अवसर भी यहां न के बराबर है. व्यावसायिक शिक्षा की तरफ यहां सरकार ने कभी ध्यान ही नहीं दिया." लोगों के पास सरकारी नौकरी खास कर फौज में भर्ती होने के अलावा कोई चारा नहीं है. जमीन बेंचकर लोग इसके लिए रिश्वत का इंतजाम करते हैं. जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे अपहरण उद्योग में शामिल हो जाते हैं. भिंड के एसपी निरंजन बी वायंगणकर कहते हैं, "यहां के युवा 'पकड़' ले जाकर डकैतों को सौंप देते हैं. इसके बदले उन्हें फिरौती की रकम से एक हिस्सा मिल जाता है. यह हिस्सा 10 से 25 फीसदी तक होता है." अपहरण उद्योग से पुलिस को भी कमाई होती है. असलियत यह है कि पुलिस नहीं चाहती की दस्यु समस्या खत्म हो. पूर्व विधायक परशुराम भदौरिया इसकी वजह बताते हैं, "भ्रष्ट पुलिस वालों के लिए दस्यु समस्या कमाई का जरिया बन गया है." पुलिस के कई लोग डाकुओं की मदद करते हैं. डीआईजी डी सी सागर मानते हैं कि उनके महकमें के लोगों द्वारा डाकुओं को मदद मिलती है. वे कहते हैं, "कई बार हमारी सूचनाएं डाकुओं तक पहुंच गई हैं और हमारा अभियान फेल हो गया. इस संबंध में हमने कई पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी की है."

जगजीवन परिहार को डकैत बनाने के लिए तो पुलिस ही जिम्मेदार थी. वह पुलिस का मुखबिर था. निर्भय गूजर को मारने के लिए पुलिस ने जगजीवन को हथियार मुहैया कराया और डाकू बना दिया. उपर से दबाव या फिर डाकू के पकड़े जाने पर भेद खुल जाने के डर से पुलिस वाले इनका इनकाउंटर कर देते हैं और फिर एक दूसरा गैंग तैयार करवा देते हैं. मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक एसएस शुक्ला की मानें तो इनकाउंटर स्पेस्लिस्ट लोगों की इसमें खास भूमिका होती है. वे कहते हैं, "ऐसे लोग जब एक गैंग को मार गिराते हैं तो उनकी अर्निंग बंद हो जाती है. ऐसे में वे दूसरा गैंग तैयार कर देते हैं." चंबल के किनारे के मिट्टी के बड़े बड़े टीले डाकुओं की छुपने की जगह है. अगर सरकार इन्हें समतल कर लोगों में बांट दे तो इससे न केवल डाकू समस्या पर लगाम लगेगी बल्कि लोगों को खेती के लिए जमीन मिल जाएगी. लेकिन टीलों के समतलीकरण की योजना भ्रष्टाचार की वजह से परवान नहीं चढ़ पा रही है.

डाकुओं के अलावा अब चंबल में नक्सली भी सक्रिय हो रहे हैं. डीआईजी डी सी सागर कहते हैं, "हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि नक्सलियों का प्रशिक्षण शिविर कहां चल रहा है." शोषण और बेरोजगारी ही दस्यु समस्या की तरह नक्सल समस्या की भी जड़ है. अगर इस समस्या से निपटना है तो गांवों में विकास की गंगा बहानी होगी. लोगों को शिक्षा और रोजगार मुहैया कराना होगा. वरना चंबल का दायरा फैलता हुआ पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा और देश भर में बागियों की जमात पैदा हो जाएगी.

