Monday, 31 December 2007

कहां है दलितों की सरकार...

दलित...यह एक ऐसा शब्द है, जो सदियों से नफरत और हिकारत का पर्याय रहा है. हजारों सालों से वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से शोषित होता आ रहा है. वह अपने वोट की ताकत से लोगों को सत्ता में पहुंचाता रहा, लेकिन खुद सत्ता से बहुत दूर, सामाज के अंतिम पायदान पर खड़ा रहा. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार दलितों के राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है. यहां अब दलितों की सरकार है. बसपा सरकार के शासन में दलित खुद को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं, क्या उनके जीवन में कोई बदलाव आ रहा है...इसी का जायजा लेने के लिए मैं एक सप्ताह तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर था. जो देखा वह आप के सामने हैं....

मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटी उस पच्चीस साल की दलित विधवा सुनीता की सूरत बार-बार आखों के सामने आ जाती..वह दो बच्चों की मां थी. ऐसे बच्चे, जिनके सिर से बाप का साया उठ चुका है. दिसंबर की गुलाबी ठंड में बिना गर्म कपड़ों के वे बच्चे... "जब बाप ना बाय, तो गरम कपड़ा के दिआई???" एक मां की दुख भरी आवाज बार बार कानों में कचोट रही थी. वोट किसे देते हो? "हाथी पे..." क्यों देते हो? "इ हमार पार्टी है." मायावती को जानते हो...? "हां, स्कूल में मास्टरनी हैं.. " कांशीराम को जानते हो? "इ के है?... रहुला के चाचा हैं." सरकार से क्या चाहते हो?.. "अंतोदय कार्ड.."

सुनीता दो बार से बसपा को वोट दे रही है, अब उसकी सरकार है. क्या उसकी एक छोटी-सी ख्वाहिश भी पूरी नहीं हो सकती? उसके सपने केवल अंत्योदय कार्ड तक सिमट के रह जाते हैं. सुनीता कहती हैं, "बीडीओ साहब से कह कर हमारा कार्ड बनवा दीजिए. कम से कम दो जून की रोटी तो मिल जाएगी. नहीं तो मर जाएंगे." पति के इलाज के लिए सुनीता ने खेत गिरवी रख दिया था. फिलहाल, वह दूसरे के खेतों से बथुआ लाकर बच्चों का पेट पाल रही है. मेरे जेहन में बार-बार यह सवाल घूम रहा था. सुनीता बथुआ का साग खिला कर कब तक अपने बच्चों को जिंदा रख पाएगी? क्या बसपा सरकार में उसके हालात बदलेंगे? यह सोच ही रहा था कि ड्राइवर की तेज आवाज से मेरा ध्यान भंग होता है. "साहब, अंबेडकर गांव का बोर्ड लगा है, गाड़ी मोड़ दूं?" मेरे सामने राज्य की राजधानी लखनऊ से महज 30 किलोमीटर दूर शिवपुरी गांव की सुनीता की बातें फ्लैशबैक की तरह घूम रही थी.

हम अंबेडकर बस्ती की तरफ मुड़ जाते हैं. मैं मायावती सरकार के छह महीने बीतने के बाद लोकतंत्र के उस उत्सव की खुशी की तपिश महसूस करने निकला था जिसे दलितों ने अपने वोट से साकार किया था. पहली बार पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार बनी है. दलितों की सरकार... समाज के हाशिए पर खड़े सबसे गरीब आदमी की सरकार... जिसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी उसकी सरकार बनेगी. लेकिन इस यात्रा से महसूस हुआ बसपा सरकार बनने से दलित खुश तो हैं लेकिन फिलहाल उनके जीवन में बहुत कुछ बदला नहीं है. न ही उन्हें कोई उम्मीद है कि उनके जीवन में कोई बदलाव होगा. सुनीता जैसे लाखों लोग एक अदद बीपीएल और अंत्योदय कार्ड के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जिस पर उनका हक है. लेकिन गरीबों का हक मार कर गांव के दबंग लोगों ने बीपीएल और अंतोदय कार्ड बनवा लिया है. इस कार्ड के जरिए गरीब दलितों को हर महीने बहुत ही सस्ते में 35 किलो राशन मिल जाता है.
टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होते हुए हम अंबेडकर नगर के सीमई कारीरात गांव की अंबेडकर बस्ती में पहुंचते हैं. बस्ती तक पक्की सड़क है. अंबेडकर नगर संसदीय क्षेत्र से मायावती चुनाव लड़ती है. मायावती के राज्यसभा में जाने बाद फिलहाल इस संसदीय सीट पर सपा का कब्जा है, लेकिन इलाके के पांचों विधायक बसपा के हैं. सीमई कारीरात की दलित बस्ती की सूरत बिलकुल अलग है. यहां समृद्धि दिखाई देती है. बस्ती के ज्यादातर मकान पक्के हैं. लड़के और लड़कियां कालेज में पढ़ते हैं. कई लोग सरकारी नौकरी में हैं. जब इस बस्ती की तरफ देखता हूं तो दूर क्षितिज में फिर से सुनीता का असहाय चेहरा दिखाई देने लगता है...
सीमई कारीरात की दलित बस्ती में पहली बार पिछले साल मई में ‘डीजे’ आया था... अंबेडकर की आदमकद मूर्ति के सामने उस दिन रात भर नाच गाना हुआ... पूड़ी और खीर बांटी गई... युवाओं के साथ-साथ बुजर्गों ने भी ठुमके लगाए. यह कोई शादी का अवसर नहीं था. यह सदियों से सताए गए दलितों के सत्ता प्राप्ति का उत्सव था. प्रजा से राजा बनने की खुशी का अवसर था. पूरी बस्ती में वह खुशी आज भी दिखाई देती है. गांव के नौजवान अनिल गर्व से कहते हैं, "गांव के सवर्णों की अब पहले जैसी हिम्मत नहीं रही. कालेज में अभी हाल में झगड़ा हुआ तो हमने सवर्ण लड़कों को खूब पीटा और सीना चौड़ा करके घर आए. वे हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पाए." बगल में खड़े रिटायर शिक्षक और बस्ती के युवाओं को वैचारिक खुराक देने वाले बुधिराम कहते हैं, "बसपा की सरकार नहीं होती तो वे हमें दबा लेते. मायावती के मुख्यमंत्री बनने से अब हम सिर उंचा करके चल सकते हैं." सीमई कारीरात वही ऐतिहासिक गांव है जहां एक पल्ले वाले दरवाजे लगाए जाते हैं. लेकिन दलितों ने विद्रोह किया और यहां ब्राह्मणों के इस फऱमान की परवाह किए बिना कि "इससे शिव भगवान नाराज हो जाएंगे" अपने घरों में दो पल्ले वाले दरवाजे लगा रहे हैं. बसपा सरकार बनने के बाद यह सिलसिला और बढ़ गया है. सीमई कारीरात के लोग खुश हैं. उन्हें लगता है कि बसपा शासन में य़ुवाओं को रोजगार मिलेगा और उन्हें सम्मान. लेकिन मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश की अपनी एक सप्ताह की यात्रा के दौरान सीमई कारीरात जैसी दूसरी दलित बस्ती नहीं मिली. लेकिन हां, हर दलित बस्ती में सुनीता जैसी महिलाओं से जरूर रूबरू होना पड़ता था.
पूर्वी उत्तर प्रदेश में बिजली की जबरदस्त किल्लत है. अंधेरे को चीरते हुए हम शशि के घर पहुंचते हैं. घर के बाहर पुलिस का पहरा है. फैजाबाद के मिल्कीपुर में मोमबत्ती की रोशनी में हमारी मुलाकात शशि के पिता योगेंद्र कुमार से होती है. मोमबत्ती की लौ की तरह ही योगेंद्र की आंखे भी हिलती रहती हैं... कभी वे अंधेरे को देखते हैं तो कभी रोशनी को... लंबी चुप्पी के बाद वह अपनी बेटी शशि की हत्या का आरोप बसपा के पूर्व मंत्री आनन्द सेन यादव पर लगाते हैं. योगेंद्र बामसेफ के पुराने कार्यकर्ता हैं और कांशीराम के सपने को साकार करने और बसपा की सरकार बनवाने के लिए उन्होंने अपना बहुत कुछ स्वाहा किया है. वह कहते हैं, "बसपा के शासन में मेरी बेटी के हत्यारे खूलेआम घूम रहे हैं. जो मंत्री और विधायक मेरे घर पर आ कर कभी डेरा डाले रहते थे, वे अब मुझसे मुंह चुराने लगे है. जिस बसपा के लिए मैने कभी घर परिवार की चिंता नहीं, उसके शासन में मैं असहाय और लाचार महसूस कर रहा हूं. बात सुनने की बात तो दूर मायावती ने तो मुझसे मिलने से ही इनकार कर दिया." योगेंद्र कोई अकेले दलित नहीं हैं, जिन्होंने बसपा के लिए दिन-रात एक कर दिया और जब सरकार की मदद की जरूरत पड़ी तो उन्हें उपेक्षा ही मिली. दलितों का उत्पीड़न जारी है. तब भी पुलिस दबंगों का साथ देती थी और आज भी... बसपा शासन में भी दलित अपनी सामाजिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. लखनऊ के महिपत मऊं गांव के दलितों के घर में स्थानीय दंबग मुसलमानों ने घुस कर जम कर उत्पाद मचाया, महिलाओं और लड़िकयों से बलात्कार की कोशिश की. पीड़ित चंद्रिका प्रसाद कहते हैं, "अपराधियों पर पुलिस इसलिए कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, क्योंकि एक बसपा विधायक का उन्हें संरक्षण प्राप्त है." संकट की इस घड़ी में बसपा नेताओं ने भी इनसे किनारा कर लिया है... अपने भी पराए हो गए..
प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के भदेवरा गांव के दलित युवक चक्रसेन की गांव के दबंग ब्राह्मणों ने इसलिए हत्या कर दी थी कि उसका बीटेक में दाखिला हो गया था. चक्रसेन के परिवार के लोग स्थानीय बसपा विधायक पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हैं. जब चुनाव का बिगुल बजा तो भदेवरा के दलितों ने हर बार की तरह इस बार भी खुल कर बसपा का साथ दिया. जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उनके भी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन्हें लगा कि अब पंडित जी और बाबू साहब लोग उन्हें तंग नहीं करेगे. लेकिन कुछ दिन बाद ही उनका सपना काफूर हो गया. चक्रसेन के दादा शिव मूरत सहित बस्ती के लोग एक स्वर में कहते हैं, "यह दिन देखने के लिए थोड़ी हमने बसपा को वोट दिया था. अब हम लोग बसपा को वोट नहीं देंगे."
चक्रसेन का घर गांव के आखिरी छोर पर था. वैसे दलित बस्ती गांव के आखिरी छोर पर ही होती है. सवर्णों के घरों से काफी दूर... जब मैं चक्रसेन के घर पहुंचता हूं तो एक आदमी हमसे पूछताछ करने लगता है. पता चला वह हेड कांस्टेबल बुधराम सरोज हैं. चक्रसेन का परिवार पुलिस के सुरक्षा घेरे में है. मैं जब अपनी नोट बुक में पुलिसवालों का नाम नोट कर रहा था तो बुधराम धीरे से कहते हैं, "मेरे नाम के आगे एससी लिख लीजिए." पांच पुलिस वाले घर की रखवाली कर रहे हैं, एक कमरे के उस घर की, जिसमें कुछ है ही नहीं... बुधराम सरोज चक्रसेन के बूढ़े-लाचार दादा शिवमूरत की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "इनकी बहुत ही बुरी स्थिति है. घर में खाने तक को अनाज नहीं है." चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में लगे पांच पुलिसवालों में से तीन सवर्ण हैं, दो पंडित जी और एक ठाकुर साहब. जिस मड़ई में भैंस बांधी जाती थी, उसी में पांचो पुलिसवाले रह रहे हैं. खाना वे दलित बस्ती में ही एक साथ बनाते और खाते हैं. सवर्ण पुलिसवालों को एक गरीब दलित की सुरक्षा में लगना अखर रहा है. उनके चेहरे से यह साफ झलक रहा था... बुधराम सरोज कहते हैं, "अपने अब तक के कैरियर मैं मैने शिवमूरत जैसे गरीब आदमी को कभी पुलिस सुरक्षा मिलते नहीं देखा." शिवमूरत खुद मानते हैं, "अगर बसपा की सरकार न होती तो उन्हें पुलिस सुरक्षा नहीं मिलती." लेकिन वे आगे कहते हैं, "हमें पुलिस वालों की नहीं, न्याय की जरूरत है." बस्ती के लोग कभी जिन पुलिसवालों को देख कर छुप जाते थे, चक्रसेन के परिवार की सुरक्षा में उनकी तैनाती को वे एक अजूबा ही मानते हैं. आसपास के इलाके में इसकी चर्चा भी है.
रायबरेली कभी इंदिरा गांधी और अब सोनिया गांधी की वजह से जाना जाता है. घूमते-घूमते हम यहां के छतईंयां गांव की दलित बस्ती में पहुंचते हैं. अस्सी साल की अनपढ़ बुजर्ग महिला बिठाना इंदिरा गांधी के मुकाबले किसी को नेता नहीं मानती. सोनिया गांधी को वोट देने वाली बिटाना मायावती को चिल्ला चिल्ला कर खरी-खोटी सुनाती हैं और हवा में यह सवाल उछाल देती हैं, "मायावती अपना पेट भरेंगी कि हमारा?" शिवकुमार कहते हैं, "मेरे घर में पांच वोट हैं. वैसे तो हम सोनिया गांधी को चाहते हैं, लेकिन हर बार कम से कम दो वोट बसपा को जरूर देते हैं." ऐसा ही कुछ रवैया लखनऊ के शिवपुर गांव के दलितों का है. वे मुलायम के प्रशंसक हैं, लेकिन वोट बसपा को देते हैं. बाबूलाल पासी कहते हैं, "मुलायम सिंह की सरकार अच्छा काम करती है. लेकिन वोट मैं बसपा को ही देता हूं." यहां आकर बसपा की सफलता का राज समझ में आया. कांशीराम ने दलित और बसपा को एक दूसरे का पर्याय बना दिया है. यही वजह है कि दलित अब अपने को बसपा से अलग नहीं कर पाता. राम नरायण कहते हैं, “वह अगर किसी दूसरी पार्टी को वोट दे भी दें, तो लोग यकीन नहीं करते. उन्हें बसपा का ही माना जाता है.”

