Wednesday, 5 December 2007

जमीन डूबी यहां हमारी, बांध की मछली कैसे तुम्हारी

ढलता सूरज उनमें स्फूर्ति और उत्साह भर देता था. जैसे ही सूरज पश्चिम की ओर अपना रुख करता चंपालाल जैसे सैकड़ों मछुआरे नाव और जाल के साथ सूरज के पीछे हो लेते. और जब सूरज बादलों के पार चला जाता तो वे तवा नदी में जाल लगा कर सुबह के इंतजार में वापस लौट आते... और जब सुबह सूरज नदी में अठखेलियां शुरु करता तो वे जाल में फंसी मछलियों से अपने भविष्य के सुनहरे सपने बुनते. चंपालाल जैसे लोग जिनके घर बार तवा बांध की भेंट चढ़ गए हों, खेत और खलिहान विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए हों, उनके लिए तो मछली ही जीवन की डोर है, इसी में उनका भविष्य बसता है. लेकिन अब ढलता सूरज चंपालाल और उनके साथियों को उत्साह और स्फूर्ति से नहीं भरता बल्कि उन्हें अंधकारमय भविष्य की चिंता और अवसाद से भर देता है.

आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने चंपालाल और दूसरे विस्थापित मछुआरों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इस सवाल के उत्तर के लिए आप को हमारे साथ मध्य प्रदेश के होशगांबाद जिले के केसला में स्थित तवा विस्थापित आदिवासी मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ (तवा मत्स्य संघ) के कार्यालय चलना होगा. जहां सहकारिता के एक सफल प्रयोग का गला घोटा जा रहा है. इसने साबित किया कि प्राकृतिक संसाधनों पर अगर स्थानीय लोगों को अधिकार मिलता है तो सरकारी व निजी तंत्र के मुकाबले कहीं बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है. इन संसाधनों के जरिए वे अपना विकास भी कर सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण भी. इसी सिद्धांत के तहत संघ ने स्थानीय मछुआरों को ठेकेदारों के शोषण से मुक्त कर उन्हें आत्म निर्भर बना दिया. संघ के मछली डीपो के प्रबंधक रूपेश बाथरी कहते हैं, "पहले भुगतान लेने मछुआरे हमारे पास पैदल आते थे लेकिन अब वे मोटरसाइकिल से आते हैं." कभी लोगों के हूजूम से रौशन रहने वाले संघ के मछली डीपों में अब विरानगी का आलम है. जबकि मछुआरे चंपालाल कहते हैं, "संघ के बंद होने से उनकी रातों की नींद उड़ गई है. न तो इनके पास खेत है और न ही कोई रोजगार. संघ को मछली बेचकर वे अपना भरण पोषण करते थे. लेकिन अब तो मछली पकड़ने पर ही रोक लगा दी गई है."



दरअसल तवा मत्स्य संघ तवा बांध से विस्थापित स्थानीय आदिवासियों की सहकारी संस्था है. जो स्थानीय मछुआरों के सहयोग से तवा जलाशय में मछली उत्पादन और विपणन कार्य करती थी. लेकिन करीब नौ महीने से सरकार ने इससे जलाशय से मछली उत्पादन और विपणन का अधिकार वापस ले लिया है. तवा बांध बनने से करीब 44 गांव डूब गए. इससे 4000 परिवार प्रभावित हुए हैं. 1974 में बने इस बांध से उजड़े लोगों को सरकार ने न तो उचित मुआवजा दिया और न ही इन्हें ठीक से पुनर्वासित किया. मछली का शिकार ही इनकी रोजी रोटी का जरिया है. लेकिन कानूनन ये लोग बांध में मछली का शिकार नहीं कर सकते है, क्योंकि इस पर सरकार का अधिकार होता है. सरकार यह काम ठेकेदारों से ठेके पर करवाती है. पहले ठेकेदार के तहत ही ये लोग मछली का शिकार करते थे. लेकिन ठेकेदार इनका जम कर शोषण करता था. इनसे वह मामलू दामों पर मछली खरीदता था और भारी मुनाफे के साथ वह लोगों को बेचता था. मछुआरों को खाने के लिए भी मछली ठेकेदार से खरीदनी पड़ती थी. चंपालाल बताते हैं, "एक बार ठेकेदार ने मछली चोरी के शक में उनकी इतनी पिटाई की की वे महीनों बिस्तर पर रहे. ठेकेदार के गुंडे जलाशय की निगरानी रखते. वे हमारे घरों में जाकर तलाशी भी लेते. अगर कोई मछली पकाते मिल जाता तो उसकी धुनाई की जाती."

लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने दिसंबर 1996 में तवा मत्स्य संघ को सहकारिता के जरिए तवा बांध के मछली के शिकार, विपणन और प्रबंधन की जिम्मेदारी देते हुए पांच साल का अनुबंध किया. यह प्रयोग सफल रहा और इसने मछुआरों को ठेकेदोरों से दुगनी कीमत देनी शुरु की. इसके अलावा साल के आखीर में लाभांश को बोनस के रूप में मछुआरों को बांट दिया जाता था. संघ के पास 10 साल तक तवा बांध का ठेका रहा. इस दौरान उसने अपना उत्पादन कई गुना बढ़ाया. पहले जहां मछुआरों को ठेकेदारों से साल में करीब सात लाख रूपये की कमाई होती थी. वहीं संघ के आने के बाद यह कमाई 40 लाख रूपये तक होने लगी. संघ के आंकड़ें बताते हैं कि 10 साल में उसने सरकार को रायल्टी के रूप में 1.39 करोड़ रूपये अदा किए. संघ मुनाफे में था. मुनाफे को वह बोनस के रुप में मछुआरों को बांट देता था. संघ हर साल वह करीब सवा करोड़ का कारोबार करता था. जिसमें से करीब 20 लाख रायल्टी के रूप में सरकार और करीब 45 लाख मेहनाते के रूप में मछुआरों की जेब में जाते थे. संघ इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि मछली का शिकार उतना ही किया जाए जिससे जलाशय के पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरण को नुकसान न हो.
तवा मतस्य संघ की वजह से वन विभाग और सरकारी अधिकारियों को ठेकेदारों से मिलने वाली मोटी कमाई बंद हो गई. संघ के सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कहते हैं, "बड़े जलाशयों के ठेके का पैसा बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक जाता है. लेकिन तवा से उन्हें कुछ हासिल नहीं होता था. लिहाजा सरकारी अमला तवा मत्स्य संघ के खिलाफ हो गया." अधिकारियों ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी गुमराह किया. तवा और बरगी मत्स्य संघ के बारे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं, "वहां के बारे में हमें कई तरह की अनिमियताओं की शिकायतें मिली हैं." मध्य प्रदेश में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर ही करीब 30 बड़े और 135 मध्यम दर्जे के बांध प्रस्तावित हैं. जाहिर है बांधों के मछली के ठेके की आड़ में अधिकारियों की मोटी कमाई होगी. तवा में जिस तरह से सहकारिता का प्रयोग सफल हो रहा था उससे इन अधिकारियों को लगने लगा कि कहीं इसे समूचे राज्य में न लागू कर दिया जाए. लिहाजा इस बार उन्होंने तवा बांध को आरक्षित वन क्षेत्र में शामिल होने का सहारा लेकर इसमें मछली के शिकार पर रोक लगा दी है. यही वजह है कि दिसंबर, 2006 में संघ का अनुबंध फिर नहीं बढ़ाया गया. तवा बांध सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभ्यारण और पंचमढ़ी अभ्यारण से घिरा हुआ है. कुछ समय पहले सरकार ने इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल करते हुए टाईगर रिजर्व एरिया घोषित कर दिया. लिहाजा वन्य प्राणी संरक्षण कानून के तहत यहां मछली का शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया. फिलहाल यह मामला सुप्रिम कोर्ट में है.