तब डाकुओं के भी सिद्धांत हुआ करते थे

जब भी चंबल के डकैतों का इतिहास लिखा जाएगा, मानसिंह का नाम सबसे पहले आएगा. चंबल के लोगों के बीच किवदंती बन चुके मानसिंह ने डाकू होते हुए जो चरित्र और आदर्श स्थापित किया वह कई दशक तक चंबल के डाकुओं के लिए लक्ष्मण रेखा बनी रही. उत्तर प्रदेश के आगरा के खेड़ा राढौर गांव में जन्में मानसिंह चालीस के दशक में पारिवारिक रंजिस की वजह से डकैत बने और करीब 17 साल कर चंबल में राज करते रहे. मानसिंह के पौत्र जनरैल सिंह कहते हैं, “मानसिंह भूख की वजह से नहीं न्याय के लिए डाकू बने थे. तब वह जमीनदार थे और उनके पास 1000 एकड़ से ज्यादा जमीन थी.” मानसिंह के उपर 1112 डकैती और 185 हत्या के मामले दर्ज थे. मानसिंह गैंग की पुलिस से 90 बार मुठभेड़ हुई जिसमें 32 पुलिसवाले खाक हो गए. जबकि गैंग के भी 15 सदस्य मारे गए. अमीरों को लूटना और गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना मानसिंह का वसूल था. गैंग के सदस्यों को शराब और मांस से दूर रहने की शख्त हिदायत थी. मानसिंह के साथी रहे और लुक्का डाकू के नाम से मशहूर लोकमन दीक्षित कहते हैं, “हम लोग कभी किसी बहन बेटी के गहनों को हाथ नहीं लगाते थे. डाके के दौरान न ही किसी महिला का मंगलसूत्र लूटते थे. गैंग बेकसूर लोगों को कभी प्रताडित नहीं करता था.” पंचायत बुलाकर न्याय करना और इलाके की बहन बेटियों की शादी कराना मानसिंह की लोकप्रियता की एक प्रमुख वजह थी. मानसिंह ने राबिनवुड की अपनी जो छवि बनाई उसे आज हर डाकू ढ़ोने की कोशिश करता है. मानसिंह के गांव में उनका एक मंदिर भी बनाया गया है.
1957 में हुई पुलिस मुठभेड़ में मानसिंह मारे गए. गैंग की कमान रूपा पंडित के हाथ में आ गई. लेकिन और रूपा के बाद लुक्का ने गैंग की कमान संभाली. लेकिन बिनोवा जी पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. मानसिंह के बाद साठ के दशक में चंबल में डाकू सुल्ताना, पुतलीबाई और अमृतलाल का आतंक रहा. पुतलीबाई पहली महिला डाकू थी तो अमृतलाल पहला पिछड़ी जाति का दस्यु सरगना. ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय के राजनीति विग्यान विभाग के अध्यक्ष प्रो, एवीएस चौहान कहते हैं, “अमृतलाल ही वह पहला डकैत था जिसने चंबल में अपहरण की नींव डाली थी. 1964 में अमृतलाल ने कालेज के 13 छात्रों को अगवा कर उनसे फिरौती वसूली थी.” कल्ला और बाबू भी इसी दौर के डाकू थे. 