यह लखनऊ जिले के निगोहा गांव की अंबेडकर बस्ती है. हाल ही में इसे अंबेडकर बस्ती का दर्जा मिला है. मायावती सरकार का विकास कार्य यहां दिखाई देता है. 132 दलितों को घर बनाने के लिए पैसा मिल गया है. लेकिन भूमिहीन दलितों को पट्टा देने के लिए जमीन ही नहीं है. मायावती के सोशल इंजीनियरिंग की कामयाबी यहां दिखाई देती है. मैं दलित पंच गंगा सहाय के साथ गांव के प्रधान से मिलने जाता हूं. उनके घर के सोफे पर हम तीनों साथ बैठ कर बाते करते हैं और चाय पीते हैं. इस बारे में पूछने पर बसपा समर्थक गांव के प्रधान सुरेंद्र कुमार दीक्षित कहते हैं, "अब हम दलितों से बराबरी का व्यवहार करते हैं. मैं सर्दियों में अक्सर दलित बस्ती में जाकर वहां लोगों के साथ जमीन पर बैठ कर अलाव तापता हूं." उत्तर प्रदेश में कहीं-कहीं यह बदलाव दिखता, लेकिन बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर. अगर बसपा यह बदलाव लाने में कामयाब हो जाती है तो दलितों को वह सम्मान मिल जाएगा, जिसके लिए वे सदियों से संघर्ष करते आ रहे हैं. लेकिन आम दलित के लिए तो अभी यह सपने जैसा ही है.. हकीकत से बहुत दूर.. प्रतापगढ़ के गोपालपुर गांव के शिवबरन सरोज कहते हैं, "सवर्ण कभी नहीं चाहेंगे की हम उनकी बराबरी करें."

Saturday, 29 December 2007

जादुई आभा अब बिखरने लगी है...

बनारस की पहचान एक आध्यात्मिक और चमात्कारिक नगरी के रूप में है. भौतिकता और चमक-दमक से दूर रहने वाला यह शहर अपनी मस्ती और बेफिक्री के लिए भी जाना जाता है. लेकिन मिथकीय संदर्भों वाले इस शहर की जादुई आभा अब बिखरने लगी है....


बनारस के दुर्गाकुंड स्थित चाय की दुकान पर हर रोज लोगों को ठहाके लगाते देखना राबर्ट को अजीब लगता था. उसकी उलझन और बढ़ गई, जब उसने देखा कि यह सिलसिला तो दिनभर जारी रहता है. पहले उसे लगा कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य हैं. लेकिन उसकी हैरानी तब और बढ़ जाती है जब उसे पता चलता है कि ये लोग किसी "लाफिंग क्लब" के सदस्य नहीं, बल्कि बनारस के "सामान्य" लोग हैं. कोई वकील है तो कोई शिक्षक... कोई रिस्शा चलाता हैं को कोई फल बेचता है. आखिर एक दिन उसका धैर्य जवाब दे गया और उसने हिम्मत करके लोगों से उनकी हंसी का राज पूछ ही लिया. जवाब सुन कर अंग्रेज हैरत में पड़ गया. जिसे वह अबतक मिथक मानता था, वह एक हकीकत के रूप में उसके सामने था.
जवाब बड़ा ही सीधा था, लेकिन राबर्ट के लिए किसी पहेली से कम नहीं. लोगों ने राबर्ट को बताया कि वे लोग "वर्तमान" में जीते हैं, इसलिए उन्हें "भविष्य" की चिंता नहीं होती. यही उनकी खुशी और मस्ती का राज है. काशी के लोगों के लिए यह एक सामान्य सी बात है. भविष्य के प्रति चिंतित न होने से वह कुछ “खोने” और “पाने” के भय से मुक्त होता है. वह वर्तमान में जीता है और अतीत की जुगाली करता है. राबर्ट ने सुना था कि काशी के लोग मुफलिसी में भी बेफिक्री का जीवन जीते हैं. लेकिन वह इस पर कतई यकीन करने को तैयार नहीं था कि गरीबी और अभाव में भी भला कोई कैसे खुश रह सकता है? उसे यह सब कपोल कल्पना लगती थी, लेकिन बनारस आने के बाद उसका यह भ्रम दूर हो जाता है. उसे लोगों की मस्ती का, खुशी का राज पता चल गया था. उसे यह सब किसी जादू से कम नहीं लग रहा था.

बनारस की पहचान तो वैसे एक प्रचीन और आध्यात्मिक शहर की है, लेकिन यहां आने वाला हर कोई इसे अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है. यही वजह है कि इस शहर के साथ तमाम तरह के मिथक जुड़े हुए हैं. कोई इसे दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं के "म्यूजिमय" के रूप में देखता है तो कोई "मोक्ष की नगरी" के रूप में. कुछ लोग इसे "सुकुन का शहर" मानते है तो कुछ "भगवान शंकर का घर". बहुत सारे लोग इसे "मस्ती" और "बेफिक्री" के दुर्लभ शहर के रूप में भी देखते हैं. लेकिन ज्यादातर लोग इसे एक चमत्कारिक नगरी ही मानते हैं, जहां "कुछ" न होते हुए भी "बहुत कुछ" है. एक अलौकिक शांति.. अविस्मर्णीय दिव्य अनुभूति... मन को सुकुन देने वाले गंगा के प्राचीन घाट, मंदिर की घंटियां.. काशी विश्वनाथ का मंदिर, मोक्षदायिनी गंगा.. और गंदी तंग गलियों व भीड़भाड वाले इस शहर में एक अजीब सी खामोशी.. ऐसी खामोशी जो लोगों को घंटो ध्यान के बाद हासिल होती है. बनारस को जीने वाले विद्वान और हरिशचंद्र महाविद्यालय के हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. गया सिंह कहते हैं, "ये सब बाते मिल कर बनारस को एक जादुई व्यक्तित्व प्रदान करते हैं. बनारस से कई तरह के मिथक भी जुड़े हुए हैं और यह शहर अपने मिथकीय संदर्भों पर पूरी तरह से खरा भी उतरता है." वे आगे कहते हैं, "बनारस एक ऐसा विरला शहर है जिसकी गलियों में भारत बसा है. यहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोग रहते हैं."

बनारस के कई रंग हैं और कई रुप भी. पुराणों, वेदों और लोक कथाओं में बनारस के इन रूपों और रंगों का दर्शन होता है. एक मान्यता यह है कि बनारस भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिका हुआ है. इसीलिए यह दिव्य-आध्यात्मिक शहर है. "सुबहे बनारस" के रहस्य को भी लोग महादेव से जोड़ कर देखते हैं. बनारस के लोगों का कहना है कि सुबह सूर्य की किरणें बाबा विश्वनाथ के मंदिर से टकरा कर लोगों तक पहुंचती हैं, इसीलिए यहां के लोग ऊर्जावान व मस्त रहते हैं. पुराणों के मुताबिक काशी (बनारस का प्रचीन नाम) भगवान शंकर का निवास स्थान है. संस्कृति के विद्वान और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर आरसी पंड़ा कहते हैं, "काशी के बारे में यह वैदिक मान्यता है कि यहां के कण-कण में भगवान शिव का वास है. और जो लोग काशी में प्राण त्यागते हैं उन्हें शंकर और पार्वती खुद स्वर्ग से लेने आते हैं." काशी में मरने से मोक्ष प्राप्ति होती है, इसी धारणा की वजह से ही मणिकणिका घाट (गंगा किनारे स्थित श्मशान घाट) पर कभी चिता की राख ठंडी नहीं होती. काशी तुलसी, कबीर और रैदास जैसे महान संतों की जन्मभूमि भी रही है. तो अघोर कीनाराम और तैलंगास्वामी को यहां लोग महादेव का अवतार मानते हैं. इनके बारे में जितने मुंह उतनी बाते सुनने को मिलती हैं. लेकिन काशी में कोई विरला ही होगा जो इन्हें इतिहास का मिथकीय पात्र बताएगा. लोग इनके चमत्कारों से प्रभावित मिलते हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी के चमत्कारों की किवदंतियां बनारस की गलियों में बिखरी पड़ी हैं. कीनाराम और तैलंगास्वामी का नाम लोग बड़ी ही श्रद्दा से लेते हैं. उनकी समाधि स्थल पर देश के कोने-कोने से लोग दर्शन करने आते हैं.
बनारस अपनी जिंदादिली और मस्ती के लिए ज्यादा जाना जाता है. यही वह वजह है जिसकी वजह से दुनिया भर के लोग यहां आते हैं. जो लोग बनारस के बारे में नहीं जानते, वे इसे एक मिथक ही मानते हैं. बनारस के बारे में कहा जाता है कि जो यहां कुछ दिन रह गया उसका मन फिर दुनिया में कहीं नहीं लगता. मशहूर शहनाई वादक स्वर्गीय बिसमिल्ला खान से लेकर आईआईटी बनारस में प्रोफेसर रह चुके जानेमाने प्रर्यावरणविद डा वीरभद्र मिश्र को विदेशों में बेहतर सुख-सुविधाओं के साथ बसने के तमाम मौके मिले, लेकिन उन्होंने यह कर कभी बनारस नहीं छोड़ा कि उन्हें वहां "गंगा" कहां मिलेगी. अब प्रो. आर सी पंडा को ही ले लीजिए. उड़ियाभाषी पांडा 1988 में पुरी से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में लेक्चरर से रीडर बन कर इस उम्मीद से आए थे कि जल्दी ही वे अपने राज्य लौट जाएंगे. प्रो. पांडा कहते हैं, "लेकिन बनारस इतना भा गया कि अब इसे छोड़ने का दिल नहीं कहता. मुझे जेएनयू जैसे कई और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में नौकरी का मौका मिला, लेकिन मैने मना कर दिया, जबकि कैरियर के लिहाज से यह बेहतर विकल्प था."
प्रो. जे.एल शर्मा दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को रसायन विज्ञान पढ़ाते हैं. आध्यात्म और विज्ञान में हमेशा टकराव रहा है, लेकिन बनारस में यह टकराव दिखाई नहीं देता. गंगा के घाटों की अलौकिक शांति और बनारस की मस्ती प्रो. शर्मा को हर साल काशी जाने के लिए मजबूर कर देती है. 25 साल से यह सिलसिला जारी है. वे इसे एक जादू की नगरी मानते हैं. वे कहते हैं, "इस शहर की आबो-हवा में कुछ जादू तो है जो आप को यहां आने और रुकने के लिए मजबूर कर देता है." वे कहते हैं, "बनारस को सिर्फ अनुभव किया जा सकता है. और मेरे लिए उन अनुभवों का शब्दों के जरिए व्याख्या करना मुश्किल है." प्रो. शर्मा बनारस की चाय की दुकानों से बहुत प्रभावित हैं. वे इसे शहर की नब्ज बताते हुए कहते हैं, "बनारस की चाय दुकानें महज दुकान नहीं हैं. वे सूचना केंद्र हैं और चलता फिरता पुस्तकालय भी. यहां मस्ती भी मिलती और दुनिया भर का ज्ञान भी. लोग यहां आप को चाय की चुस्कियां लेते हुए दिल्ली की राजनीति से लेकर ह्वाइट हाउस तक की बाते करते मिल जाएंगे." तो डाकूमेंट्री फिल्में बनाने वाले यतीश यादव के लिए बनारस स्वयं के साक्षात्कर के लिए एक बेहतरीन जगह है. फुर्सत मिलते ही वे बनारस भाग आते हैं और घंटों मणिकणिका घाट और हरिशचंद घाट पर बैठ कर जलती चिताओं को निहारते रहते हैं. यतीश कहते हैं, "इससे एहसास होता है कि यही जीवन का अंतिम सत्य है. यह एहसास ही जीवन में कुछ नेक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है." बनारस अपनी गंगा जमुनी तहजीब के लिए भी जाना जाता है. गांगा का आनन्द यहां के हिंदू ही नहीं मुसलमान भी उठाते हैं. गंगा के घाटों पर विचरण करते तमाम मुसलमान मिल जाएंगे. मशहूर शायर नजीर बनारसी को गंगा के घाट बहुत प्रिय थे. वे कहा करते थे कि ईश्वर उन्हें कभी बनारस से दूर न करे. तो बिसमिल्ला खान भगवान शिव के अराधक थे और विश्वनाथ मंदिर भगवान शंकर के दर्शन करने जाया करते थे. यह दुर्लभ उदाहरण केवल बनारस में ही मिल सकता है.