तवा जलाशय में जब मैने नाव के जरिए घूम कर पड़ताल की तो पाया कि प्रतिबंध के बावजूद मछली का शिकार रुका नहीं है. वन अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर मछली की चोरी हो रही है. स्थानीय मछुआरों से भी वन विभाग वसूली कर रहा है. चंपालाल बताते हैं, "वन विभाग के लोगों ने उनके भाई को मछली का शिकार करते हुए पकड़ लिया और 1500 रिश्वत लेने के बाद छोड़ा." जबकि तवा के वन संरक्षक एस एस राजपूत उल्टे तवा मत्स्य संघ पर आरोप लगाते हुए कहते हैं," संघ मछली की चोरी कर रहा है. इसके खिलाफ कार्रवाई के लिए हमने शासन से सिफारिश भी की है." दरअसल तवा बांध की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जलाशय के दो छोर पर जंगल है, जिस पर वन विभाग का अधिकार है. इन इलाकों में बाहरी लोग आकर मछली का शिकार कर रहे हैं. यह भी सही है कि स्थानीय मछुआरे भी, जो तवा मत्स्य संघ से जुड़े रहे हैं, मछली का शिकार कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इसके अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है. सरकार उन्हें चोर बनने के लिए मजबूर कर रही है.
तवा मत्य संघ के कार्यों की प्रशंसा देश की गरीबी पर अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो नीलकंठ रथ ने भी की है. अहमदाबाद स्थित संस्थान सेंटर फार इनवारमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नालॉजी ने तवा मत्स्य संघ पर शोध किया और इसके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दोहन के बीच संतुलन कायम करने के इसके कार्यों की प्रशंसा की. प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायणन की अध्यक्षता में बनी टाइगर टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में तवा मत्स्य संघ के कार्यों की सराहना करते हुए इसे एक मॉडल के रूप में पेश किया है कि कैसे स्थानीय लोगों की मदद से पर्यावरण व वन्य जीवों का संरक्षण किया जा सकता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में तवा और महाराष्ट्र के पेंच बांध की तुलना भी की है. रिपोर्ट के मुताबिक वन संरक्षण कानून के तहत पेंच जलाशय में भी मछली के शिकार पर रोक लगा दी गई है. लेकिन असलियत यह है कि वहां मछली चोरों का संगठित गिरोह तैयार हो गया है जो गैरकानूनी रूप से वहां मछली का शिकार कर रहा है.

लाल फीता शाही का दूसरा उदाहरण बरगी जलाशय है. तवा से पहले ठेकेदारों ने सरकारी अधिकारियों से मिल कर बरगी बांध विस्तापित मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ के भी ठेके को रद्द करवा दिया था. बरगी मत्स्य संघ के संयोजक राजकुमार सिन्हा कहते हैं, "ठेकेदारी के बाद संघ के मुकाबले औसत मत्स्य उत्पादन घटा है. यह सालाना 430 मीट्रीक टन से घट कर अब 181 मीट्रिक टन हो गया है. सरकार का दोहरा चरित्र देखिए की वह बरगी मत्स्य संघ के लिए तो वह सालाना 700 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का काफी ऊंचा लक्ष्य रखती है, जबकि ठेकेदार को केवल 300 मीट्रिक टन का लक्ष्य दिया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि लक्ष्य न हासिल कर पाने पर संघ का अनुबंध खत्म करने का उन्हें बहाना मिल जाए." 1994 से 2001 तक मछली शिकार का ठेका तवा संघ की तर्ज पर बर्गी मत्स्य संघ के पास था.
सरकारी अधिकारी कैसे ठेकेदारों के हित में काम करते हैं, बर्गी इसकी मिसाल है. 3 सितंबर, 2007 को मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें यह फैसला हुआ कि बांधों में मछली के शिकार का ठेका ठेकेदारों को न दे कर स्थानीय मछुआरों के फेडरेशन को दिया जाए. जैसा कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ हैं. इस बैठक में प्रमुख सचिव (मछली पालन), नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) के उपाध्यक्ष और राज्य मत्स्य महासंघ की प्रबंध निदेशक मौजूद थी. राज्य मत्स्य महासंघ ही बांधों के जलाशयों में मछली के ठेके आदि देती है. इस फैसले का उलंघन करते हुए 13 सितंबर, 2007 राज्य मत्स्य महासंघ ने बर्गी जलाशय का ठेका बर्गी मत्स्य संघ को देने की बजाए पुराने ठेकेदार को दे दिया. सरकार ने इसकी जांच के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई. कमेटी ने जांच में पाया कि राज्य मत्स्य महासंघ ने ठेका देने में अनियमितता बरती है. लेकिन महासंघ के अधिकारी अब अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए इस कमेटी की रिपोर्ट को झूठा ठहराते हुए फिर से जांच के लिए अपने एक महा प्रवंधक डीके वापना को बर्गी भेजा. महासंघ की करतूतों को भांप कर बड़ी संख्या में मछूआरे उनसे बात करने पहुंचे. लेकिन वापना उनसे बात किए बगैर ही वापस लौट गए. इस बारे में मछुआरों ने राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से शिकायत भी की है. इससे साबित होता है कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ के सहकारिता के सफल प्रयोगों को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए बलि का बकरा बना दिया. अगर ठेकेदार के शोषण से आजिज आकर ये लोग बंदूक उठा लें, तो इसका जिम्मदार कौन होगा?

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।