70 और 80 के दशक में चंबल में कई सारे डाकू गैंग बने लेकिन अमृत लाल, मोहर सिंह, माधो सिंह, लाखन सिंह, मूरत सिंह, सरयू सिंह, नाथू सिंह, मलखान सिंह, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, छविराम, अनार सिंह पानसिंह तोमर, रमेश सिकरवार का गिरोह काफी चर्चित रहा. इस दौर के डाकू भी मानसिंह के सिद्दांतों पर चलने की कोशिश करते थे. पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, “हम लोग भी दाउ (डाकू सम्मान से मानसिंह को इसी नाम से पुकारते हैं.) आदर्शों पर ही चलते थे. गरीबों की मदद, बहन बेटियों की शादी कराना और मंदिर बनवाना डाकुओं का कर्तव्य होता था.” चंबल में हालांकि महिला डकैतों की हिस्सेदारी बहुत कम रही. लेकिन फूलन देवी, कुसमा, मुन्नी और सीमा परिहार ऐसी महिलाएं थी जिन्होंने हालात का शिकार हो कर हथियार उठाया. बिनोवा जी और जय प्रकाश नारायण की पहल और गांधीवादी विचाकर सुब्बाराव जी के प्रयास से 1962, 1972 और 1982 में सैकड़ों डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया. मोहर सिंह, मलखान सिंह, माधों सिंह और फूलन देवी आत्मसमर्पण करने वाले डाकुओं में ही शुमार थी.
लेकिन नब्बे के दशक के बाद चंबल पूरी तरह बदल गया. लोग अन्याय और शोषण के खिलाफ बंदूक उठाकर बागी तो बन जाते लेकिन इसके बाद वे पैसे के लिए अपराधों को अंजाम देने लगे. इसमें अपहरण और रंगदारी उनका मुख्य पेशा बन गया. डाकू और राजनीतिक की सांठगांठ बनी और वे एक दूसरे को हितों के लिए काम करने लगे. डाकू अपने ‘नेता जी’ के लिए बूथ कैप्चरिंग करने लगा. इस दौरान लालाराम, श्रीराम, हरिसिंह काछी, निर्भय गूजर, सलीम गूजर, दयाराम व बाबूराम गडेरिया, जगजीवन परिहार व ददुआ सक्रिय रहे. हालांकि अब चंबल में कोई बड़ा गैंग नहीं बचा है लेकिन छोटे छोटे दर्जनों गैंग सक्रिय हैं. चंबल और ग्वालियर इलाके में अभी अनूप गूजर सक्रिय है तो चित्रकूट-बांदा में ठोकिया गिरोह. राजनीतिक ध्रुवीकरण की वजह से सत्ता जैसे जैसे दलितों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ती गई तो चंबल में डाकुओं में भी नए समीकरण पैदा हुए, जाति के आधार पर गैंग बनने लगे. इसका वजह से यहां जातीय हिंसा की शुरुआत भी हुई. चंबल में अब अगड़ी जातियों के गैंग न के बराबर हैं. फूलन देवी से शुरु हुआ जातीय संघर्ष अब चरम पर पंहुच गया है. दिसबंर, 2004 में भावपुरा में दयाराम गड़ेरिया ने 14 गूजरों को मौत के घाट उतार दिया तो जगजीवन परिहार का यह एलान की वह सौ ब्राह्मणों की बलि देगा जातीय संघर्ष की एक झलक भर है.