बनारस के बारे में कहा जाता है वह हमेशा भौतिकता से दूर रहता है, कभी पैसे के पीछे नहीं भागता. दुनिया की चमक दमक और भीड-भाड़ जहां खत्म होती है बनारस वहां से शुरु होता है. यही वजह है कि भौतिकता से ऊबे दुनियाभर के तमाम लोग शांति की तलाश में यहां आते हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. यहां की नई पीढ़ी भौतिकता और पश्चिमी चमक-दमक की ओर तेजी से आकर्षित हो रही है. प्रसिद्द साहित्यकार और बनारस के जनजीवन पर आधारित चर्चित उपन्यास 'काशी का आस्सी' के लेखक काशीनाथ सिंह कहते हैं, "नई पीढ़ी बनारसीपन से दूर हो रही है. वह यहां की मस्ती और इत्मीनान को निकम्मापन और आलस्य समझने लगी है. अपनी मस्त चाल से चलने वाला यह शहर अब पैसे और भौतिकता की होड़ में शामिल हो गया है." धीरे-धीरे बनारस बदलने लगा है. लोगों के जीवन से मस्ती और बेफिक्री गायब हो रही है. काशीनाथ सिंह की माने तो बाजारवाद की आंधी से बनारस के मिथक टूटने लगे हैं और उसकी उसकी जादुई आभा बिखरने लगी है....

Wednesday, 5 December 2007

कौन खरीद रहा है निठारी के गवाहों को

निठारी में सब कुछ सामान्य लग रहा था. शाम ढल चुकी थी और लोग काम से वापस लौट रहे थे. दुकानें खुली हुई थी और गलियों में चहल पहल थी. शोरगुल करते बच्चे और घर के बाहर दरवाजे पर बातों में मशगूल महिलाएं यह एहसास करी रही थीं कि "खूनी कोठी" का भय अब निठारी के लोगों के मन से निकल चुका है. लेकिन उन संकरी और कीचड़भरी बदबूदार गलियों में थोड़ा आगे चलने पर हमारा यह भ्रम काफूर हो जाता है. निठारी पीड़ितों से मिलने पर यह एहसास हुआ कि नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके मन में खूनी कोठी का खौफ और अब बढ़ गया है. पहले पुलिस और बाद में सीबीआई के मोनिंदर सिंह पंधेर को बचाने से निठारी पीड़ित पहले ही सकते में थे. लेकिन नंदलाल के अपने बयान से मुकरने से उनके जख्म फिर से हरे हो गए हैं. उनके जेहन में बार बार यह सवाल घूम रहा है, "क्या नंदलाल बिक गया?" "क्या पंधेर ने उसे खरीद लिया?" "क्या पंधेर को सजा हो पाएगी?" "क्या वाकई सीबीआई भी पंधेर को बचा रही है? "

निठारी के लोग जब इन सवालों का जवाब ढूढने की कोशिश करते हैं तो उनका मन सिहर उठता है. पहले पुलिस की लापरवाही और फिर बाद में सीबीआई द्वारा पंधेर को क्लीन चिट देने से न्याय की उम्मीद पाले निठारी पीड़ित निराश हो गए थे. इस दौरान नंदलाल एक ऐसा 'हीरो' बन कर सामने आया जिसकी गवाही पर ही पंधेर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हुआ. इससे निठारी पीड़ितों को न्याय की आस बंधी. लेकिन हाल ही में नंदलाल के अपने पूर्व के बयान से मुकर जाने से निठारी पीड़ित अवाक हैं. उन्हें संदेह है कि मोनिंदर सिंह पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. खूनी कोठी की भेट चढ़ चुकी रिम्पा हलधर के पिता और निठारी कांड के एक प्रमुख गवाह अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने नंदलाल को खरीद लिया है. वह सरासर झूठ बोल रहा है. जब पंधेर ने पुलिस को हत्या वाली आरी बरामद कराई थी तो नंदलाल के साथ मैं भी वहां मौजूद था." अनिल हलधर ने सीबीआई की विशेष अदालत में एक याचिका दायर कर नंदलाल के खिलाफ झूठा साक्ष्य पेश करने का मामला दर्ज करने की अपील भी की है.
नंदलाल दरअसल निठारी कांड का सूत्रधार और मुख्य गवाह हैं. सीबीआई ने निठारी मामले की जांच के बाद अदालत में जो चार्जसीट दायर की थी उसमें नौकर सुरेंदर कोली को तो हत्या और बलात्कार का आरोपी बनाया गया था लेकिन मोनिंदर सिंह पंधेर को नहीं. तब नंदलाल ने सीबीआई पर अपने बयान को गलत तरीके से पेश करने और पंधेर को बचाने का संगीन आरोप लगाया था. 18 जून, 2007 को उसने अदालत में प्रार्थनापत्र दाखिल कर कहा था कि उसे पंधेर की तरफ से लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, लिहाजा उसका बयान फौरन दर्ज कराया जाए. इस आधार पर गाजियाबाद स्थित विशेष सीबीआई अदालत में 6 जुलाई, 2007 को नंदलाल का बयान दर्ज कराया गया. तब नंदलाल ने अदालत को बताया कि निठारी कांड के खुलासे से पहले 3 दिसंबर, 2006 को जब उसकी शिकायत पर कोली और पंधेर को पुलिस गिरफ्तार करके थाने लाई तो उसने पंधेर के मैनेजर को तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को रिश्वत देते देखा था. इसके अलावा 29 दिसबंर, 2006 को निठारी कांड के खुलासे के बाद पंधेर ने जब पुलिस को वह आरी बरामद कराई जिससे वह लड़िकयों की हत्याएं किया करता था, उस वक्त वह वहां मौजूद था.
नंदलाल के इस बयान के आधार पर ही अदालत ने तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज गैर जमानती वारंट जारी किया. साथ ही पायल मामले में सीबीआई को पंधेर के खिलाफ भी हत्या और बलत्कार का मामला दर्ज करने का आदेश दिया. लेकिन 15 नंबर, 2007 को जिरह के दौरान नंदलाल अपने इस बयान से पलट गया. अदालत में उसने कहा कि न तो उसके सामने आरी बरामद की गई थी और न ही उसने दिनेश यादव को किसी से रिश्वत लेते देखा था. इससे पहले इस लेखक से बात करते हुए नंदलाल कई बार दिनेश यादव और सीबीआई पर पंधेर को बचाने का आरोप लगा चुके हैं. लेकिन अब नंदलाल कहते हैं, "दिनेश यादव ने ही तो मामले का पर्दाफाश किया था." नंदलाल के विरोधाभाषी बयानों का विश्लेषण करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी केपी सिंह कहते हैं, "बयान पलटने से तो पहली नजर में यही साबित होता है कि नंदलाल दिनेश यादव और पंधेर को फायदा पहुंचाना चाहता है. इससे आरोपी को 'बेनिफिट आप डाउट' का लाभ मिल सकता है. लेकिन अभी इस पर सुनवाई हो रही है इसलिए यह अदालत के रुख पर निर्भर करेगा. अगर अदालत यह समझती है कि गवाह बदनीयती से जानबूझ कर अपने बयान से मुकर रहा है तो उसे सजा भी दे सकती है."

निठारी की गलियों की खाक छानने से पता चला कि गवाहों को तोड़ने और खरीदने की कोशिश की जा रही है. मुख्य गवाहों में से एक अनिल हलधर कहते हैं, "पंधेर ने सौदेबाजी के लिए मेरे पास भी एक आदमी को भेजा था. वह लगातार तीन दिन मेरे पास आकर गवाही न देने के लिए रूपये की पेशकश करता रहा. इतना ही नहीं पंधेर के खिलाफ बयान न देने के लिए सीबीआई भी मुझे कई बार धमका चुकी है." तो झब्बू लाल कहते हैं, "निठारी के ही कुछ लोग पंधेर से मिले हुए हैं. वह लोगों को बयान बदलने के लिए रूपयों की पेशकस कर रहे हैं." जबकि निठारी पीड़ितों के लिए संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा ठाकुर कहती हैं, "पंधेर का बेटा मेरे घर का चक्कर लगा रहा है. वह मेरे पास भी बातचीत के लिए संदेश भिजवा रहा है." वे आगे कहती हैं, "इससे पहले खुद को पूर्व राजदूत बताने वाले एक सरदार जी मेरे घर आए थे. वे मुझे धमका कर गए कि मैं पंधेर का कुछ नहीं बिगाड़ सकती."

