निठारी में सब कुछ सामान्य लग रहा था. शाम ढल चुकी थी और लोग काम से वापस लौट रहे थे. दुकानें खुली हुई थी और गलियों में चहल पहल थी. शोरगुल करते बच्चे और घर के बाहर दरवाजे पर बातों में मशगूल महिलाएं यह एहसास करी रही थीं कि "खूनी कोठी" का भय अब निठारी के लोगों के मन से निकल चुका है. लेकिन उन संकरी और कीचड़भरी बदबूदार गलियों में थोड़ा आगे चलने पर हमारा यह भ्रम काफूर हो जाता है. निठारी पीड़ितों से मिलने पर यह एहसास हुआ कि नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके मन में खूनी कोठी का खौफ और अब बढ़ गया है. पहले पुलिस और बाद में सीबीआई के मोनिंदर सिंह पंधेर को बचाने से निठारी पीड़ित पहले ही सकते में थे. लेकिन नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके जख्म फिर से हरे हो गए हैं. उनके जेहन में बार बार यह सवाल घूम रहा है, "क्या नंदलाल बिक गया?" "क्या पंधेर ने उसे खरीद लिया?" "क्या पंधेर को सजा हो पाएगी?" "क्या वाकई सीबीआई भी पंधेर को बचा रही है? "
निठारी के लोग जब इन सवालों का जवाब ढूढने की कोशिश करते हैं तो उनका मन सिहर उठता है. पहले पुलिस की लापरवाही और फिर बाद में सीबीआई द्वारा पंधेर को क्लीन चिट देने से न्याय की उम्मीद पाले निठारी पीड़ित निराश हो गए थे. इस दौरान नंदलाल एक ऐसा 'हीरो' बन कर सामने आया जिसकी गवाही पर ही पंधेर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हुआ. इससे निठारी पीड़ितों को न्याय की आस बंधी. लेकिन हाल ही में नंदलाल के अपने पूर्व के बयान से मुकर जाने से निठारी पीड़ित अवाक हैं. उन्हें संदेह है कि मोनिंदर सिंह पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. खूनी कोठी की भेट चढ़ चुकी रिम्पा हलधर के पिता और निठारी कांड के एक प्रमुख गवाह अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. वह सरासर झूठ बोल रहा है. जब पंधेर ने पुलिस को हत्या वाली आरी बरामद कराई थी तो नंदलाल के साथ मैं भी वहां मौजूद था." अनिल हलधर ने सीबीआई की विशेष अदालत में एक याचिका दायर कर नंदलाल के खिलाफ झूठा साक्ष्य पेश करने का मामला दर्ज करने की अपील भी की है.
नंदलाल दरअसल निठारी कांड का सूत्रधार और मुख्य गवाह हैं. सीबीआई ने निठारी मामले की जांच के बाद अदालत में जो चार्जसीट दायर की थी उसमें नौकर सुरेंदर कोली को तो हत्या और बलात्कार का आरोपी बनाया गया था लेकिन मोनिंदर सिंह पंधेर को नहीं. तब नंदलाल ने सीबीआई पर अपने बयान को गलत तरीके से पेश करने और पंधेर को बचाने का संगीन आरोप लगाया था. 18 जून, 2007 को उसने अदालत में प्रार्थनापत्र दाखिल कर कहा था कि उसे पंधेर की तरफ से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, लिहाजा उसका बयान फौरन दर्ज कराया जाए. इस आधार पर गाजियाबाद स्थित विशेष सीबीआई अदालत में 6 जुलाई, 2007 को नंदलाल का बयान दर्ज कराया गया. तब नंदलाल ने अदालत को बताया कि निठारी कांड के खुलासे से पहले 3 दिसंबर, 2006 को जब उसकी शिकायत पर कोली और पंधेर को पुलिस गिरफ्तार करके थाने लाई तो उसने पंधेर के मैनेजर को तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को रिश्वत देते देखा था. इसके अलावा 29 दिसबंर, 2006 को निठारी कांड के खुलासे के बाद पंधेर ने जब पुलिस को वह आरी बरामद कराई जिससे वह लड़िकयों की हत्याएं किया करता था, उस वक्त वह वहां मौजूद था.