नेता जी बचा लीजिए.


चंबल के डकैतों और राजनीति का साथ बहुत पुराना है. जब डकैत रहे तो राजनीति के साए में और जब बीहड़ों से बाहर आए तो राजनीति में सक्रिय हो गए. आजादी के बाद से ही डाकुओं और नेताओं का गठजोड़ शुरु हो गया था. डकैतों को अपनी जाति और इलाके में दबदबा हुआ करता था. वे चुनावों में खास पार्टी और नेता के पक्ष में न केवल प्रचार करते थे बल्कि उनके पक्ष में वोट देने की अपील भी करते थे. लेकिन पिछले दो दशकों में चंबल में डाकुओं और राजनातिज्ञों का एक ऐसा गठजोड़ तैयार हो गया है जो एक दूसरे के हितों के लिए काम कर रहा है.

जब देश आजाद हुआ और पहला आम चुनाव हुआ तो चंबल के डकैतों ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया. यह सिलसिला आज भी जारी है. जाहिर है जब डाकू नेता को चुनाव जितवाएंगे तो उनसे अपना सरंक्षण भी चाहेंगे. चंबल के सबसे चर्चित दस्यु सरगना मानसिंह के पौत्र चौहत्तर वर्षीय जनरैल सिंह कहते हैं, "दूसरे आम चुनाव में मानसिंह सहित दूसरे बागियों ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया" तो सत्तर के दशक में चंबल में आतंक के पर्याय रहे पूर्व दस्यु सरगना मोहर सिंह कहते हैं, "राजमाता विजय राजे सिंधियां उनसे मिलीं और चुनाव जिताने का अनुरोध किया." कभी नेताओं के लिए वोट बटोरने वाले कई डाकू आत्मसमर्पण के बाद राजनीति में सक्रिय हो गए. भिंड के मेहगांव नगर पालिका के 10 साल तक चेयरमैन रहे पूर्व डकैत मोहर सिंह कांग्रेस में सक्रिय हैं. जबकि पूर्व दस्यु सरगना मलखानसिंह भी दस साल से निर्विरोध सरपंच हैं. वह मध्य प्रदेश से राष्ट्रीय समानता दल से विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं. जब कि मानसिंह के बेटे तहसीलदार सिंह भी भाजपा से मुलायसिंह के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं. इसके अलावा चंबल इलाके में कई डाकू सजा से बरी होने के बाद राजनीति में सक्रिय हैं और प्रधान या सरपंच बने हुए हैं.
अस्सी के दशक तक चंबल में सक्रिय गिरोहों के सरदार आमतौर पर सवर्ण हुआ करते थे. लेकिन इस दौरान जिस तरह से राजनीति में बदलाव आया और पिछड़े और दलित गोलबंद होकर एक नई राजनितिक ताकत के रूप में उभर कर सामने आए. ग्वालियर स्थित जीवाजी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. एपीएस चौहान कहते हैं, “राजनीति में पिछडी जातियों और दलितों के ध्रुविकरण का असर चंबल में भी हुआ. नतीजन अब अधिकतर डाकू गिरोह जातीय आधार पर बनने लगे हैं” लिहाजा गडेरिया और जाटव गिरोहों का उदय हुआ. दयाराम गड़ेरिया, ददुआ व निर्भय गूजर पिछड़ी जाति के थे. तो ठोकिया वह अनूप गूजर भी पिछडी जाति के हैं. जबकि नाथू जाटव दलित था. भिंड में सक्रिय मेवाराम जाटव भी दलित ही है. इन डकैतों को अपनी अपनी जाति के नेताओं का संरक्षण रहता है.
पहले डकैतों के कुछ आदर्श हुआ करते थे और तब राजनीति भी इतनी गंदी नहीं थी. लेकिन आज डकैतों और नेताओं के नैक्सस ने मिल कर बीहड़ में अपहरण उद्योग को जन्म दे डाला है. पूर्व विधायक और कई डाकुओं के आत्म समर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले परशुराम भदौरिया कहते हैं, "अगर चंबल में दस्यु समस्या खत्म नहीं हो रही है तो इसकी एक बड़ी वजह हमारे जनप्रतिनिधि हैं. ये अपने स्वार्थ के लिए डाकू पैदा करते हैं." वहीं पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, "नेता और पुलिस डकैतों को संरक्षण दे रहें हैं और बदले में डकैतों की लूट से हिस्सा लेते हैं." राजनेताओं और डाकुओं के कितने गहरे संबंध हैं इस बारे में मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, "जब जगजीवन परिहार और पुलिस की मुठभेड़ चल रही थी तो उसने कई स्थानीय नेताओं के अलावा मध्य प्रदेश के एक बड़े बीजेपी नेता को फोन कर कहा कि 'नेता जी इस बार बचा लो' आप को कभी चुनाव नहीं हारने दूंगा." बुंदेलखंड का 'बीरप्पन' कहे जाने वाले ददुआ को पहले बसपा और बाद में सपा का संरक्षण प्राप्त था. नेता डाकुओं को पुलिस से संरक्षण देते हैं और बदले में डाकू उनके लिए वोटों का जुगाड़ करते हैं. लेकिन अब डाकुओं को लगने लगा है कि अगर वे नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए वोटों का जुगाड़ कर सकते हैं तो खुद के लिए क्यों नहीं. शायद यही वजह है कि ददुआ ने अपने भाई को सपा से विधानसभा का चुनाव लड़वाया और बेटे को सपा से जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाया. डकैत सरगना ठोकिया ने भी उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी मां को राष्ट्रीय लोकदल से चुनाव लड़वाया था. डकैत अब लोकतंत्र पर डाका डालने की कोशिश कर रहे हैं. भविष्य में डाकू और राजनीति का यह गठजोड और खतरनाक शक्ल अख्तियार करेगा.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।