निठारी मामले में सीबीआई की भूमिका शुरु से ही विवादों में घिरी रही. निठारी पीड़ित सीबीआई पर बार बार पंधेर को बचाने का आरोप लगाते रहे हैं. सीबीआई ने अब तक 11 मामले में चार्जसीट दायर की है जिसमे सभी में पंधेर को क्लीनचिट दी गई है. पायल के बाद पिंकी सरकार मामले में भी अदालत ने सीबीआई को कटघरे में खड़ा करते हुए उसे पंधेर के खिलाफ हत्या और बलात्कार के अलावा अपहरण, षडयंत्र और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने का मामला दर्ज करने का आदेश दिया है. जबकि पिंकी सरकार मामले में अपनी चार्जसीट में सीबीआई ने पंधेर को क्लीन चिट दे दी थी. इससे पहले पिंकी सरकार के पिता स्वर्गीय जतिन सरकार की अपील पर अदालत ने सीबीआई को इस मामले में दुबारा जांच का आदेश भी दिया था. बाद में जतिन की पं बंगाल के मुर्शिदाबाद में संदिग्ध हालत में मौत हो गई थी.
निठारी कांड के मुख्य गवाह जतिन सरकार की पत्नी वंदना सरकार ने अपने पति की मौत के लिए सीबीआई को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए सुप्रिम कोर्ट में याचिका भी दायर की है. अदालत के आदेश पर इस मामले में सीबीआई निदेशक विजय शंकर तिवारी, एसपी एसजेएम गिलानी और निठारी के तत्कालीन डीएसपी दिनेश यादव को नामजद किया गया है. लेकिन इसके बावजूद सीबीआई लोगों को धमकाने से बाज नहीं आई. वंदना सरकार के वकील और सुप्रिम कोर्ट के अधिवक्ता भानू प्रताप सिंह धाकरे को भी सीबीआई फर्जी केस में फंसाने की धमकी दे रही है. श्री धाकरे गुस्से में कहते हैं, "सीबीआई की हिमाकत देखिए कि उसने मुझे धमकाने के लिए अपने एक इंसपेक्टर अजय सिंह और चार गुर्गों को भेजा था. मैंने अजय सिंह के खिलाफ नोएड़ा के सेक्टर- 39 के थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई है." इसके अलावा पीड़ित अरुण सरकार, झब्बूलाल और करणबीर ने भी अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई के वकील पर पक्षपात करने का आरोप लगाया है. याचिका में कहा गया है, "सीबीआई महत्वपूर्ण गवाहों की बजाए अनौपचारिक व असंबंधित गवाहों को ही सम्मन कर अदालत के सामने पेश कर रही है. ऐसा लगता है कि सीबीआई के वकील महत्वपूर्ण गवाहों और वादी मकदमा के बयान न कराकर इसका लाभ अभियुक्त पक्ष को देना चाहते हैं." इसके अलावा याचिका में तीनों ने दिनेश यादव और पंधेर पर आरोप लगाया है कि वे उसे बयान बदलने के लिए रूपयों का लालच दे रहे हैं. याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसा न करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी जा रही है.
सीबीआई की पोल धीरे धीरे खुलने लगी है. पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान पंधेर और कोली ने पायल और दूसरी गायब लड़कियों और बच्चों के यौन शोषण के बाद हत्या की बात स्वीकार की थी. यह इकबाले जुर्म पुलिस की जनरल डायरी और पायल की केस डायरी में दर्ज है. सीबीआई इसे हमेशा छुपाने की कोशिश करती रही. यह पंधेर के खिलाफ पुख्ता सबूत है. बाद में स्वर्गीय जतिन सरकार ने इसे अदालत में जमा कराया था. जबकि निठारी मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी डीएसपी दिनेश यादव ने इसे तब सीबीआई को सौंप दिया था. दिनेश यादव के वकील नाहर सिंह यादव ने सीबीआई की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "मेरे मुवक्किल दिनेश यादव के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल किया था. जिसका विवरण जनरल डायरी और केस डायरी में दर्ज है. दिनेश यादव ने इसे सीबीआई को सौंप दिया था. अदालत में हमने सीबीआई से इसकी प्राप्ति की रसीद भी जमा करा दी है." लेकिन सीबीआई के प्रवक्ता जी मोहंती इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "सीबीआई निठारी पीडितों को न्याय दिलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है."
आखिर जब पुलिस के सामने पंधेर ने अपना जुर्म कबूल लिया था तो सीबीआई ने उसे क्लीन चिट कैसे दे दी? यही वह सवाल है जो निठारी पीड़ितों को ही नहीं समूचे देशवासियों को मथ रहा है. एक और सवाल जो निठारी के लोगों के जेहन में बार बार घूम रहा है कि अगर पंधेर निर्दोष है तो वह लोगों को धमकिया क्यों दे रहा है? बयान बदलने और गवाही से मुकरने के लिए रूपयों की पेशकश क्यों कर रहा है? इस सवाल के जवाब में ही पंधेर के गुनहगार होने का सुबूत छुपा हुआ है.

जमीन डूबी यहां हमारी, बांध की मछली कैसे तुम्हारी

ढलता सूरज उनमें स्फूर्ति और उत्साह भर देता था. जैसे ही सूरज पश्चिम की ओर अपना रुख करता चंपालाल जैसे सैकड़ों मछुआरे नाव और जाल के साथ सूरज के पीछे हो लेते. और जब सूरज बादलों के पार चला जाता तो वे तवा नदी में जाल लगा कर सुबह के इंतजार में वापस लौट आते... और जब सुबह सूरज नदी में अठखेलियां शुरु करता तो वे जाल में फंसी मछलियों से अपने भविष्य के सुनहरे सपने बुनते. चंपालाल जैसे लोग जिनके घर बार तवा बांध की भेंट चढ़ गए हों, खेत और खलिहान विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए हों, उनके लिए तो मछली ही जीवन की डोर है, इसी में उनका भविष्य बसता है. लेकिन अब ढलता सूरज चंपालाल और उनके साथियों को उत्साह और स्फूर्ति से नहीं भरता बल्कि उन्हें अंधकारमय भविष्य की चिंता और अवसाद से भर देता है.

आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने चंपालाल और दूसरे विस्थापित मछुआरों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इस सवाल के उत्तर के लिए आप को हमारे साथ मध्य प्रदेश के होशगांबाद जिले के केसला में स्थित तवा विस्थापित आदिवासी मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ (तवा मत्स्य संघ) के कार्यालय चलना होगा. जहां सहकारिता के एक सफल प्रयोग का गला घोटा जा रहा है. इसने साबित किया कि प्राकृतिक संसाधनों पर अगर स्थानीय लोगों को अधिकार मिलता है तो सरकारी व निजी तंत्र के मुकाबले कहीं बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है. इन संसाधनों के जरिए वे अपना विकास भी कर सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण भी. इसी सिद्धांत के तहत संघ ने स्थानीय मछुआरों को ठेकेदारों के शोषण से मुक्त कर उन्हें आत्म निर्भर बना दिया. संघ के मछली डीपो के प्रबंधक रूपेश बाथरी कहते हैं, "पहले भुगतान लेने मछुआरे हमारे पास पैदल आते थे लेकिन अब वे मोटरसाइकिल से आते हैं." कभी लोगों के हूजूम से रौशन रहने वाले संघ के मछली डीपों में अब विरानगी का आलम है. जबकि मछुआरे चंपालाल कहते हैं, "संघ के बंद होने से उनकी रातों की नींद उड़ गई है. न तो इनके पास खेत है और न ही कोई रोजगार. संघ को मछली बेचकर वे अपना भरण पोषण करते थे. लेकिन अब तो मछली पकड़ने पर ही रोक लगा दी गई है."



दरअसल तवा मत्स्य संघ तवा बांध से विस्थापित स्थानीय आदिवासियों की सहकारी संस्था है. जो स्थानीय मछुआरों के सहयोग से तवा जलाशय में मछली उत्पादन और विपणन कार्य करती थी. लेकिन करीब नौ महीने से सरकार ने इससे जलाशय से मछली उत्पादन और विपणन का अधिकार वापस ले लिया है. तवा बांध बनने से करीब 44 गांव डूब गए. इससे 4000 परिवार प्रभावित हुए हैं. 1974 में बने इस बांध से उजड़े लोगों को सरकार ने न तो उचित मुआवजा दिया और न ही इन्हें ठीक से पुनर्वासित किया. मछली का शिकार ही इनकी रोजी रोटी का जरिया है. लेकिन कानूनन ये लोग बांध में मछली का शिकार नहीं कर सकते है, क्योंकि इस पर सरकार का अधिकार होता है. सरकार यह काम ठेकेदारों से ठेके पर करवाती है. पहले ठेकेदार के तहत ही ये लोग मछली का शिकार करते थे. लेकिन ठेकेदार इनका जम कर शोषण करता था. इनसे वह मामलू दामों पर मछली खरीदता था और भारी मुनाफे के साथ वह लोगों को बेचता था. मछुआरों को खाने के लिए भी मछली ठेकेदार से खरीदनी पड़ती थी. चंपालाल बताते हैं, "एक बार ठेकेदार ने मछली चोरी के शक में उनकी इतनी पिटाई की की वे महीनों बिस्तर पर रहे. ठेकेदार के गुंडे जलाशय की निगरानी रखते. वे हमारे घरों में जाकर तलाशी भी लेते. अगर कोई मछली पकाते मिल जाता तो उसकी धुनाई की जाती."

लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने दिसंबर 1996 में तवा मत्स्य संघ को सहकारिता के जरिए तवा बांध के मछली के शिकार, विपणन और प्रबंधन की जिम्मेदारी देते हुए पांच साल का अनुबंध किया. यह प्रयोग सफल रहा और इसने मछुआरों को ठेकेदोरों से दुगनी कीमत देनी शुरु की. इसके अलावा साल के आखीर में लाभांश को बोनस के रूप में मछुआरों को बांट दिया जाता था. संघ के पास 10 साल तक तवा बांध का ठेका रहा. इस दौरान उसने अपना उत्पादन कई गुना बढ़ाया. पहले जहां मछुआरों को ठेकेदारों से साल में करीब सात लाख रूपये की कमाई होती थी. वहीं संघ के आने के बाद यह कमाई 40 लाख रूपये तक होने लगी. संघ के आंकड़ें बताते हैं कि 10 साल में उसने सरकार को रायल्टी के रूप में 1.39 करोड़ रूपये अदा किए. संघ मुनाफे में था. मुनाफे को वह बोनस के रुप में मछुआरों को बांट देता था. संघ हर साल वह करीब सवा करोड़ का कारोबार करता था. जिसमें से करीब 20 लाख रायल्टी के रूप में सरकार और करीब 45 लाख मेहनाते के रूप में मछुआरों की जेब में जाते थे. संघ इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि मछली का शिकार उतना ही किया जाए जिससे जलाशय के पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरण को नुकसान न हो.
तवा मतस्य संघ की वजह से वन विभाग और सरकारी अधिकारियों को ठेकेदारों से मिलने वाली मोटी कमाई बंद हो गई. संघ के सलाहकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुनील कहते हैं, "बड़े जलाशयों के ठेके का पैसा बड़े अधिकारियों और मंत्रियों तक जाता है. लेकिन तवा से उन्हें कुछ हासिल नहीं होता था. लिहाजा सरकारी अमला तवा मत्स्य संघ के खिलाफ हो गया." अधिकारियों ने इस बारे में मुख्यमंत्री को भी गुमराह किया. तवा और बरगी मत्स्य संघ के बारे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं, "वहां के बारे में हमें कई तरह की अनिमियताओं की शिकायतें मिली हैं." मध्य प्रदेश में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर ही करीब 30 बड़े और 135 मध्यम दर्जे के बांध प्रस्तावित हैं. जाहिर है बांधों के मछली के ठेके की आड़ में अधिकारियों की मोटी कमाई होगी. तवा में जिस तरह से सहकारिता का प्रयोग सफल हो रहा था उससे इन अधिकारियों को लगने लगा कि कहीं इसे समूचे राज्य में न लागू कर दिया जाए. लिहाजा इस बार उन्होंने तवा बांध को आरक्षित वन क्षेत्र में शामिल होने का सहारा लेकर इसमें मछली के शिकार पर रोक लगा दी है. यही वजह है कि दिसंबर, 2006 में संघ का अनुबंध फिर नहीं बढ़ाया गया. तवा बांध सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभ्यारण और पंचमढ़ी अभ्यारण से घिरा हुआ है. कुछ समय पहले सरकार ने इसे प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल करते हुए टाईगर रिजर्व एरिया घोषित कर दिया. लिहाजा वन्य प्राणी संरक्षण कानून के तहत यहां मछली का शिकार प्रतिबंधित कर दिया गया. फिलहाल यह मामला सुप्रिम कोर्ट में है.