नंदलाल के इस बयान के आधार पर ही अदालत ने तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज गैर जमानती वारंट जारी किया. साथ ही पायल मामले में सीबीआई को पंधेर के खिलाफ भी हत्या और बलत्कार का मामला दर्ज करने का आदेश दिया. लेकिन 15 नंबर, 2007 को जिरह के दौरान नंदलाल अपने इस बयान से पलट गया. अदालत में उसने कहा कि न तो उसके सामने आरी बरामद की गई थी और न ही उसने दिनेश यादव को किसी से रिश्वत लेते देखा था. इससे पहले इस लेखक से बात करते हुए नंदलाल कई बार दिनेश यादव और सीबीआई पर पंधेर को बचाने का आरोप लगा चुके हैं. लेकिन अब नंदलाल कहते हैं, "दिनेश यादव ने ही तो मामले का पर्दाफाश किया था." नंदलाल के विरोधाभाषी बयानों का विश्लेषण करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी केपी सिंह कहते हैं, "बयान पलटने से तो पहली नजर में यही साबित होता है कि नंदलाल दिनेश यादव और पंधेर को फायदा पहुंचाना चाहता है. इससे आरोपी को 'बेनिफिट आप डाउट' का लाभ मिल सकता है. लेकिन अभी इस पर सुनवाई हो रही है इसलिए यह अदालत के रुख पर निर्भर करेगा. अगर अदालत यह समझती है कि गवाह बदनीयती से जानबूझ कर अपने बयान से मुकर रहा है तो उसे सजा भी दे सकती है."
निठारी की गलियों की खाक छानने से पता चला कि गवाहों को तोड़ने और खरीदने की कोशिश की जा रही है. मुख्य गवाहों में से एक अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने सौदेबाजी के लिए मेरे पास भी एक आदमी को भेजा था. वह लगातार तीन दिन मेरे पास आकर गवाही न देने के लिए रूपये की पेशकश करता रहा. इतना ही नहीं पंधेर के खिलाफ बयान न देने के लिए सीबीआई भी मुझे कई बार धमका चुकी है." तो झब्बू लाल कहते हैं, "निठारी के ही कुछ लोग पंधेर से मिले हुए हैं. वह लोगों को बयान बदलने के लिए रूपयों की पेशकस कर रहे हैं." जबकि निठारी पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा ठाकुर कहती हैं, "पंधेर का बेटा मेरे घर का चक्कर लगा रहा है. वह मेरे पास भी बातचीत के लिए संदेश भिजवा रहा है." वे आगे कहती हैं, "इससे पहले खुद को पूर्व राजदूत बताने वाले एक सरदार जी मेरे घर आए थे. वे मुझे धमका कर गए कि मैं पंधेर का कुछ नहीं बिगाड़ सकती."
निठारी मामले में सीबीआई की भूमिका शुरु से ही विवादों में घिरी रही. निठारी पीड़ित सीबीआई पर बार बार पंधेर को बचाने का आरोप लगाते रहे हैं. सीबीआई ने अब तक 11 मामले में चार्जसीट दायर की है जिसमे सभी में पंधेर को क्लीनचिट दी गई है. पायल के बाद पिंकी सरकार मामले में भी अदालत ने सीबीआई को कटघरे में खड़ा करते हुए उसे पंधेर के खिलाफ हत्या और बलात्कार के अलावा अपहरण, षडयंत्र और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज करने का आदेश दिया है. जबकि पिंकी सरकार मामले में अपनी चार्जसीट में सीबीआई ने पंधेर को क्लीन चिट दे दी थी. इससे पहले पिंकी सरकार के पिता स्वर्गीय जतिन सरकार की अपील पर अदालत ने सीबीआई को इस मामले में दुबारा जांच का आदेश भी दिया था. बाद में जतिन की पं बंगाल के मुर्शिदाबाद में संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी.