तवा जलाशय में जब मैने नाव के जरिए घूम कर पड़ताल की तो पाया कि प्रतिबंध के बावजूद मछली का शिकार रुका नहीं है. वन अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर मछली की चोरी हो रही है. स्थानीय मछुआरों से भी वन विभाग वसूली कर रहा है. चंपालाल बताते हैं, "वन विभाग के लोगों ने उनके भाई को मछली का शिकार करते हुए पकड़ लिया और 1500 रिश्वत लेने के बाद छोड़ा." जबकि तवा के वन संरक्षक एस एस राजपूत उल्टे तवा मत्स्य संघ पर आरोप लगाते हुए कहते हैं," संघ मछली की चोरी कर रहा है. इसके खिलाफ कार्रवाई के लिए हमने शासन से सिफारिश भी की है." दरअसल तवा बांध की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जलाशय के दो छोर पर जंगल है, जिस पर वन विभाग का अधिकार है. इन इलाकों में बाहरी लोग आकर मछली का शिकार कर रहे हैं. यह भी सही है कि स्थानीय मछुआरे भी, जो तवा मत्स्य संघ से जुड़े रहे हैं, मछली का शिकार कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इसके अलावा उनके पास और कोई चारा नहीं है. सरकार उन्हें चोर बनने के लिए मजबूर कर रही है.
तवा मत्य संघ के कार्यों की प्रशंसा देश की गरीबी पर अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो नीलकंठ रथ ने भी की है. अहमदाबाद स्थित संस्थान सेंटर फार इनवारमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नालॉजी ने तवा मत्स्य संघ पर शोध किया और इसके द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और दोहन के बीच संतुलन कायम करने के इसके कार्यों की प्रशंसा की. प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुनीता नारायणन की अध्यक्षता में बनी टाइगर टास्क फोर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में तवा मत्स्य संघ के कार्यों की सराहना करते हुए इसे एक मॉडल के रूप में पेश किया है कि कैसे स्थानीय लोगों की मदद से पर्यावरण व वन्य जीवों का संरक्षण किया जा सकता है. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में तवा और महाराष्ट्र के पेंच बांध की तुलना भी की है. रिपोर्ट के मुताबिक वन संरक्षण कानून के तहत पेंच जलाशय में भी मछली के शिकार पर रोक लगा दी गई है. लेकिन असलियत यह है कि वहां मछली चोरों का संगठित गिरोह तैयार हो गया है जो गैरकानूनी रूप से वहां मछली का शिकार कर रहा है.

लाल फीता शाही का दूसरा उदाहरण बरगी जलाशय है. तवा से पहले ठेकेदारों ने सरकारी अधिकारियों से मिल कर बरगी बांध विस्तापित मत्स्य उत्पादन एवं विपणन सहकारी संघ के भी ठेके को रद्द करवा दिया था. बरगी मत्स्य संघ के संयोजक राजकुमार सिन्हा कहते हैं, "ठेकेदारी के बाद संघ के मुकाबले औसत मत्स्य उत्पादन घटा है. यह सालाना 430 मीट्रीक टन से घट कर अब 181 मीट्रिक टन हो गया है. सरकार का दोहरा चरित्र देखिए की वह बरगी मत्स्य संघ के लिए तो वह सालाना 700 मीट्रिक टन मछली उत्पादन का काफी ऊंचा लक्ष्य रखती है, जबकि ठेकेदार को केवल 300 मीट्रिक टन का लक्ष्य दिया जाता है. ऐसा इसलिए ताकि लक्ष्य न हासिल कर पाने पर संघ का अनुबंध खत्म करने का उन्हें बहाना मिल जाए." 1994 से 2001 तक मछली शिकार का ठेका तवा संघ की तर्ज पर बर्गी मत्स्य संघ के पास था.
सरकारी अधिकारी कैसे ठेकेदारों के हित में काम करते हैं, बर्गी इसकी मिसाल है. 3 सितंबर, 2007 को मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक हुई, जिसमें यह फैसला हुआ कि बांधों में मछली के शिकार का ठेका ठेकेदारों को न दे कर स्थानीय मछुआरों के फेडरेशन को दिया जाए. जैसा कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ हैं. इस बैठक में प्रमुख सचिव (मछली पालन), नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) के उपाध्यक्ष और राज्य मत्स्य महासंघ की प्रबंध निदेशक मौजूद थी. राज्य मत्स्य महासंघ ही बांधों के जलाशयों में मछली के ठेके आदि देती है. इस फैसले का उलंघन करते हुए 13 सितंबर, 2007 राज्य मत्स्य महासंघ ने बर्गी जलाशय का ठेका बर्गी मत्स्य संघ को देने की बजाए पुराने ठेकेदार को दे दिया. सरकार ने इसकी जांच के लिए दो सदस्यों की एक कमेटी बनाई. कमेटी ने जांच में पाया कि राज्य मत्स्य महासंघ ने ठेका देने में अनियमितता बरती है. लेकिन महासंघ के अधिकारी अब अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए इस कमेटी की रिपोर्ट को झूठा ठहराते हुए फिर से जांच के लिए अपने एक महा प्रवंधक डीके वापना को बर्गी भेजा. महासंघ की करतूतों को भांप कर बड़ी संख्या में मछूआरे उनसे बात करने पहुंचे. लेकिन वापना उनसे बात किए बगैर ही वापस लौट गए. इस बारे में मछुआरों ने राज्य के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से शिकायत भी की है. इससे साबित होता है कि बर्गी और तवा मत्स्य संघ के सहकारिता के सफल प्रयोगों को भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए बलि का बकरा बना दिया. अगर ठेकेदार के शोषण से आजिज आकर ये लोग बंदूक उठा लें, तो इसका जिम्मदार कौन होगा?

आजादी के साठ साल बाद भी क्यों पैदा होते हैं चंबल में डकैत

चार दिन तक हंसता खिलखिलाता उसका चेहरा अचानक खामोश हो जाता है. उसकी यह अप्रत्याशित चुप्पी हमें परेशान कर रही थी. बाईस साल के उस नौजवान की आंखों में हमें कुछ अजीब सी हलचल दिखाई दे रही थी. कई बार कुरेदने पर उसने जब यह कहा, "साहब मेरा मन भी बंदूक उठा कर बागी बनने का करता है" तो हमारे चेहरे की हवाइयां उड़ गई. हम चौंके, क्योंकि हमने उससे ऐसे जवाब की कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी. जब हमने उसके बगावत की वजह जाननी चाही तो उसका जवाब था, "मेरी दस बीघे जमीन पर मेरे गांव के ही एक दबंग व्यक्ति ने कब्जा कर लिया है. इस गम में मेरे पिता की मौत हो गई और मुझे गांव छोड़ कर शहर में नौकरी करनी पड़ रही है. सोचता हूं उसकों मार कर मैं भी चंबल के बीहड़ों में चला जाऊं." क्या पुलिस में इसकी शिकायत की? वह कहता है, "पुलिस मुझसे पैसा लेकर मुझे कब्जा दिला देती, लेकिन वे पुलिसवालों को मुझसे ज्यादा पैसा देकर फिर मेरी जमीन पर कब्जा कर लेते. ऐसा कई बार हुआ." उसका जवाब सुन कर हमारे कानों में चंबल के पूर्व दस्यु सरगना मोहर सिंह की कही यह बात गूंजने लगती है, "जब तक अन्याय है तब बागी (चंबल में डाकुओं को बागी कहा जाता है) पैदा होते रहेंगे."

यह घटना इस समय की है जब हम चंबल के बीहड़ों से पांच दिन की अपनी यात्रा पूरी कर वापस लौट रहे थे. उपर हमने जिस शख्स की चर्चा की है वह हमारा ड्राइवर कृष्णा था. हरियाणा निवासी कृष्णा हमारे साथ चंबल के कई वर्तमान और पूर्व डैकेतों से मिलकर वापस आ रहा था. उन डकैतों में से कई की कहानी कृष्णा जैसी ही थी. लोगों द्वारा सताए जाने पर ही इन लोगों ने बंदूक उठाई और बागी बन गए. इन्हें देख कर कृष्णा के मन में भी अन्याय के खिलाफ बगावत करने की तमन्ना जगी. लेकिन अगर कृष्णा हरियाणा की बजाय चंबल में होता तो शायद अब तक वह डाकू बन गया होता. चंबल की सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियां उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित भी करतीं. और खास कर चंबल के लोग तो अदालत और पुलिस से न्याय की गुहार करने की बजाय खुद बदला लेना ज्यादा पसंद करते हैं. अन्याय और शोषण के खिलाफ हथियार उठाना और "खून का बदला खून" से लेने की यहां की परंपरा रही है.
चंबल का इलाका अपनी बहादुरी और वीरता के लिए जाना जाता है. यही वजह है कि यहां की धरती पर अगर डाकू भी पैदा होते हैं तो सरहद पर देश की रक्षा के लिए शहीद होने वाले वीर सिपाही भी. कई बार तो एक भाई फौज में तो दूसरा डाकू. भिंड जिले के रिदौली गांव के जयश्रीराम बघेल 6 साल तक दस्यु सरगना विद्या गडेरिया के गिरोह में सक्रिय रहे. उनका छोटा भाई फौज में सुबेदार हैं. जयश्रीराम बघेल कहते हैं, "गांव के कुछ सबल लोगों ने मेरे चाचा की हत्या कर दी. बदला लेने के लिए ही मैं गडेरिया गिरोह में शामिल हो गया." चंबल इलाके से देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले कहीं ज्यादा लोग सेना में हैं. 1965 और 1972 की लड़ाई के अलावा कारगिल युद्द के दौरान भी यहां के कई जवान शहीद हुए थे. यहां की धरती पर कभी अंग्रेजों और सिंधिया स्टेट के अन्याय के खिलाफ हथियार उठाने वाले बागियों से लेकर मौजूदा समय में अपहरण को उद्योग बनाने वाले डाकुओं की कहानियां बिखरी पड़ी हैं. पुलिस की नजर में ये डकैत बर्बर अपराधी हैं लेकिन वे अपने इलाके में रॉबिनवुड हैं. अपनी जाति के हीरों हैं. अमीरों से पैसा ऐठना और गरीबों खासकर अपनी जाति के लोगों की मदद करना इनका शगल है. लेकिन दुश्मनों और मुखबिरों के साथ ये ऐसा बर्बर रवैया अपनाते हैं कि देखने वालों के दिल दहल जाएं. मध्य प्रदेश के डकैती विरोधी अभियान के प्रमुख रह चुके पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसएस शुक्ला कहते हैं, "जिस जाति का व्यक्ति अपराध कर डाकू बन जाता है उसे उस विशेष जाति समुदाय के लोग अपना 'हीरो' मानने लगते हैं. उसके साथ नायक जैसा व्यवहार करते हैं." यह परंपरा आज की नहीं है, जब से यहां डाकू पैदा हुए तब से यह परंपरा चली आ रही है. मानसिंह से लेकर दयाराम गड़ेरिया और ददुआ तक अपनी जाति के हीरो रहे.
बागी होना यहां गर्व की बात मानी जाती है. हालांकि अब बागियों को वह सम्मान और प्रतिष्ठा नहीं मिलती जो पहले मिला करती थी. पहले के डाकुओं के अपने कुछ सिद्धांत और आदर्श हुआ करते थे. एसएस शुक्ला कहते हैं, "जो लोग कानून के प्रति विद्रोह कर हथियार उठाते थे उन्हें बागी कहा जाता था. उनके कुछ आदर्श और सिद्धांत हुआ करते थे. 1970 तक डाकुओं के आदर्श और सिद्धांत बरकरार थे. तब वे डकैती पैसे कमाने के लिए नहीं बल्कि बगावत की लड़ाई लड़ने के लिए हथियार व गोले बारूद खरीदनें व अपने भरण पोषण के लिए करते थे." लेकिन जैसे जैसे वक्त बदला डाकुओं का चरित्र और उनकी कार्य प्रणाली भी बदली. अब वे बागी नहीं प्रोफेशनल डाकू बन गए हैं. अपहरण इनका मुख्य धंधा है. दुर्दांत दस्यु सरगना जगजीवन परिहार के इनकाउंटर में प्रमुख भूमिका निभाने वाले चंबल रेंज के डीआईजी डीसी सागर कहते हैं, "अब ये लोग डकैती नहीं डालते बल्कि अपहरण और वसूली करते हैं. पिछले दस सालों से डकैतों ने यहां अपहरण को एक उद्योग बना लिया है. आसपास के अलावा दूसरे बड़े शहरों से भी ये लोग अपहरण करते हैं. ठेकेदारों और खदानमालिकों से रंगदारी वसूलना भी इनकी आय का एक बड़ा स्रोत है."
वह भी कृष्णा जैसा ही एक नौजवान था जो बदले की भावना से उबल रहा था. भिंड स्थित अटेर किले के पीछे के बीहड़ों में चंबल के किनारे हमारी उससे मुलाकात होती है. बड़े बड़े बाल, मस्तक पर बड़ा सा तिलक लगाए और माथे पर पट्टी बांधे यह नौजवान कभी जगजीवन परिहार के गैंग का सदस्य रहा है. अपने भाई के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए बंदूक उठाने वाले इस नौजवान को अब अपहरण की दुनिया रास आने लगी है. वह कहता है, "डकैती की तरह इसमें न तो पकड़े जाने का खतरा है न ही मुठभेड़ का. बैठे बिठाए लाखों रुपये महीने आ जाते हैं." नारायण नाम का यह शख्स चंबल के तीसरी पीढ़ी का डकैत है जो बदले की भावना से 'बागी' बना और अब 'प्रोफेशनल अपराधी'. उसकी माने तो अपहरण से जो उसे कमाई हुई है उसका एक बड़ा हिस्सा वह प्रापर्टी और जमीन खरीदने में निवेश कर चुका है. यह चंबल के डकैतों का असली चेहरा है. कभी अपने चरित्र और सिद्धांतों के लिए चर्चित रहे चंबल के डकैतों का चेहरा अब बदल चुका है.
आखिर यहां डाकू क्यों पैदा होते हैं? हमने पड़ताल करने पर पाया कि प्रतिष्ठा, प्रतिशोध और प्रताडना इसका मूल कारण है. लेकिन डाकू पैदा करने में पुलिस की सबसे अहम भूमिका होती है. चंबल के दस्यु सरगनाओं का इतिहास देंखे तो डाकू मानसिंह से लेकर फूलन देवी तक सभी लोग अमीरों या रसूख वाले लोगों के शोषण के शिकार रहे हैं. और इस शोषण में पुलिस और व्यवस्था ने इनकी बजाय रसूखवालों का ही साथ दिया. ऐसे में ये लोग न्याय की उम्मीद किससे करते. कभी चंबल में पुलिस की नाक में दम करने वाले पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, "मेरे गांव के सरपंच ने मंदिर की जमीन पर कब्जा कर लिया. मेरे विरोध करने पर उन्होंने मेरे खिलाफ फर्जी केस दर्ज कर मुझे जेल भिजवा दिया और फिर मेरे साथ ही विरोध करने वाले मेरे एक साथी की हत्या भी कर दी. सरपंच तब के एक मंत्री का रिश्तेदार था और दरोगा और दीवान उसके घर पर हाजिरी बजाते थे. ऐसे में मैं किससे न्याय मागता. बंदूक उठाने के अलावा मेरे पास कोई चारा ही नहीं था." कमोबेश यह स्थिति आज भी बरकरार है. भिंड के एसपी निरंजन बी वायंगणकर मानते हैं कि फर्जी मुकदमें डाकू बनने की एक बड़ी वजह है. वे कहते हैं, "लोग दुश्मनी निकालने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ फर्जी मुकदमें दर्ज करा देते हैं. लेकिन मैंने शख्त हिदायद दी है कि फर्जी मुकदमें न दर्ज किए जाएं और न ही किसी किसी बेकसूर पर इनाम घोषित किया जाए."
चंबल का इतिहास विद्रोह से भरा पड़ा है. यहां के भदावर और तोमर राजाओं ने भी अंग्रेजों और मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है. यह बगावत की भावना आज भी बरकरारा है. चंबल की दस्यु समस्या पर शोध कर चुके समाजशास्त्री प्रो पी.वी.एस तोमर कहते हैं, "यहां के लोग स्वाभिमानी और बहादुर होते हैं. इसलिए ये लोग प्रताड़ना और अन्याय बर्दास्त नहीं कर पाते. यही वजह है कि ये लोग अन्याय के खिलाफ बंदूक उठा लेते हैं." चंबल की भोगोलिक स्थिति इसमें मददगार साबित होती है. चंबल का इलाका क्वारी, सिंध, चंबल, वैशाली और यमुना नदियों के अलावा कई छोटी नदियों से घिरा है. इनके किनारे मिट्टी के बड़े बड़े टीले और घने जंगल छुपने और पुलिस से सुरक्षित रहने की सबसे बेहतर जगह है. देश आजाद हो गया है लेकिन हालात नहीं बदले हैं. शोषण आज भी जारी है. बस अंतर इतना है कि पहले मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के लोगों का शोषण किया तो अब व्यवस्था व पुलिस कर रही है. 1947 में देश आजाद हुआ तो आम जनता के साथ डाकुओं ने भी आजादी का जश्न मनाया. डाकू मानसिंह के साथी और उनके मरने के बाद गिरोह के सरदार रहे लोकमन दीक्षित उर्फ लुक्का कहते हैं, "देश आजाद हुआ तो हम भी खुश हुए. क्वींटलों लड्डू बांटे गए. जश्न मनाया गया कि अब शोषण और अन्याय बंद होगा. लेकिन अब तो यह पहले से कहीं ज्यादा हो रहा है. हमारे सपने चूर हो गए. "

हमने दस्यु प्रभावित क्षेत्र ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, भिंड, मुरैना, इटावा और आगरा के विभिन्न इलाकों का दौरा किया. इस दौरान पाया कि यहां आजादी के साठ साल बाद भी विकास की बयार कहीं दिखाई नहीं देती. गांवों में न सड़कें है और न ही दूसरी बुनियादी सुविधाएं. बीहडों में कई जगह हालत यह थी कि हमें अपनी गाड़ी दूर छोड़कर पैदल सफर करना पड़ता था. उद्योग धंधे और रोजगार के अवसर तो न के बराबर हैं. खेती पर ही लोगों की आजीविका निर्भर है. भिंड के पूर्व विधायक और दस्यु उन्मूलन अभियान चलाने वाले परशुराम भदौरिया कहते हैं, "बिजली की समस्या की वजह से खेतों की सिचाई नहीं हो पाती है. इससे पैदावार प्रभावित होती है. रोजगार के अवसर भी यहां न के बराबर है. व्यावसायिक शिक्षा की तरफ यहां सरकार ने कभी ध्यान ही नहीं दिया." लोगों के पास सरकारी नौकरी खास कर फौज में भर्ती होने के अलावा कोई चारा नहीं है. जमीन बेंचकर लोग इसके लिए रिश्वत का इंतजाम करते हैं. जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे अपहरण उद्योग में शामिल हो जाते हैं. भिंड के एसपी निरंजन बी वायंगणकर कहते हैं, "यहां के युवा 'पकड़' ले जाकर डकैतों को सौंप देते हैं. इसके बदले उन्हें फिरौती की रकम से एक हिस्सा मिल जाता है. यह हिस्सा 10 से 25 फीसदी तक होता है." अपहरण उद्योग से पुलिस को भी कमाई होती है. असलियत यह है कि पुलिस नहीं चाहती की दस्यु समस्या खत्म हो. पूर्व विधायक परशुराम भदौरिया इसकी वजह बताते हैं, "भ्रष्ट पुलिस वालों के लिए दस्यु समस्या कमाई का जरिया बन गया है." पुलिस के कई लोग डाकुओं की मदद करते हैं. डीआईजी डी सी सागर मानते हैं कि उनके महकमें के लोगों द्वारा डाकुओं को मदद मिलती है. वे कहते हैं, "कई बार हमारी सूचनाएं डाकुओं तक पहुंच गई हैं और हमारा अभियान फेल हो गया. इस संबंध में हमने कई पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी की है."

जगजीवन परिहार को डकैत बनाने के लिए तो पुलिस ही जिम्मेदार थी. वह पुलिस का मुखबिर था. निर्भय गूजर को मारने के लिए पुलिस ने जगजीवन को हथियार मुहैया कराया और डाकू बना दिया. उपर से दबाव या फिर डाकू के पकड़े जाने पर भेद खुल जाने के डर से पुलिस वाले इनका इनकाउंटर कर देते हैं और फिर एक दूसरा गैंग तैयार करवा देते हैं. मध्य प्रदेश पुलिस के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक एसएस शुक्ला की मानें तो इनकाउंटर स्पेस्लिस्ट लोगों की इसमें खास भूमिका होती है. वे कहते हैं, "ऐसे लोग जब एक गैंग को मार गिराते हैं तो उनकी अर्निंग बंद हो जाती है. ऐसे में वे दूसरा गैंग तैयार कर देते हैं." चंबल के किनारे के मिट्टी के बड़े बड़े टीले डाकुओं की छुपने की जगह है. अगर सरकार इन्हें समतल कर लोगों में बांट दे तो इससे न केवल डाकू समस्या पर लगाम लगेगी बल्कि लोगों को खेती के लिए जमीन मिल जाएगी. लेकिन टीलों के समतलीकरण की योजना भ्रष्टाचार की वजह से परवान नहीं चढ़ पा रही है.

डाकुओं के अलावा अब चंबल में नक्सली भी सक्रिय हो रहे हैं. डीआईजी डी सी सागर कहते हैं, "हम यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि नक्सलियों का प्रशिक्षण शिविर कहां चल रहा है." शोषण और बेरोजगारी ही दस्यु समस्या की तरह नक्सल समस्या की भी जड़ है. अगर इस समस्या से निपटना है तो गांवों में विकास की गंगा बहानी होगी. लोगों को शिक्षा और रोजगार मुहैया कराना होगा. वरना चंबल का दायरा फैलता हुआ पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा और देश भर में बागियों की जमात पैदा हो जाएगी.

तब डाकुओं के भी सिद्धांत हुआ करते थे

जब भी चंबल के डकैतों का इतिहास लिखा जाएगा, मानसिंह का नाम सबसे पहले आएगा. चंबल के लोगों के बीच किवदंती बन चुके मानसिंह ने डाकू होते हुए जो चरित्र और आदर्श स्थापित किया वह कई दशक तक चंबल के डाकुओं के लिए लक्ष्मण रेखा बनी रही. उत्तर प्रदेश के आगरा के खेड़ा राढौर गांव में जन्में मानसिंह चालीस के दशक में पारिवारिक रंजिस की वजह से डकैत बने और करीब 17 साल कर चंबल में राज करते रहे. मानसिंह के पौत्र जनरैल सिंह कहते हैं, “मानसिंह भूख की वजह से नहीं न्याय के लिए डाकू बने थे. तब वह जमीनदार थे और उनके पास 1000 एकड़ से ज्यादा जमीन थी.” मानसिंह के उपर 1112 डकैती और 185 हत्या के मामले दर्ज थे. मानसिंह गैंग की पुलिस से 90 बार मुठभेड़ हुई जिसमें 32 पुलिसवाले खाक हो गए. जबकि गैंग के भी 15 सदस्य मारे गए. अमीरों को लूटना और गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना मानसिंह का वसूल था. गैंग के सदस्यों को शराब और मांस से दूर रहने की शख्त हिदायत थी. मानसिंह के साथी रहे और लुक्का डाकू के नाम से मशहूर लोकमन दीक्षित कहते हैं, “हम लोग कभी किसी बहन बेटी के गहनों को हाथ नहीं लगाते थे. डाके के दौरान न ही किसी महिला का मंगलसूत्र लूटते थे. गैंग बेकसूर लोगों को कभी प्रताडित नहीं करता था.” पंचायत बुलाकर न्याय करना और इलाके की बहन बेटियों की शादी कराना मानसिंह की लोकप्रियता की एक प्रमुख वजह थी. मानसिंह ने राबिनवुड की अपनी जो छवि बनाई उसे आज हर डाकू ढ़ोने की कोशिश करता है. मानसिंह के गांव में उनका एक मंदिर भी बनाया गया है.
1957 में हुई पुलिस मुठभेड़ में मानसिंह मारे गए. गैंग की कमान रूपा पंडित के हाथ में आ गई. लेकिन और रूपा के बाद लुक्का ने गैंग की कमान संभाली. लेकिन बिनोवा जी पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. मानसिंह के बाद साठ के दशक में चंबल में डाकू सुल्ताना, पुतलीबाई और अमृतलाल का आतंक रहा. पुतलीबाई पहली महिला डाकू थी तो अमृतलाल पहला पिछड़ी जाति का दस्यु सरगना. ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय के राजनीति विग्यान विभाग के अध्यक्ष प्रो, एवीएस चौहान कहते हैं, “अमृतलाल ही वह पहला डकैत था जिसने चंबल में अपहरण की नींव डाली थी. 1964 में अमृतलाल ने कालेज के 13 छात्रों को अगवा कर उनसे फिरौती वसूली थी.” कल्ला और बाबू भी इसी दौर के डाकू थे. 70 और 80 के दशक में चंबल में कई सारे डाकू गैंग बने लेकिन अमृत लाल, मोहर सिंह, माधो सिंह, लाखन सिंह, मूरत सिंह, सरयू सिंह, नाथू सिंह, मलखान सिंह, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, छविराम, अनार सिंह पानसिंह तोमर, रमेश सिकरवार का गिरोह काफी चर्चित रहा. इस दौर के डाकू भी मानसिंह के सिद्दांतों पर चलने की कोशिश करते थे. पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, “हम लोग भी दाउ (डाकू सम्मान से मानसिंह को इसी नाम से पुकारते हैं.) आदर्शों पर ही चलते थे. गरीबों की मदद, बहन बेटियों की शादी कराना और मंदिर बनवाना डाकुओं का कर्तव्य होता था.” चंबल में हालांकि महिला डकैतों की हिस्सेदारी बहुत कम रही. लेकिन फूलन देवी, कुसमा, मुन्नी और सीमा परिहार ऐसी महिलाएं थी जिन्होंने हालात का शिकार हो कर हथियार उठाया. बिनोवा जी और जय प्रकाश नारायण की पहल और गांधीवादी विचाकर सुब्बाराव जी के प्रयास से 1962, 1972 और 1982 में सैकड़ों डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया. मोहर सिंह, मलखान सिंह, माधों सिंह और फूलन देवी आत्मसमर्पण करने वाले डाकुओं में ही शुमार थी.
लेकिन नब्बे के दशक के बाद चंबल पूरी तरह बदल गया. लोग अन्याय और शोषण के खिलाफ बंदूक उठाकर बागी तो बन जाते लेकिन इसके बाद वे पैसे के लिए अपराधों को अंजाम देने लगे. इसमें अपहरण और रंगदारी उनका मुख्य पेशा बन गया. डाकू और राजनीतिक की सांठगांठ बनी और वे एक दूसरे को हितों के लिए काम करने लगे. डाकू अपने ‘नेता जी’ के लिए बूथ कैप्चरिंग करने लगा. इस दौरान लालाराम, श्रीराम, हरिसिंह काछी, निर्भय गूजर, सलीम गूजर, दयाराम व बाबूराम गडेरिया, जगजीवन परिहार व ददुआ सक्रिय रहे. हालांकि अब चंबल में कोई बड़ा गैंग नहीं बचा है लेकिन छोटे छोटे दर्जनों गैंग सक्रिय हैं. चंबल और ग्वालियर इलाके में अभी अनूप गूजर सक्रिय है तो चित्रकूट-बांदा में ठोकिया गिरोह. राजनीतिक ध्रुवीकरण की वजह से सत्ता जैसे जैसे दलितों और पिछड़ों की भागीदारी बढ़ती गई तो चंबल में डाकुओं में भी नए समीकरण पैदा हुए, जाति के आधार पर गैंग बनने लगे. इसका वजह से यहां जातीय हिंसा की शुरुआत भी हुई. चंबल में अब अगड़ी जातियों के गैंग न के बराबर हैं. फूलन देवी से शुरु हुआ जातीय संघर्ष अब चरम पर पंहुच गया है. दिसबंर, 2004 में भावपुरा में दयाराम गड़ेरिया ने 14 गूजरों को मौत के घाट उतार दिया तो जगजीवन परिहार का यह एलान की वह सौ ब्राह्मणों की बलि देगा जातीय संघर्ष की एक झलक भर है.