निठारी कांड के मुख्य गवाह जतिन सरकार की पत्नी वंदना सरकार ने अपने पति की मौत के लिए सीबीआई को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रिम कोर्ट में याचिका भी दायर की है. अदालत के आदेश पर इस मामले में सीबीआई निदेशक विजय शंकर तिवारी, एसपी एसजेएम गिलानी और निठारी के तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को नामजद किया गया है. लेकिन इसके बावजूद सीबीआई लोगों को धमकाने से बाज नहीं आई. वंदना सरकार के वकील और सुप्रिम कोर्ट के अधिवक्ता भानू प्रताप सिंह धाकरे को भी सीबीआई फर्जी केस में फंसाने की धमकी दे रही है. श्री धाकरे गुस्से में कहते हैं, "सीबीआई की हिमाकत देखिए कि उसने मुझे धमकाने के लिए अपने एक इंसपेक्टर अजय सिंह और चार गुर्गों को भेजा था. मैंने अजय सिंह के खिलाफ नोएड़ा के सेक्टर- 39 के थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई है." इसके अलावा पीड़ित अरुण सरकार, झब्बूलाल और करणबीर ने भी अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई के वकील पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. याचिका में कहा गया है, "सीबीआई महत्वपूर्ण गवाहों की बजाए अनौपचारिक व असंबंधित गवाहों को ही सम्मन कर अदालत के सामने पेश कर रही है. ऐसा लगता है कि सीबीआई के वकील महत्वपूर्ण गवाहों और वादी मकदमा के बयान न कराकर इसका लाभ अभियुक्त पक्ष को देना चाहते हैं." इसके अलावा याचिका में तीनों ने दिनेश यादव और पंधेर पर आरोप लगाया है कि वे उसे बयान बदलने के लिए रूपयों का लालच दे रहे हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसा न करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा रही है.
सीबीआई की पोल धीरे धीरे खुलने लगी है. पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान पंधेर और कोली ने पायल और दूसरी गायब लड़कियों और बच्चों के यौन शोषण के बाद हत्या की बात स्वीकार की थी. यह इकबाले जुर्म पुलिस की जनरल डायरी और पायल की केस डायरी में दर्ज है. सीबीआई इसे हमेशा छुपाने की कोशिश करती रही. यह पंधेर के खिलाफ पुख्ता सबूत है. बाद में स्वर्गीय जतिन सरकार ने इसे अदालत में जमा कराया था. जबकि निठारी मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी डीएसपी दिनेश यादव ने इसे तब सीबीआई को सौंप दिया था. दिनेश यादव के वकील नाहर सिंह यादव ने सीबीआई की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "मेरे मुवक्किल दिनेश यादव के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल किया था. जिसका विवरण जनरल डायरी और केस डायरी में दर्ज है. दिनेश यादव ने इसे सीबीआई को सौंप दिया था. अदालत में हमने सीबीआई से इसकी प्राप्ति की रसीद भी जमा करा दी है." लेकिन सीबीआई के प्रवक्ता जी मोहंती इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "सीबीआई निठारी पीडितों को न्याय दिलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है."
आखिर जब पुलिस के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल लिया था तो सीबीआई ने उसे क्लीन चिट कैसे दे दी? यही वह सवाल है जो निठारी पीड़ितों को ही नहीं समूचे देशवासियों को मथ रहा है. एक और सवाल जो निठारी के लोगों के जेहन में बार बार घूम रहा है कि अगर पंधेर निर्दोष है तो वह लोगों को धमकिया क्यों दे रहा है? बयान बदलने और गवाही से मुकरने के लिए रूपयों की पेशकश क्यों कर रहा है? इस सवाल के जवाब में ही पंधेर के गुनहगार होने का सुबूत छुपा हुआ है.
Wednesday, 5 December 2007
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About Me
- Anil Pandey
- अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।
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