नेता जी बचा लीजिए.


चंबल के डकैतों और राजनीति का साथ बहुत पुराना है. जब डकैत रहे तो राजनीति के साए में और जब बीहड़ों से बाहर आए तो राजनीति में सक्रिय हो गए. आजादी के बाद से ही डाकुओं और नेताओं का गठजोड़ शुरु हो गया था. डकैतों को अपनी जाति और इलाके में दबदबा हुआ करता था. वे चुनावों में खास पार्टी और नेता के पक्ष में न केवल प्रचार करते थे बल्कि उनके पक्ष में वोट देने की अपील भी करते थे. लेकिन पिछले दो दशकों में चंबल में डाकुओं और राजनातिज्ञों का एक ऐसा गठजोड़ तैयार हो गया है जो एक दूसरे के हितों के लिए काम कर रहा है.

जब देश आजाद हुआ और पहला आम चुनाव हुआ तो चंबल के डकैतों ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया. यह सिलसिला आज भी जारी है. जाहिर है जब डाकू नेता को चुनाव जितवाएंगे तो उनसे अपना सरंक्षण भी चाहेंगे. चंबल के सबसे चर्चित दस्यु सरगना मानसिंह के पौत्र चौहत्तर वर्षीय जनरैल सिंह कहते हैं, "दूसरे आम चुनाव में मानसिंह सहित दूसरे बागियों ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचार किया" तो सत्तर के दशक में चंबल में आतंक के पर्याय रहे पूर्व दस्यु सरगना मोहर सिंह कहते हैं, "राजमाता विजय राजे सिंधियां उनसे मिलीं और चुनाव जिताने का अनुरोध किया." कभी नेताओं के लिए वोट बटोरने वाले कई डाकू आत्मसमर्पण के बाद राजनीति में सक्रिय हो गए. भिंड के मेहगांव नगर पालिका के 10 साल तक चेयरमैन रहे पूर्व डकैत मोहर सिंह कांग्रेस में सक्रिय हैं. जबकि पूर्व दस्यु सरगना मलखानसिंह भी दस साल से निर्विरोध सरपंच हैं. वह मध्य प्रदेश से राष्ट्रीय समानता दल से विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं. जब कि मानसिंह के बेटे तहसीलदार सिंह भी भाजपा से मुलायसिंह के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं. इसके अलावा चंबल इलाके में कई डाकू सजा से बरी होने के बाद राजनीति में सक्रिय हैं और प्रधान या सरपंच बने हुए हैं.
अस्सी के दशक तक चंबल में सक्रिय गिरोहों के सरदार आमतौर पर सवर्ण हुआ करते थे. लेकिन इस दौरान जिस तरह से राजनीति में बदलाव आया और पिछड़े और दलित गोलबंद होकर एक नई राजनितिक ताकत के रूप में उभर कर सामने आए. ग्वालियर स्थित जीवाजी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रो. एपीएस चौहान कहते हैं, “राजनीति में पिछडी जातियों और दलितों के ध्रुविकरण का असर चंबल में भी हुआ. नतीजन अब अधिकतर डाकू गिरोह जातीय आधार पर बनने लगे हैं” लिहाजा गडेरिया और जाटव गिरोहों का उदय हुआ. दयाराम गड़ेरिया, ददुआ व निर्भय गूजर पिछड़ी जाति के थे. तो ठोकिया वह अनूप गूजर भी पिछडी जाति के हैं. जबकि नाथू जाटव दलित था. भिंड में सक्रिय मेवाराम जाटव भी दलित ही है. इन डकैतों को अपनी अपनी जाति के नेताओं का संरक्षण रहता है.
पहले डकैतों के कुछ आदर्श हुआ करते थे और तब राजनीति भी इतनी गंदी नहीं थी. लेकिन आज डकैतों और नेताओं के नैक्सस ने मिल कर बीहड़ में अपहरण उद्योग को जन्म दे डाला है. पूर्व विधायक और कई डाकुओं के आत्म समर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले परशुराम भदौरिया कहते हैं, "अगर चंबल में दस्यु समस्या खत्म नहीं हो रही है तो इसकी एक बड़ी वजह हमारे जनप्रतिनिधि हैं. ये अपने स्वार्थ के लिए डाकू पैदा करते हैं." वहीं पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह कहते हैं, "नेता और पुलिस डकैतों को संरक्षण दे रहें हैं और बदले में डकैतों की लूट से हिस्सा लेते हैं." राजनेताओं और डाकुओं के कितने गहरे संबंध हैं इस बारे में मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, "जब जगजीवन परिहार और पुलिस की मुठभेड़ चल रही थी तो उसने कई स्थानीय नेताओं के अलावा मध्य प्रदेश के एक बड़े बीजेपी नेता को फोन कर कहा कि 'नेता जी इस बार बचा लो' आप को कभी चुनाव नहीं हारने दूंगा." बुंदेलखंड का 'बीरप्पन' कहे जाने वाले ददुआ को पहले बसपा और बाद में सपा का संरक्षण प्राप्त था. नेता डाकुओं को पुलिस से संरक्षण देते हैं और बदले में डाकू उनके लिए वोटों का जुगाड़ करते हैं. लेकिन अब डाकुओं को लगने लगा है कि अगर वे नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए वोटों का जुगाड़ कर सकते हैं तो खुद के लिए क्यों नहीं. शायद यही वजह है कि ददुआ ने अपने भाई को सपा से विधानसभा का चुनाव लड़वाया और बेटे को सपा से जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाया. डकैत सरगना ठोकिया ने भी उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी मां को राष्ट्रीय लोकदल से चुनाव लड़वाया था. डकैत अब लोकतंत्र पर डाका डालने की कोशिश कर रहे हैं. भविष्य में डाकू और राजनीति का यह गठजोड और खतरनाक शक्ल अख्तियार करेगा.

Tuesday, 4 December 2007

क्यों हैं वे एक दूसरे के खून के प्यासे

हमारी उससे मुलाकात आगरा-जयपुर नेशनल हाइवे पर सिकंदरा के पास होती है. वह एक ऐसा नौजवान था जिसकी आखों में भविष्य के सुनहरे सपने की बजाय नफरत झलक रही थी. कल तक जिनके साथ वह हंसी ठिठोली करता था आज उन्हीं के खून का प्यासा है.. हम गूजरों के मुख्य धरना स्थल पाटोली गांव से वापस लौट कर दौसा की तरफ बढ़ रहे थे. चारों तरफ सन्नाटा था, दहशतभरी इन सूनसान सड़कों पर बस अगर कुछ नजर आ रहा था तो जली हुई गाड़ियां और तबाह पुलिस चौकियां. जगह जगह बल्लम, गड़ासी, सरिए और लाठियों से लैस गूजर प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी एक अजीब से डर और खौफ का एहसास करा रही थी. यदाकदा सेना व अर्धसैनिक बलों की सनसनाती गाड़ियां इस दहशत को चीरती हुई आगे निकल जातीं. नेशनल हाइवे-11 और उसे जोड़ने वाली सड़कों पर सैकड़ों जगहों पर गूजरों ने पत्थर और बिजली के खंभों के जरिए अवरोध खड़ा कर रखा था. कई जगह रेल की पटरियां उखाड़ दी थी. रेलवे फाटक तोड़ दिए थे. हम लोग पत्थरों और खंभों को हटा कर रास्ता बनाते हुए बांदीकुई से करीब 60 किलोमीटर तक का सफर तय कर यहां तक पहुंचे थे. जहां हम अवरोध नहीं हटा सकते थे वहां से हम गांवों और पगडंडियों से होते हुए फिर हाइवे पर पहुंचते थे. और ऐसा सफर करने वाले उस दिन हम शायद अकेले शख्स रहे होंगे...
जली हुई बसों के पीछे से सहसा भीड़ को चीरते हुए वह हमारी कार के आगे आ जाता है. कल तक कलम उठाने वाले उसके हाथों में अब गड़ासी लहरा रही थी.. तल्खी से वह हमसे सवाल करता, “हमें पता चला है कि पीछे बालाजी मोड़ पर मीणाओं ने गूजरों को मारा है और उनकी मोटरसाइकिल जला दी है??”.. “नहीं ऐसी तो कोई घटना नहीं हुई है” हालांकि हमारे इस जबाव से वह संतुष्ट नहीं था और इस बारे में बार-बार हमसे पूछताछ करता रहा..शायद वह हमारे चेहरे की सच्चाई को पढ़ चुका था कि हम उससे झूट बोल रहे हैं. हकीकत यह थी की हमारे सामने ही मीणाओं के एक हूजूम ने “जय मीण भगवान के जयकारे के साथ” एक गूजर की न केवल बुरी तरह पिटाई की बल्कि उसकी मोटरसाइकिल को आग के हवाले कर दिया. आप जानना चाहेंगे कि जब यह सब हो रहा था तो पुलिस कहां थी? इस घटना से थोड़ी देर पहले तक बालाजी मोड़ पर सेना और पुलिस दोनों की गाड़ियां मैजूद थी. लेकिन जैसे ही मीणाओं का हुजूम मोड़ की तरफ आने लगा हमारे देखते देखते सेना की गाड़ी आगे बढ़ गई और पुलिस की पीछे. अगर हम (मैं और मेरे फोटोग्राफर साथी सुजान सिंह) वहां न मौजूद होते तो वे लोग उस गूजर को जिंदा न छोड़ते. शायद यह मीडिया का भय था... पता चला हमारे यहां पहुंचने से कुछ देर पहले मीणाओं ने दो और गूजरों की मोटरसाइकलें जला दी थी. गूजरों पर मीणाओं के हमले की यह पहली घटना थी और जातीय हिंसा की यहीं से शुरुआत भी. बालाजी मोड़ पर मीणाओं का नेतृत्व कर रहे सुखलाल ने एमए तक की पढ़ाई की है. वह कहते हैं, “हम किसी भी सूरत में गूजरों को अपना हक नहीं छीनने देंगे. अगर गूजरों ने पाटोली से अपना धरना खत्म नहीं किया तो हम उन्हें वहां से खदेड़ देंगे.” इस बीच भीड़ से कई मीणा एक साथ ललकारते हैं, “देखते हैं गूजरों का राशन पानी इधर से कैसे जाता है. वे नहीं हटेंगे तो भूखे मर जाएंगे.” और जैसा की अंदेशा था वही हुआ. मीणाओं ने गूजरों के लिए भोजन ले जाने वाले कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया.
हाथों में गड़ासी लिए आक्रोश से भरा जो गूजर नौजवान हमसे मीणाओं के हमले के बारे में पूछ रहा था, वह अब हमसे चेतावनी भरे लहजे में कहता है, “आगे रास्ते में मीणाओं का गांव है अगर वह मिलें तो...(गाली देते हुए) उनसे कह देना कि इस हाइवे पर दो सौ गांव गूजरों के हैं, अगर उन्होंने एक भी गूजर को मारा तो उनके गांव के गांव जला दिए जाएंगे…” और वहां जमे लोग हथियारों से लैस अपने हाथ ऊपर उठाते हुए “भौणा जी भगवान के जयकारे” के साथ उस नौजवान की बातों का समर्थन करते हैं. जयकारे देर तक हवा में तैरते रहे.. और हम अवाक देखते रहे कि इंसान ही नहीं इस जातीय संघर्ष में तो देवता भी शामिल हो गए हैं.
हमसे सवाल जबाब करने वाला नौजवान अपना नाम राजबीर सिंह गूजर बताता है. बीए तक पढ़ाई करने वाला राजबीर तीन साल से बेरोजगार है. उसे लगता है कि मीणा अकेले मलाई खाना चाहते हैं इसीलिए वह गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं होने देना चाहते. वह गूजरों को उनका हक देने की बजाय उनकी जान लेने पर उतारू हो गए हैं. यही वजह है कि राजबीर की गड़ासी मीणाओं के खून की प्यासी है. राजबीर कहते हैं, "गूजर और मीणाओं की सामाजिक पृष्ठभूमि एक जैसी है लेकिन आरक्षण का फायदा उठाकर वे आगे बढ़ गए और हम पीछे रह गए. देश में हमारी जाति का एक भी आईएएस तक नहीं है. जबकि मीणा लोगों की सरकारी महकमें में भरमार है. चपरासी से लेकर डीजीपी तक की कुर्सी पर उनके लोग बैठे हुए हैं." यह टीस राजस्थान के हर गूजर युवक में दिखाई देती है.
मीणाओं की तरक्की की बात काफी हद तक सही भी है मीणाओं ने आरक्षण का फायदा उठा कर भरपूर तरक्की की. मीणाओं की प्रशासन में भारी तादाद में भागीदारी है. अलवर से बांदीकुई के रास्ते में हमें मीणाओं के कई पट्रोल पंप मिले और मीणा पैलेस (मीणाओं की कोठियां) की तो भरमार थी. मीणाओं की समृद्धि देखर गूजरों में ईर्ष्या होना स्वाभाविक है. आलम यह है कि स्कूलों और कालेजों में जातीय आधार पर गूजरों और मीणाओं के छात्र बंटे होते हैं. और गूजर जहां बहुमत में होते हैं वहां वह मीणाओं से किसी न किसी बहाने अपनी खुन्नस निकालते रहते हैं. बांदीकुई के रहने वाले एक गूजर युवक रूप सिंह की कालेज के दिनों में मीणा जाति के छात्रों से कई बार झड़प हुई. एक बार तो कालेज में गूजर और मीणाओं के संघर्ष ने व्यापक रूप ले लिया और दोनों समुदायों के लोग सड़कों पर उतर आए. कई दिनों तक बाजार बंद रहा और आखिरकार दोनों समुदायों में सुलह के बाद ही जन जीवन सामान्य हो पाया.

आखिर क्या वजह है जिन लोगों के साथ राजबीर का बचपन बीता आज वह उन्हीं लोगों के खून का प्यासा हैं. दरअसल इस नफरत की बुनियाद बहुत पुरानी है. आज जो गूजर और मीणाओं का संघर्ष दिखाई दे रहा है उसके बीज तो कई साल पहले ही बो दिए गए थे. आरक्षण का फायदा उठाकर जब मीणा समाज के लोग आगे बढ़ने लगे तो गूजरों में उनके प्रति नफरत की भावना भड़कने लगी. कई बार स्कूल और कालेज स्तर पर इस नफरत का उफान दिखा लेकिन आग भड़कने से पहले ही स्थानीय लोगों के प्रयास से इसे बुझा दिया गया. लेकिन इस बार ऐसी आग लगी कि पूरा राजस्थान जातीय हिंसा की आग में धूं धूं कर जल रहा है. अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग को लेकर करीब सात साल से संघर्ष कर रहे गूजरों का धैर्य उस समय जवाब दे गया जब भरतपुर-दौसा के बीच आगरा-जयपुर नेशनल हाइवे पर स्थित पाटोली गांव में 29 मई को प्रदर्शन करने आए लोगों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं. इस गोलाबारी में गूजर समुदाय के छह लोगों की मौत हो गई. आरक्षण की मांग कर रहे गूजरों के इस ऐलान के बाद की जब तक उनकी मांगे नहीं मानी जाती तब तक वे पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों का दाह संस्कार नहीं करेंगे, यह आंदोलन व्यापक और उग्र रूप ले लेता है. राजनीति ने इसे और हवा दी और अब आलम यह है कि इसकी चपेट में केवल राजस्थान ही नहीं दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी आ चुका है.
गूजरों का मानना है कि सामाजिक रूप से उनकी स्थिति और हैसियत मीणाओं जैसी ही है. लिहाजा उन्हें आदिवासी की श्रेणी में रखते हुए मीणाओं की तरह ही अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए. हिमाचल, उत्रांचल और जम्मू कश्मीर में गूजरों (वन गूजर) को जनजाति का दर्जा मिला हुआ है जबकि राजस्थान में वह अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में शामिल है. पाटोली गांव में धरने पर बैठे गूजर आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष व गूजर प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व करने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला कहते हैं, “संविधान ने अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिए जो मापदंड तय किए हैं गूजर उन पर खरे उतरते हैं. हमारी अपनी अलग संस्कृति और अलग देवी-देवता है. हम हमेशा शहर से दूर जंगलों और पहाड़ों में रहे हैं. इस लिहाज से हम अनुसूचित जनजाति के सारे लक्षणों को पूरा करते हैं. लोकूर कमेटी और प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल टार्ड ने भी गूजरों को अनुसूचित जनजाति ही माना था. लिहाजा हमें अन्य पिछड़ा वर्ग की बजाय अनुसूचित जनजाति में शुमार किया जाए.” आजादी के बाद से ही गूजरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग उठने लगी थी. लेकिन काका कालेलकर समिति की अनुशंसा के बाद जब मीणाओं को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया गया तो यह असंतोष और बढ़ गया. लेकिन 1993 में शेखावत सरकार ने गूजरों को ओबीसी में शामिल कर उनके असंतोष को कम करने की कोशिश की. राज्य सरकार के इस कदम से गूजरों ने भी राहत की सांस ली. लेकिन उनकी यह खुशी 1999 में उस समय काफूर हो गई जब वाजपेयी सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के चलते जाटों को केंद्र में ओबीसी में शामिल करने का फैसला किया. बाद में राज्य सरकार ने भी उन्हें यह दर्जा दे दिया.
सामाजिक व आर्थिक रुप से समृद्ध जाटों के ओबीसी में शामिल होने से गूजरों को जो फायदा मिल रहा था वह कम हो गया. ऐसे में गूजरों ने फिर से खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की अपनी मांग तेज कर दी. पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजनीतिक फायदे के लिए गूजरों की इस महत्वाकांक्षा को हवा दी और उन्हें आश्वासन दिया कि अगर वह सत्ता में आईं तो गूजरों को वह अनुसूचित जनजाति में शामिल करेंगी. गूजरों ने भी वसुंधरा राजे सिंधिया पर भरोसा कर उन्हें ताज तक पहुंचाया. राजस्थान में गूजरों की तादाद करीब 70 लाख बताई जाती है.
वसुंधरा राजे के सत्ता में आने के साढ़े तीन साल बीत चुके हैं लेकिन अभी तक राज्य की बीजेपी सरकार ने केंद्र सरकार को इसकी अनुशंसा नहीं भेजी है. लंबे इतंजार के बाद करीब छह महीने पहले गूजरों ने अपनी मांग को लेकर फिर आंदोलन तेज कर दिया तो मुख्यमंत्री ने उनसे तीन महीने में केंद्र को इस बाबत अनुशंसा भेजने की मोहलत मांग कर आंदोलन स्थगित करने की मांग की. एक बार फिर गूजर नेताओं ने मुख्यमंत्री की बात मान कर आंदोलन स्थगित कर दिया. लेकिन समय सीमा खत्म होने के तीन महीने बाद उनका धैर्य जवाब दे गया और इस बार वे आर पार की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. गूजर नेता और राजस्थान गूजर युवा महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष मान सिंह गूजर कहते हैं, “इस बार तो हम अपना हक लेकर ही रहेंगे. चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े.”
लेकिन अब यह आरक्षण की लडाई न होकर जाति के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है. दोनों समुदाय के नेता और विधायक अपनी अपनी जातियों के पक्ष में मैदान में आ गए हैं. मीणा समुदाय के 33 विधायक और गूजर समुदाय के सात विधायक अपनी-अपनी बिरादरी के हको की लड़ाई में एक दूसरे को सह और मात देने में लगे हुए हैं. बिरादरी को शांत रखने की बजाय यह नेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उन्हें और भड़का रहे हैं. राजनीति ने इस मसले को आसान बनाने की बजाय और जटिल बना दिया है. और हाशिए पर खड़ी एक दूसरे के खून की प्यासी दोनों जातियां यह नहीं समझ पा रही हैं वह नफरत का जो बीज बो रही हैं उसकी कीमत उनकी आने वाली पीढ़ियों को चुकाना होगा. राजबीर का यह एलान "खून का बदला हम खून से लेंगे" आने वाले समय में किसी अनर्थ की भविष्यवाणी सी लगती है.

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अनिल पांडेय करीब 20 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। जनसत्ता, स्टार न्यूज, द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में कार्यरत रहे हैं। फिलहाल, वे कैलाश सत्यार्थी चिलड्रेन्स फाउंडेशन में बतौर एडिटर (कॉन्टेंट) नौकरी कर रहे हैं। जनसत्ता के लिए दिल्ली में पांच साल रिपोर्टरी करने के बाद अनिल पांडेय भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव जनसंचार विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बन कर अध्यापन करने चले गए। पांच साल मास्टरी की, लेकिन मन रिपोर्टरी में ही लगा रहा। लिहाजा, सरकारी नौकरी छोड़ कर वापस पत्रकारिता में रम गए। स्टार न्यूज में कुछ समय काम किया। लगा टीवी में काम करने के लिए कुछ खास नहीं है। वापस प्रिंट की राह पकड़ ली। इसके बाद चौदह भाषाओं में प्रकाशित देश की चर्चित पत्रिका द संडे इंडियन में फिर से रिपोर्टरी शुरु कर दी। यायावरी और खबरों के पीछे भागना उनका जूनून रहा है। यही वजह है कि अनिल पांडेय द संडे इंडियन के कार्यकारी संपादक होते हुए भी रिपोर्टर की तरह ही खबरों का पीछा करते थे। खबरों की तलाश में वे देशभर में भटक चुके हैं। उनकी कई खोजी रपटों पर सरकारों ने संज्ञान भी लिया और उस पर पुरस्कार भी मिले। कुछ पर डाकूमेंट्री फिल्म भी बनी। अनिल को कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। उन्होंने कुछ सीरियल और डाकूमेंट्री के लिए भी काम किया है।